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सबक | Sabak

कुछ लोग कोल्हू के बैल की तरह होते हैं, जो खूब कड़ी मेहनत करते हैं और काम ख़त्म करके अपने तबेले में लौटकर चारा पानी खाकर अपनी खूंटी में रातभर बंधे रहते हैं और सुबह होते ही फिर से काम पर लग जाते हैं, ऐसा ही रमाकांत है, वह रोज अपने पिताजी के साथ शहर के कारखाने में काम करने जाता है, वहां जी तोड़ मेहनत करके बाप बेटे दिन ढलते-ढलते लौट आते हैं, उसकी माँ जो भी रूखा सूखा परोस देती है वे लोग प्रेम से खा लेते हैं, यही उन लोगों की नित्य क्रिया है, इस घर में रमाकांत के अलावा उसकी दो छोटी छोटी बहनें भी हैं
रोज सवेरे पौ फटते ही दोनों अपनी अपनी सायकल से शहर चले जाते हैं, इस गाँव के अधिकांश लोग उसी कारखाने में काम करते हैं, जाते समय कैसे भी पहुंचें मगर वापसी में सब एक जुट होकर वापस आते हैं क्योंकि दिन ढलने के बाद जंगली सुनसान रास्ते में अँधेरे के कारण सबको डर लगता है, इनमे से कुछ लोग नित्य तिराहे के समीप शराब के ठेके में रुककर अपने दिन भर की थकान मिटाते हैं, ऐसे लोग बाकी लोगों के लिए थोड़े कम आदरणीय है, वैसे भी शराबी को सम्मान कहाँ ? इसलिए शराबियों का अपना अलग गुट है चाहे पीना हो या न हो, किसी को अगर नहीं पीना है तब भी उसे साथ देने के लिए रुकना पड़ता है, इस गुट में कोई कभी किसी को उधार में शराब पिलाने के लिए मनाता है तो कोई अगली बारी मेरी तरफ से कहकर मान मनुहार करते नजर आता है,

रमाकांत ऐसे लोगों से दूर ही रहता है, उसके पिताजी काम से लौटते वक्त इस तरफ देखना भी पसंद नहीं करते तो भला वह कैसे देखे ? वैसे भी गाँव में अधिकाँश लोग शराब नहीं पीते और स्वघोषित शरीफ लोगों की गिनती शराबियों की तुलना में बहुत ही ज्यादा है, उनके गाँव के चौपाल में शराबियों को बैठने नहीं दिया जाता न ही किसी नशे में धुत्त इंसान को ग्रामीण सभा के पास आने दिया जाता है, जो इंसान महीने में भी एकाध बार पी लेता हो वह भी शराबी ही कहलाता है, इसलिए अधिकाँशतः अच्छे लोग नशेड़ियों और उनके दल से दूर रहते हैं .

एक दिन रमाकांत कार्य की अधिकता के कारण कारखाने से देर से निकला शरीफ आदमियों की टोली गाँव के लिए प्रस्थान कर चुकी थी, दुविधा के साथ उसने अपनी सायकल निकाली और गाँव की तरफ आगे बढ़ा और वह तिराहे पर पहुंचा उसे लगा था की कोई गाँव का आदमी जरूर मिल जाएगा मगर पीपल के नीचे किसी की सायकल नहीं दिखी, यहाँ तो चहल पहल है बगल में शराब की दुकान है कुछ अन्य प्रतिष्ठान भी खुले हुए हैं मगर आगे गाँव का रास्ता निर्जन और वीरान है दस मील जंगली कच्चे रास्ते के पार उसका गाँव है,

उसने सोचा की अकेले ही चले जाना चाहिए देर करने का कोई लाभ नहीं और वह आगे बढ़ने ही वाला था की तभी उसे उसके गाँव का लड़का हेमशंकर नजर आ गया जो उसी की तरफ चला आ रहा था वह समीप आते ही बोला “रमाकांत आज काम ज्यादा था क्या ? उसने जवाब दिया हाँ भाई . हेमशंकर ने कहा “कोई बात नहीं आज हम लोगों के साथ चले जाना, चलो आओ साथ में बैठो.

