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सामने की खिड़की वाला भूत | Saamne ki khidki waala Bhoot


अपने संघर्ष के दिनों में, मै, एक चार मंजिला भवन के रूम नंबर 558 में रहा करता था, जो, डी.एन. नगर, अँधेरी पश्चिम, मुंबई में स्थित है, इस एक कमरे में चार लोग मिलकर गुज़ारा किया करते थे, हम चारों लोग फिल्म उद्योग में स्थापित होने के लिए परिश्रम कर रहे थे, तब अपने कमरे में, मै ही एकलौता अपवाद था, जो की लेखक था, बाकी दोस्त अभिनय क्षेत्र में हाथ आजमा रहे थे, बात उन दिनों की है जब, शक्तिमान नामक कार्यक्रम दूरदर्शन पर प्रसारित होना शुरू हुआ ही था, और मै अपने शहर मैसूर से यहाँ किस्मत आजमाने चला आया,

मेरी दो किताबें कन्नड़ भाषा में प्रकाशित हो चुकी थी, और उसे न तो परिवार वालों ने, न ही मेरे शहर में किसी ने गंभीरता से लिया, ऊपर से शादी के लिए लड़की देखने जाने पर, जब पूछा जाता की - लड़का क्या करता है ? जवाब में लेखक सुनकर दरवाजा मुंह पर बंद कर दिया जाता, और घरवाले इसी चिंता में घुले जा रहे थे, ऊपर से कोई काम-धाम में मै टिकता नहीं था, किसी ने सच ही कहा है लेखक के बारे में - किसी लेखक को मरने के बाद ही सम्मान मिलता है, तो मैंने अपना शहर छोड़ मुंबई जाना ही बेहतर समझा, अपने मित्र शिव एम्. पिल्लई , जो वहीँ रहता था, उससे मेरा दुःख देखा नहीं गया और उसी ने अपने कमरे में मुझे बुला लिया,

यहाँ भी कोई ख़ास आदर प्राप्त नहीं हुआ, जो की एक लेखक को मिलना चाहिए, मेरी हिंदी भी कुछ ख़ास नहीं थी, और कन्नड़ भाषा वाला लहजा, मुझे हिंदी सीखने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और मेरे बोलने का लहजा भी धीरे धीरे सुधरा, मगर पूरा नहीं, चकाचौंध रोशनी और सपनों से भरा शहर, यहाँ पर इतने अवसर हैं बस आपको प्रयास करते रहना है, यही इस शहर का नियम है, और मुंबई कभी किसी को भूखा पेट नहीं सुलाती ये भी सत्य है, सिर्फ आदमी को मेहनती होना चाहिए, साथ ही इतने कलाकार भरे हैं तो लगातार प्रयास करना बहुत आवश्यक था,

मेरे कमरे में, कुछ ख़ास नहीं था जिसका मै वर्णन कर सकूँ, एक स्नानघर, एक रसोई और सामने एक बालकनी, मुंबई के हिसाब से बहुत अच्छी जगह है ये, साथ ही वह बालकनी मेरे लिए वरदान थी, मै वहीँ घंटों बैठकर कहानियां लिखता और वहां रखे एक गमले में एक दुर्बल और पोषण विहीन “शमी” का पेड़ था, मेरे घर में भी ऐसा ही पौधा है, साथ ही मेरे शहर में भी शमी के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं. शंकर भगवान् की पूजा में इस पौधे के पत्ते का विशेष महत्त्व होता है, तो मै उसी पेड़ के पास बैठकर अपने शहर के हरियाली को याद करता और रोज इस गमले में पानी डाला करता,

कई बार जब मै नई कहानी लिखता तो सबसे पहले उसी पौधे को सुनाया करता, लोग अकेलेपन में खुद से बातें करने लग जाते हैं, मेरे पास तो एक विशेष पौधा था, दिनभर मै फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के चक्कर लगाया करता, अपनी कहानी को किसी निर्माता को बस एक बार सुनाने के लिए मन व्याकुल था, फिल्म उद्योग में “खान नायको की पकड़ मजबूत हो रही थी, इस दौर में विविध प्रकार की फिल्मे बन रही थी जैसे,- प्यार तो होना ही था, करीब , अर्थ , छोटा चेतन , सात रंग के सपने , दिल से … आदि . बहुत ज्यादा ही प्रयोग किया जा रहा था फिल्मों की कहानी को लेकर, जिससे मुझे हिम्मत मिल रही थी की मेरी कहानी भी किसी निर्माता को ज़रूर पसंद आ आयेगी,

