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प्रेम का दुष्प्रभाव ( सम्पूर्ण ) | Prem ke dushprabhav (Complete)

श्रीमान गुलशन टंडन जी, यह नाम कौन नहीं जानता पूरे छतरपुर जिले में, खजुराहो क्षेत्र के थाने में हवलदार के पद पर कार्यरत, मजाल है कोई उनके द्वारा बताये कानून और ज्ञान को काट दे, गुस्सा हर समय इनके साथ ही विचरण करता है, इसलिए यहाँ के चोर उचक्के इनसे दूरी बनाकर रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं,
लेकिन पता नहीं कैसे, इनके अन्दर ज्ञान प्राप्ति और भक्ति भावना की ललक हुई और जुड़ गए सतसमाज नामक धार्मिक संगठन से, यहाँ पर वे बड़ी विनम्रता से व्यवहार करते हुए दिख जाते, जो की दुर्लभ है, साथ ही इनके साथ पूरे परिवार को भी इस क्रिया में सहभागिता करनी पडी, इनकी पत्नी और दो लडकियां भी इस संगठन द्वारा दीक्षित हुई, और हर सप्ताह, सोमवार की शाम इस संगठन के सभी सदस्य इसी संगठन के भवन में सत्संग लाभ लेने पहुँच जाते,
कुछ दिनों बाद इन्होने अपने पुराने किराए के मकान को अलविदा कहा, फिर आ बसे खजुराहो शहर के रामनगर में, यहाँ उनका मकान बनकर पूरा हुआ और फिर आ गए यहीं, यहाँ से उनका थाना और धार्मिक सत्संग स्थल भी पास पड़ता था, यहाँ आते ही उन्होंने अपना रंग दिखा दिया और पड़ोसियों को दो दिन में ही उनका व्यवहार समझ आ गया, घर में दो सुन्दर कन्याएं थी इसलिए, उन्होंने मोहल्ले के किसी भी लड़के या उनके घरवालों से किसी प्रकार की दोस्ती नहीं की,
उनके घर में सख्त पाबंदी लगा रखी है, वहां सिर्फ उनके परिचित, रिश्तेदार ही आते हैं, या तो सत्संग का कोई भी इंसान आया तभी यहाँ खातिरदारी होती, उसकी बड़ी बेटी का नाम ललिता जो की अभी कक्षा दस में है, और छोटी का नाम लक्ष्मी जो की अभी छटवीं कक्षा की छात्र है, दोनों बहनें नए घर और नए स्कूल से ज्यादा खुश नहीं है, परन्तु क्या करें पिताजी से कौन कहे, उनकी पत्नी बहुत सुन्दर और वह भी पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए, चुपचाप, पतिदेव की हर आज्ञा का पालन करती है,
हर सोमवार की शाम पूरा परिवार सतसमाज के सत्संग जरूर जाता, और श्रीमान टंडन साहब ऐसे भी अपने काम में बहुत मशगूल रहते थे, तो वह समय निकालकर यहाँ अवश्य जाते थे, परन्तु पड़ोसियों से कोई सहयोग और स्नेह नहीं था उन्हें, इसी कारण कई बार छोटी मोटी लड़ाई जरुर हो जाती, क्योंकि यहाँ भी एक से बढ़कर एक सरकारी अधिकारी निवास करते थे जो की पुलिस से नहीं डरते, वैसे भी पुलिस से सिर्फ गरीब और लाचार लोग ही डरते हैं,
एक दिन ललिता की कक्षा का लड़का उनके घर पहुंचा, इसका नाम सोहन है, इसको देखकर उसके पिताजी नाराज नहीं हुए उल्टा “आओ बेटा आओ कैसे हो कहने लगे, यह अपने परिवार का इकलौता प्राणी है जो सत्संग में आता है, उन्होंने उसे बिठाया फिर पूछा "कहो बेटा कैसे आना हुआ ? “बस ऐसे ही आ गया अंकल, और ललिता से मुझे गणित की कॉपी चाहिए, वो क्या है ना मै पिछले दो दिन स्कूल नहीं गया था, तो सोचा आपका घर पास है, इसलिए चला आया,