“नहीं भाई मै यहीं पर ठीक हूँ, आप लोग आराम से पी लीजिये फिर साथ में चलेंगे. रमाकांत ने अपनी बात कही मगर हेमशंकर उसे जबरदस्ती अन्दर ले जाने लगा “अरे आओ भाई हम लोग तुम्हे पीने के लिए थोड़ी न कहेंगे और उसे खींचते हुए जबरन शराब के ठेके के अन्दर ले आया, आज उसने पहली बार यहाँ कदम रखा अन्दर आकर उसे बड़ा अजीब महसूस हो रहा है, कुछ लोग लकड़ी के तख्ते पर बैठे शराब पी रहे हैं तो कुछ लोग ज़मीन पर बैठकर .

हेमशंकर उसे अपनी जगह पर ले आया यहाँ पहले से हरिया और चुन्नी अपने आसन में विराजमान हैं, सभी हरी घास से आच्छादित भूमि पर बैठे, उनके बीच में शराब की बोतल, गिलास और कपडे के थैले में दालमोठ और प्याज रखी हुई है, रमाकांत उन लोगों को पीता हुआ देख यह सोच रहा है की किसी ने मुझे यहाँ देख लिया तो गाँव में बहुत बड़ी बात हो जायेगी, उसने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई उसके गाँव का कोई आदमी नहीं दिखा तो उसने अपनी नजरें उठा ली, आस पास अधिकाँश लोग इसी शहर के निवासी प्रतीत हो रहे हैं,

यह तो अलग ही दुनिया है, शब्दों का कोलाहल और अनवरत चलने वाला वार्तालाप उसे अजीब लग रहा है नशा क्या होता है ये वह नहीं जानता परन्तु नशे में इंसान का दूसरा व्यक्तित्व जो कहीं दबा हुआ होता है वह जरूर उभर आता है जो अत्यंत निडर और वाचाल होता है यह बात वह महसूस कर चुका है, उसके साथ बैठे लोग गिलास में शराब डाल कर पी रहे हैं और बीच बीच में दालमोंठ फांक रहे हैं उनकी बातें ख़तम ही नहीं होती, चुन्नी नशे में झूमते हुए एक गिलास भरने लगा और उसे उठाकर बोला “अरे भाई पिछले साल के जलसे में लखनऊ से जो नचनिया आई थी इस बार भी उसी को बुलाया है न ? वो क्या है न उसके जैसी अप्सरा नहीं देखी आज तक . हरिया ने नाक सिकोड़ते हुए जवाब दिया “अरे किसकी याद दिला दिए तुम ? अरे भाई मै भी उसी को देखने के लिए मरा जा रहा हूँ, मगर ये सब तो सेठ जी जाने किसको बुलायेंगे और किसको नहीं मगर वो गिलास तू हाथ में क्यों पकड़ा हुआ है ? रमाकांत को दे दे , उसने रमाकांत की तरफ देखते हुए कहा .

रमाकांत ने मना करते हुए कहा - नहीं भाई मै नहीं पीता, आप लोग थोडा जल्दी करेंगे आज तो बहुत देर हो चुकी है. हेमशंकर ने उसे घूरते हुए कहा “कोई बात नहीं यार, चलते हैं न आराम से .

रमाकांत - नहीं भाई बहुत देर हो गई है ..

हेमशंकर - इसको देखो ! बड़ी जल्दी है लड़के को . क्यों भाई तेरी जोरू तेरा रास्ता ताक रही है क्या ?

रमाकांत - नहीं भाई , मेरी शादी कहाँ हुई है .