लेकिन दिल्ली अभी दूर थी, रोज जब मै थक हार कर अपने चौंथे माले के कमरे में पहुंचता, तो मुझे ऐसा लगता की सामने वाली बिल्डिंग की एक खिड़की में रौशनी हुई, वह तीसरे तल पर था, और उसके सामने ढेर सारे नारियल के पेड़, कभी कभी जब हवाएं तेज चलती तो वह खिड़की नारियल के पत्तों से ढँक जाती, मानो मेरे साथ लुका छुपी खेल रही है, ऐसा प्रतीत होता था, मै दो चीजों के साथ अपना समय व्यतीत करता था, एक था मेरा शमी का पौधा दूसरा था मेरे बालकनी के सामने वाली खिड़की, जिसमे से मानव आकृति नजर आती थी, और हमेशा मेरे आने पर ही बत्ती जलती,

मुझे लगता था की यह मेरा भ्रम हो सकता है, इसलिए मैंने कई बार अपने साथियों से पूछा जब मै कभी कभी इस शहर में नहीं रहता या रात में घर नहीं आता तो क्या सामने वाले खिड़की से बत्ती जलने की रौशनी आती है ? वे हमेशा मना कर देते थे, लेकिन कई बार उन्हें मेरी मौजूदगी में वह खिड़की प्रकाशित नजर आती, और मुझे वे लोग चिढाते - वहां जरुर कोई भूतनी रहती है जो की तुम पर फ़िदा है “ मै हंसकर टाल जाता, लेकिन उस खिड़की से भी एक अजीब सा रिश्ता जुड़ गया था,

अब तो आदत से बन चुकी थी, की रोज दिन भर धक्के खाकर घर लौटना, शाम को, मेरा पौधा और सामने की खिड़की वाला अनजान दोस्त, यही दिनचर्या बन चुकी थी, इस दौरान छोटे-मोटे लेख और विज्ञापन लिखकर मेरा गुज़ारा हो रहा था, और घरवाले तो जैसे मुझे वापस मैसूर बुलाने पर तुले ही थे.
सन 1999 के अंतिम माह में, एक धारावाहिक निर्माता से बात हुई जो नया धारावाहिक, बनाने के लिए कहानी की तलाश में था, मैंने उसे अपने कालेज के समय में लिखी एक औरत की दुखभरी दास्ताँ सूना दी, जो उसे बेहद पसंद आई, उन्होंने अपना टेलीफोन नंबर दिया और एक सप्ताह बाद फोन करने के लिए कहा, मुझे लगा अब काम बन जाएगा, नया साल आने वाला था,
इस शताब्दी का अंत साथ ही इक्कीसवी सदी की शुरुआत होने वाली थी, इस शहर में जैसा गणेशोत्सव मनाया जाता है, वैसा कहीं और नहीं, वैसे ही अभी क्रिसमस का वक़्त था, इसाई समुदाय के साथ पूरा शाहर क्रिसमस और नए साल की विशेष तौर से सजावट और तैयारी कर रहे हैं, यही तो इस शहर और हमारे देश की सबसे बड़ी खासियत है,

साथ ही किसी भविष्यवक्ता ने भविष्यवाणी की थी, की नए साल से एक दिन पहले याने एकत्तीस दिसंबर को यह दुनिया समाप्त हो जायेगी, बहुत लोगों को इस बात से डर था, वैसे मुझे पहले डर नहीं लगता, लेकिन मुझे तो उसी दिन उस निर्माता को फोन करना है, इस लिए थोडा सा मै भी डरा ,
आने वाले दिन खूब मस्ती के साथ कट गए, आज 31 दिसंबर है, मैंने ग्यारह बजे फोन लगाया, और मेरी बात हुई, उन्होंने मुझे तीन दिन बाद अपने स्टूडियो बुलाया, और कहा, मेरे सहयोगियों को भी कहानी सुनना है, अगर उन्हें पसंद आ गई तो तुम्हारा चुनाव हो जाएगा. मैंने धन्यवाद कहकर फोन रखा, और ख़ुशी से नाचते हुए , यह खुशखबरी अपने मित्र पौधे और सामने वाली खिड़की को सुनाई, साथ ही मै अपनी कहानी को अच्छे से तैयार भी करने लगा, उस समय अधिकाँश धारावाहिक निर्माण कार्य मुंबई में होने लगे थे, पहले तो दिल्ली में धारावाहिक निर्माण कार्य ज्यादा हुआ करता था,

