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About

This blog is personal blog of Author Manoj Vedprakash Pandey.
Pen worshiper The author was born on August 15, 1987, in a Brahmin family in Jamal village Chhattisgarh, his grandfather Major Jawala Prasad Pandey was employed in the army at the time of British rule, father himself Ved Prakash Pandey was a good artist and singer, especially he was very much impressed with Kishore Kumar, he started his education in his village, followed by studying the subject of history, "Three Legend with One Angel" is his first Hindi novel. . Apart from this, he is now writing the second part of this book, his main business is the fondness of freelance writing and the Purohiti work.


Published composition - 1 Three Legend with One Angel (Novel)

                                                      2. Yatra (Novel)

यह ब्लॉग लेखक मनोज वेदप्रकाश पांडे का निजी ब्लॉग है।
कलम का उपासक. लेखक का जन्म 15 अगस्त 1987 को जामुल ग्राम छत्तीसगढ़ में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ, इनके दादाजी मेजर ज्वाला प्रसाद पाण्डेय ब्रिटिश हुकूमत के समय सेना में कार्यरत थे, पिताजी स्व. वेदप्रकाश पाण्डेय एक अच्छे कलाकार और गायक थे , खासकर वे किशोर कुमार से बेहद प्रभावित थे, इन्होने अपने ग्राम में ही प्रारम्भिक शिक्षा प्रात की, उसके उपरान्त इतिहास विषय में स्नात्तकोत्त्तर की पढाई की, "थ्री लीजेंड विथ वन एंजेल" इनका पहला हिंदी उपन्यास है। इसके अलावा वे अभी इसी किताब के दूसरा भाग लिख रहे हैं , स्वतंत्र लेखन का शौक और पुरोहिती कार्य इनका मुख्य व्यवसाय है ।

प्रकाशित रचना - १. थ्री लीजेंड विथ वन एंजेल (उपन्यास) 
                                २. यात्रा (उपन्यास)


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ज्वाला 2 | Jwala 2

कुछ बालक खेतों की पगडंडियों से होते हुए तेजी से दौड़ रहे हैं, सबके हाथ में अनिवार्य अस्त्र डंडा है, बच्चों को अपना डंडा बहुत प्रिय होता है, सिर्फ विद्यालय को छोड़कर हर वक्त यह अस्त्र उनके साथ रहता है,

कुछ बच्चों के पास गुलेल भी है, सर्दी का मौसम, खेतों में लाखडी और मेढ़ पर राहर के पौधे लहरा रहे हैं, जिनकी फलियाँ खाने बच्चे खेतों के चक्कर लगा रहे हैं, वैसे बेर भी खूब फले है, सभी बच्चे धोती और कुरता पहने हुए, अपने डंडे से सामने आने वाली वनस्पति को धराशायी करके आनंदित हो रहे हैं,

पुनिया जो सबसे बड़ा है, वह रुका और उसके रुकते ही सब बच्चे एक खेत के अंतिम छोर पर रुके, पुनिया बोला “सोहन ला तेरी गुलेल दे, उसमे का चाम (चमड़ा) अच्छा है, सोहन ने उसे अपनी गुलेल दे दी, पुनिया ने गुलेल ली और सामने महुए के झाड में बैठे कोंवे पर निशाना लगाया, ज्वाला उसके हाथ पकड़कर मना करने लगा, “पुनिया कोंवे को मत मार पाप लगेगा रे, और उसने उसकी बांह खींची, वह पहले भी कई बार अपने दोस्तों को मना कर चुका था, लेकिन कुछ देर तो उसके दोस्त मान जाते फिर कुछ देर में भूल जाते.

पुनिया ने गोल आकार के कंकड़ एक पोटली में रखी थी, वह पोटली व…

क्या अन्धविश्वास हूँ मै | kya main andhwishvasi hoon

सदियों से धोती पहना, तिलक लगाकरबगल में झोला दबाये, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाला बटुक, वट सावित्रीहलषष्ठी माता का वंदन गाता दास हूँ मैं,
राधेकृष्ण की प्यारी लीला, श्री राम का धीरज और संस्कार हूँ मै, दुनिया को ज्ञान सत्यमार्ग बताने वाला व्यास , हाँ अन्धविश्वास हूँ मै ।
गणपति जी की प्रथम वंदना, रावण का श्राद्ध कराने वाला क्षत्रिय,अपने राष्ट्रकुल का गौरव बढ़ाने वालादेश का परम दुर्लभ इतिहास, अन्धविश्वास हूँ मै ।
देशऔर समाज बदला, बदल गए इतिहासकार,हर तकलीफ के साथ, कभी न बदल कर उपनिषदों को स्मरण करता हुआ, वेदों का ह्रदय में सहेजने वाला, पुराणोंमें रमने वाला विज्ञानहूँ मै, क्या सिर्फ अन्धविश्वास हूँ मै ।
क्या जरूरत थी धोती बचाने की, क्या जरुरत है तिलक लगाकर विचित्र दिखूं ?या अपनी शिखा की लम्बाई रोक ना पाऊं,क्यों मै दूसरों की शादी करवाता हूँ ?शुभ-अशुभ घड़ियों में निमंत्रित होकरक्यों ? मै अपमानित होकर जीता हूँ ?महान परशुराम का वंशज, क्या सिर्फ अंधविश्वास हूँ मै ।
लांछन लगाया जाता है,कभी मुझको शास्त्र सिखाया जाता है,कभी समाज मेरी गलतियों को खोजते हुए पाया जाता है,क्यों युवा वर्ग को मोह नहीं? क्यों…

ज्वाला | Jwala

परसराम की बीवी का पार्थिव शरीर उसके आँगन में पड़ा है, इस विशाल आँगन में सौ लोग आ जाएँ इतनी बड़ी जगह है. और घर भी किसी महल से कम नहीं, होना तो ये चाहिए था की पूरा आँगन और घर परिचित, बंधू बांधवों और गाँव वालों से भरा होता, शोकाकुल लोगों की रोने की आवाज गूंज रही होती, जो किसी भी पत्थर दिल इंसान का ह्रदय पिघला दे ,
लेकिन अजीब विडम्बना है की यहाँ कोई मौजूद नहीं, कोई नहीं , परसराम खुद अपनी मृत पत्नी के पार्थिव शरीर से दूर आँगन में नीम की छाँव में सर पकड़ कर बैठे हैं, उनका बड़ा बेटा ज्वाला जोकि मात्र ग्यारह वर्ष का है , वो भी घर के बरामदे के सामने वाले गलियारे में एक खम्भे के सहारे खडा है, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा की क्या हो रहा है, उसके दो छोटे भाई उसी के पास खड़े अपनी माँ को निहार रहे हैं, इस सोच में की उनकी माँ अब सोकर उठेगी, इस घर के सारे नौकर भी भगवान् को प्यारे हो चुके थे .
गाँव में संक्रामक बीमारी फ़ैली थी, ऐसी बीमारी की पूरा गाँव का गाँव निगल रही थी, हर परिवार डरा सहमा सा अपनी बारी का इन्तेजार कर रहा था, बस . कोई फर्क नहीं पड़ता की आप हिन्दू हैं या मुसलमान , बीमारियों का कोई मजहब नहीं ह…