हेमशंकर - तो चुपचाप बैठ ! वैसे भी तू क्या जाने ज़िंदगी का असली मजा, दिन भर कोल्हू के बैल की तरह खटता है और जो पगार मिली वो माँ के चरणों में रख दिया, न कोई लत न ही कोई चकल्लस, ये भी कोई ज़िंदगी है ?

रमाकांत - ये तो अच्छी बात है भाई .

हेमशंकर - ख़ाक अच्छी बात है ? तू ये बता कभी किसी औरत को छुआ है ?

रमाकांत - नहीं भाई .

हेमशंकर - कभी जंगल में शिकार करके उसे भूनकर शराब के साथ खाया है ? किसी जलसे या गम्मत में नशे में चूर किसी नचनिया के साथ रात भर नाचा है ? हुक्का पीते हुए किसी नाचने वाली के कोठे पर बैठा है ? रात में चुपके से दीवाल फांदकर किसी लडकी से मिलने गया है ?

रमाकांत - नहीं भाई ये सब पसंद नहीं मुझे .

हेमशंकर - डरपोक है रे तू एक नंबर का, साला ए भी कोनो जिन्दगी है ? हट !! ससुरा अइसन जिनगी से मौत भली , बबुआ मौत भली . रमाकांत गुस्से में उठकर जाने लगा तभी हेमशंकर ने उसका हाथ खींचकर फिर से बिठा दिया और बोला - ठीक है चलते हैं, नाराज़ मत हो भाई , उन लोगों ने जल्दी से आखिरी घूंट पिया और अपना झोला उठाकर सायकल पर सवार होकर गाँव के लिए निकल पड़े,

आज काफी अँधेरा छाया हुआ है, जंगल में तरह तरह की आवाजें गूँज रही हैं, आसमान में सितारे चाँद के बिना फीके लग रहे हैं, सामने का कुछ सूझ नहीं रहा है फिर भी तीनो लोग जमकर सायकल की पैडल चला रहे हैं उनके पीछे रमा डरते डरते सावधानी से सायकल चला रहा है, रास्ते भर उन लोगों ने गाँव की औरतों की सुन्दरता और अपने मानसिक कमीनेपन पर चर्चा करते गए, उनके पीछे रमा चुपचाप अपने शरीफ होने और कोई बुरा कार्य न करने के लिए व्यथित हो रहा है.

घर पहुंचकर उसने थोडा सा ही भोजन किया और आँगन में खाट बिछाकर लेट गया, आने वाले कई दिन वह व्याकुल रहा और अगर हेमशंकर कहीं दिख जाता तो वह अपनी नजरें चुरा लेता, अच्छा घर खेती बाड़ी और घर में दो कमाने वाले व्यक्ति फिर भी रमाकांत को कुछ कमी सी लगने लगी, कभी कभी हम लगातार मिलने वाली ख़ुशी और शांति का मूल्य कम आंकने लगते हैं और ऐसा लगने लगता है की सम्मान को दांव पर लगाकर जोखिम उठाकर देखना चाहिए, शायद उसमे बहुत रोमांच मिलता हो .

सावन आने के बाद गाँव के लोग खेतों की तरफ व्यस्त हो गए, अधिकाँश किसान साल भर किसी कारखाने या मिल में काम करते हैं मगर खेती के मौसम में वे अपने खेतों की ओर लौट आते हैं, इस दौरान कारखाने में उत्पादन घट जाता है, रमा के यहाँ उसके पिताजी, माँ और दोनों छोटी बहनें खेत का काम सम्हालने लगी तो रमा ने कारखाने जाना बंद नहीं किया और जिन-जिन लोगों के खेत में काम करने के लिए लोग मौजूद थे उन लोगों ने भी कारखाना जाना बंद नहीं किया,

इस प्रकार से इस मौसम में बहुत कम लोग ही गाँव से कारखाने जाया करते थे, ऐसे ही एक दिन छुट्टी होने के बाद रमा अपने गाँव के लिए निकला मगर आज सिर्फ गिने चुने लोग ही आये थे, आज वह बहुत थक गया था और जब वह तिराहे के सामने पहुंचा तो देखा सिर्फ हेमशंकर नजर आया, जो किसी के आने की राह देख रहा था, उसके बाद वह दोनों फिर से शराब के ठेके के अन्दर बैठे और हेमशंकर ने पीते हुए उसे कहा “भाई चिंता मत करो आज देर नहीं करूंगा वैसे भी काले बादल छाये हुए हैं, और तुम्हे कोई उलाहना भी नहीं दूंगा, वैसे आज तुम इतने सुस्त क्यों दिख रहे हो ?