उसी दिन शाम को अधिकाँश जगह भारत में, बादल छा गए थे, बिजली कडकी, तूफ़ान के साथ खूब बारिश भी हुई थी, मानो दुनिया का अंत हो ही जायेगा, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ, लोग रात भर नाच गाकर नए साल का जश्न मनाते रहे, मेरी बिल्डिंग के नीचे भी अधिकाँश लोगों ने देर रात तक, खाया-पिया, खूब मौज मस्ती की, और तीन तारीख को मै दस बजे बताये गए जगह पर पहुँच गया, जी.आर. स्टूडियो . चेम्बूर. यहाँ बिना तकलीफ मुझे प्रवेश मिला .
एक अच्छे से सजे और शानदार कमरे में पांच लोगों को मैंने अपनी कहानी सूना दी, इसे दो साल की भड़ास कहें या मेरे अन्दर का विचारक - मैंने पूरी कहानी स्पष्ट और एकलय होकर सुनाई, कहीं कोई गलती नहीं की न ही मै कहीं अटका. उनके सवालों और शंकाओं का भी सही जवाब दिया, उन लोगों ने मेरी कहानी को चुन लेने का फैसला कर दिया, और बधाई दी, पहली बार आज मुझे यहाँ अपनापन लग रहा था,

उस दिन मै बहुत खुश था, और देर रात तक बालकनी में ही बैठा रहा, आज भी अभी तक सामने वाली खिड़की खुली है, और कोई मानव आकृति नजर आ रही है, वैसे मै अभी तक उस परछाई में किसी पुरुष या महिला का चेहरा, नहीं तलाश पाया था, और उसे जानने की उत्सुकता थी, कई बार मैंने उस बिल्डिंग में घुसकर, उस खिड़की वाले घर के सामने गया, दरवाजा हमेशा अन्दर से ही बंद मिलता, जो भी हो वह खिड़की मेरे जीवन का आधार बन चुकी थी, बस उस खिड़की को देखकर, मेरी सारी नकारात्मक सोच तुरंत खत्म हो जाती थी, उस खिड़की से दिखने वाला प्रकाश मुझे हमेशा आशा की किरण प्रतीत होती थी, एक रहस्य और तेज आकर्षण मुझे हमेशा उस खिड़की से जोड़कर रखता, और मात्र उसी के सहारे मैंने कई साल बिताये .

इस शहर में एकाकी जीवन, लड़के लड़कियों का स्वछन्द घूमना, पाबंदी के बिना जीवन यहाँ आम बात है, अधिकाँश पड़ोसियों के पास समय नहीं रहता की वह बगल में ताक-झाँक करें या अपने पड़ोसी का चरित्र प्रमाण पत्र बनाएं.

संभावित धारावाहिक की तैयारियां होने लगी, संवाद और गीत लिखे जाने लगे, अभिनेताओं, का चुनाव और सारी चीजों का अंतिम फैसला कर दिया गया, फिर शूटिंग भी शुरू हुई और उसके बाद मेरा लिखा कार्यक्रम, अगस्त माह से टेलीविजन पर प्रसारित होने लगा, जिसको काफी लोकप्रियता भी मिली, हालांकि मेरे परिवार वाले इस कार्यक्रम को नहीं देख पाए क्योंकि उन्हें हिंदी समझ नहीं आती, लेकिन फिर भी वे, मेरे लिखे इस धारावाहिक के बारे में सबको बताते, इसके बाद मुझे काम मिलने लगा, और धीरे धीरे मै अच्छा कमाने लायक बन गया,
फिर फिल्मों की बारी आई उसमे भी मुझे सफलता मिलने लगी, और साथ ही मेरी कुछ और किताबें भी प्रकाशित हुई, मेरे कमरे के मित्र गणों को भी मैंने अपने धारावाहिकों और फिल्मों में काम दिलाया, जिससे उनको भी अच्छी गति मिल गयी,

अब मै लोखंडवाला काम्प्लेक्स में एक नए घर में स्थानांतरित हो गया, और परिवार वालों की पसंद से मैंने 2007 में आखिरकार शादी कर ली, मेरे मित्र भी अब अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित हैं,
मैंने वह पौधा, गमले सहित अपने नए घर में स्थानांतरित कर लिया, बस कमी थी तो मेरे खिड़की वाले भूत की, लेकिन समय ही नहीं मिलता था की अपने पुराने बिल्डिंग में जाकर अपने पुराने मित्र को कुशल क्षेम बताऊँ. पूछूं.

लेकिन दिसंबर 2008 में एक दिन अचानक बिना कोई योजना बनाए अपने पुराने सोसायटी में पहुंचा, लेकिन वहां पर सिर्फ गणेश जी की मंदिर ही बची थी, बाकी की ज़मीन पर गगन चुम्बी इमारत बन चुकी है, न ही कोई पुराना ठेला वाला , पाव और सब्जी वाला कुछ नहीं दिखा, मेरा मन भर आया,

उस अनजाने भूत को या मेरे गरीबी के दोस्त को मैं, आखिरी बार ठीक से विदा भी नहीं कर पाया. इतना देर से आने पर मै अपने आप को देर तक कोसता रहा. यही एक बात है जिसे याद करके मै आज भी दुखी हो जाता हूँ. …………

समाप्त 

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