ये बात सुनकर रमा को बड़ा अच्छा लगा और उसने भी कहा - कोई बात नहीं भाई आराम से पियो, आज मेरा पूरा बदन दुःख रहा है और ज़ुकाम की वजह से नाक भी बह रही है इसीलिए सुस्त लग रहा हूँ,

हेमशंकर - तो इसको पियो भाई सच कहता हूँ सारी तकलीफ पल भर में दूर हो जायेगी,

रमा - रहने दो भाई

हेमशंकर - अरे नहीं भाई अगर मेरी बात झूठ निकली तो सौ जूते मारना दारु नहीं दवा समझ कर ही पी लो यार , उसने भरी हुई गिलास उसके सामने रख दी, रमा उस गिलास को देखकर कुछ सोचने लगा और आखिरकार उसने वह गिलास उठा ही ली और पीने लगा, पहले ही घूंट में उसने सब थूक दिया “अरे भाई ये तो बहुत ही कडवी है , हेमशंकर ने दुबारा उसे पीने को आग्रह करते हुए कहा “भाई इसे पीना आसान थोड़े न है लेकिन इसे कैसे भी अन्दर कर लो फिर देखो तुम्हारी सारी तकलीफ ख़तम हो जायेगी, इस बार उसने हिम्मत करके एक साँस में पूरा गिलास खाली कर दिया इसके बाद हेमशंकर ने उसकी मुट्ठी में भुने हुए चने डालते हुए कहा “लो भाई इसे जल्दी से खा लो फिर मुंह का स्वाद बदल जाएगा , उसने चने चबाये और कुछ ही देर में उसकी उसकी सारी मांसपेशियाँ शिथिल हो गई,

हेमशंकर उठा और दौड़कर एक और बोतल ले आया उसने रमा को खूब पिलाया और दोनों नशे में धुत्त गाँव के लिए निकले, आज उन दोनों ने जी भरकर बातें की और बातों ही बातों में गाँव कैसे पहुँच गए ये पता ही नहीं चला, नशे में चूर अंत में उसने हेमशंकर को अपना सबसे अच्छा दोस्त और भाई की उपाधी भी प्रदान की उसके बाद वह अपने घर पहुंचा, द्वार पर आहट सुनकर माँ उठ बैठी और उसके आँगन में दाखिल होते ही पूछा “आज कैसे देर हो गई बेटा ? उसने खुद पर नियंत्रण करते हुए कहा “आज काम ज्यादा था माँ, तुम सो जाओ मै खाना नहीं खाऊंगा, माँ ने पूछा क्यों ? उसने जवाब दिया माँ आज भैरव बाबा के मंदिर में भंडारा था तो वहीं से खाकर आ रहा हूँ, माँ ने कहा - अच्छा बेटा ठीक है तुम सो जाओ,

वह भी चुपचाप खाट बिछाकर सो गया, अगली सुबह जब वह उठा तो उसे इस बात की खुशी हुई की वह पकड़ा नहीं गया, फिर वह छुप-छुपकर शराब पीने लगा; हेमशंकर अब उसका परम मित्र बन गया, और वह भी धीरे धीरे शराबियों के दल का सदस्य बनने लगा, फसल की कटाई के बाद पिताजी फिर से कारखाने जाने लगे जिससे उसे पीने में दिक्कत आने लगी, हालांकि उसके घर में उसके माँ बाप यह बात जान चुके थे की यह लड़का अब पीने लगा है फिर भी उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, पिताजी ने सोचा की अब इसकी शादी करवा देते हैं लड़का खुद ब खुद सुधर जाएगा और उन्होंने शुभ मुहूर्त में सगे सम्बन्धियों के साथ मिलकर अच्छी सी कन्या के साथ रमाकांत का विवाह कर दिया

सुन्दर गुणवती कन्या - अनुपमा जो बिलकुल ही शांत और शर्मीली थी, अपने पति के जैसा ही उसका स्वभाव था, रमा की छोटी बहनें ऐसी प्यारी भाभी पाकर बहुत खुश हुई और भाभी भी उन बच्चियों के साथ खेलती उनके लिए गुड्डे गुड़िया बनाकर देती, आते ही अनुपमा ने सारा घर और जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठा ली, माँ और पिताजी ऐसी बहु पाकर फूले न समाये, रमा का घर खुशियों से भर गया, और रमा भी कई महीनों तक शराब न पी सका, सब कुछ शांत चल रहा था मगर उसने फिर से पीना शुरू कर दिया, इंसान अगर सुधरने की ठान ले तो संगती थोड़ी उसको सुधरता देख सकेगी ? तू तो पक्का जोरू का गुलाम है, क्या बीवी से डर लगता है ? ऐसे संवाद बोलकर उसे पीने की चुनौती दी गई और दुनिया भर के क्लेश कथा अलग, सो रमा एक बार फिर से पीने लगा फिर वह रोज शराब पीकर घर आने लगा,

उसकी दुर्गती देखकर जब माँ-पिताजी ने उसे समझाना चाहा तो उसने बात को यह कहकर टाल दिया की आगे से नहीं पिएगा, लेकिन यह सिर्फ कोरी बात निकली, धीरे धीरे उसका व्यवहार और लोगों से बात करने का ढंग बदलने लगा, अब तो वह गाँव में गाली गलौच करने लगा, घर पहुंचता तो अपनी बीवी के ऊपर शक करता बेवजह के सवाल पूछने लग जाता, माँ और पिताजी को भी उसने आदर देना बंद कर दिया, यह रोज होने लगा वह रोज नशे में धुत्त घर पहुंचता रोज सबको गालियाँ देता और तोड़ फोड़ भी करने लगा, अनुपमा अपने पति की हरकतों से तंग आ गई थी, मगर वह क्या करे दिन के समय जब वह अपने पति को कुछ कहती या समझाने का प्रयास करती तो उसके मुंह से कुछ न फूटता और चुपचाप काम में चला जाता, बिना पिए वो किसी से राम तक नहीं भजता था पीने के बाद वह सबसे लड़ने को अमादा हो जाता,

वक्त अपने बुरे रंग दिखाता चला जा रहा था लेकिन बुरा वक्त अभी बाकी था - एक दिन तो अनर्थ ही हो गया नशे में धुत्त रमा अपनी माँ और पिताजी के ऊपर ही हाथ उठाने लगा यह देख अनुपमा जो अब तक चुप थी वह दौड़ कर सामने आ गई और जोर से कहा - बस ! बहुत हो गया, पानी अब सर के उपर चला गया है , रमा गुस्से से भरी अपनी लाल आँखों से उसे डराते हुए चीखा - क्या कहा ? और भी कुछ कहने वाला था की उसकी पत्नी अनुपमा अपने रौद्र रूप में आ गई जो साक्षात काली माँ के सामान गुस्से से परिपूर्ण थी,

अनुपमा उस पर टूट पड़ी दोनों हाथों से उसके बाल पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दिया, यह सब इतनी तेजी से हुआ की रमा को कुछ समझ नहीं आया वह ठीक से सम्हला भी नहीं था की अनुपमा ने उसके दायें पैर को अपने हाथों से पकड़ा और उसे घसीटते हुए भण्डार गृह की और ले गई शांत और सुशील कन्या जो कभी किसी को अपशब्द नहीं कहती वह आज कुपित हो चुकी है, अन्दर जाते ही उसने मोटे बांस के बम्बू से रमा की धुनाई शुरू कर दी, उसे इतना मारा की उसकी माँ यह नहीं देख सकी और उसे बचाने के लिए दौड़ी चली आई मगर अनुपमा ने उन्हें घूरते हुए दरवाजा बंद कर दिया, उसकी आँखों से अंगारे बरस रहे थे इसलिए माँ या पिताजी किसी की हिम्मत न हुई की वह अपने बेटे को छुडाये, उस बंद कमरे में सिर्फ रमा के चीखने की आवाज आ रही है आज अनुपमा को अपने सास और ससुर का अपमान सहन नहीं हुआ उसने नशा उतरते तक उसे पीटा, उसके बाद उसे भण्डार गृह में ही छोड़ दिया

अगली सुबह जब उसकी आँख खुली तब उसका पूरा शरीर दर्द से बेजान था ले देकर वह उस कमरे के बाहर निकला तो देखा अनुपमा उसे ही घूर रही है यह देख रमा को पिछली रात का वीभत्स रूप स्मरण हो आया, रमा ने डरते हुए अपनी नजरें नीची कर ली तब अनुपमा ने रौबदार आवाज में कहा - कल रात को क्या हुआ याद है की नहीं ? अगर नहीं तो इधर आओ मै सुनाती हूँ. रमा पिछली रात की याद से ही सिहर उठा और भीगी बिल्ली की तरह सर हिलाकर जवाब दिया, मुंह से सिर्फ हूँ,,, की आवाज आई और वह बड़ी मुश्किल से अपने कमरे तक पहुंचा और फिर से लेट गया,

ऐसा हो सकता है यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी और रमा इस दुर्घटना के बाद तीन दिन तक काम में नहीं गया, बस शरीर में हल्दी चूना लगाकर खात में पड़ा रहा, चौथे दिन जैसे तैसे वह अपनी सायकल से काम पर निकल रहा था की उसकी पत्नी ने फिर दहाड़ लगाईं - शाम को काम ख़त्म करके सीधा यहीं आना और कहीं नहीं जाना . रमा ने दबी आवाज में हाँ कहा और काम पर चला गया, इसके बाद वह कई दिनों तक शराब के ठेके में नजर नहीं आया, फिर अचानक एक दिन रमा के ससुराल वाले आये, रमा को यह पता ही नहीं था और आज वह हिम्मत करके शराब पीकर घर पहुंचा, घर के अन्दर पहुंचने ही उसने कुछ मेहमान देखे मगर नशे में धुत्त उसने गाली गलौच शुरू कर दी आज वह सोच कर आया था की खूब हंगामा करेगा और अपनी बीवी से बदला भी लेकर रहेगा .

उसकी आवाज सुनकर अनुपमा उसके सामने पहुँची और उसे घूरते हुए उसके कान में धीरे से कहा “लगता है आप भूल गए की उस रात क्या हुआ था, फिर से बांस निकालूं या आप चुपचाप खाना खाने बैठ रहे हैं ? सोच लीजिये आज अगर कुछ भी ऐसा वैसा किया तो घर के बाहर निकाल कर पीटूंगी,उसकी सुर्ख लाल आँखे देख रमा डर गया, पुराने घाव याद आ गए वह हाथ मुंह धोकर चुपचाप खाना खाने बैठ गया और खाना खाकर वह शांति से सो गया,

इस घटना के बाद उसका पीना बंद हो गया और कभी वह संगती में गलती से पी लेता है तो थोडा सा ही पीता है जिससे वह इंसान और जानवर में फर्क कर सके फिर भी घर पहुंचकर अगर उसके पैर लड़खड़ाए तो उसकी पत्नी उसके कान में कुछ कहती है जिससे वह भीगी बिल्ली बनकर शांत बैठ जाता है .

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