ललिता उसे कई दिनों से देख रही है, ये लड़का स्कूल में उसे ही घूरते रहता है, कई बार उसने बात करने की कोशिश की, मगर वह सफल न हो पाया, उसके बाद पता नहीं कैसे उसने मजनू बनते हुए यह भी पता लगा लिया की मै, सतसमाज के सत्संग जाती हूँ, तो वहां भी आ धमका, आज तो इसने हद ही कर दी, घर तक चला आया, लेकिन क्या करें, पिताजी से कह नहीं सकते, ऊपर से बहाना भी अच्छा बनाकर आया है, और उसने अनमने मन से उसके लिए चाय नाश्ते का प्रबंध किया और साथ में उसे गणित की कापी भी थमाई,
सोहन प्यासी नज़रों से उसे देख रहा था, और कॉपी लेते समय उसने ठंडी सांस भी छोड़ी, मन में वह छटपटा कर रह गई, अगले दिन उसने कॉपी लौटाते हुए स्कूल में फिर बात करने की कोशिश की, मगर ललिता नजरें झुकाए कॉपी लेने के बाद कुछ न बोली, वह भी बड़ा जिद्दी प्राणी है, उसने तो जैसे ठान लिया है की उससे बात करके ही रहेगा, और सत्संग में भी वह इसीलिए आने लगा ताकि ललिता को देख सके, धीरे धीरे उसने उसके सारे दोस्तों से भी दोस्ती कर ली,
एक तरफ मोहल्ले के लड़के थे, जो की उस घर में घुस भी नहीं पाते थे, दुसरी तरफ ये लड़का था, जो सीना तान के टंडन साहब के घर घुस जाया करता, मोहल्ले के लड़के कई बार जलन के मारे उसके सायकल की टायर से हवा निकाल देते थे, ललिता की बहन लक्ष्मी भी सोहन को पसंद करने लगी और इन दोनों में भी दोस्ती हो गई, अब तो जैसे सोहन उस घर में बेरोकटोक कभी भी घुस जाता, ललिता अन्दर ही अन्दर कुढ़ कर रह जाती,
समय के साथ साथ सोहन की हिम्मत और बढती जा रही थी, वह पूरी ताकत लगाकर उसे पाने के लिए मेहनत करता रहा, एक दिन स्कूल में कोई शिक्षक नहीं आया था, और पीछे बैठे लड़कों ने ललिता की सुन्दरता पर भद्दी टिपण्णी कर दी, वह रोने लगी, सोहन यह बर्दाश्त न कर सका और, वह तुरंत उठा, वहां पहुंचा जहां से टिप्पणी हुई थी, वह जोर से चिल्लाया “कौन बोला ?? और प्रश्नवाचक नजरों से लड़कों को घूरने लगा, एक लड़का गुंडे की तरह उठा जो की अपनी कॉलर चढ़ा के बैठा था, दिखने में हष्ट-पुष्ट और सीना ताने हुए बोला “मैंने बोला था, क्या कर लेगा तू मेरा ?
अगले ही क्षण उसने टेबल पर रखी मोटी पुस्तक उठाई और उसके चेहरे पर दे मारी, इससे पहले की वह गुंडा सम्हल पाता, उसने उसका सर दीवार में ठोंक दिया, उसके सर से खून बहने लगा, वह अपना होश खोने लगा, साथ ही उसका गुस्सा शब्दों में बयान हो रहा है, -- “तेरी हिम्मत कैसे हुई उसको ऐसा बोलने की, "बहुत शौक है न बेटा गुंडा बनने का, पीछे से कमेन्ट पास करने का, ले अब और मजा ले, उसने दोबारा उसका सर दीवार में ठोंकने के लिए उसके बालों को जोर से खीचा, तभी पास में बैठे लड़कों ने उसको रोका और बड़ी मुश्किल से उसके गुस्से को शांत किया गया,

लड़कियों की हालत और खराब हो गई, सबकी चीख निकल आई, ललिता को यह अच्छा तो लगा था, की किसी ने उसके लिए लड़ाई की, और साथ ही आज इसे सोहन अच्छा भी लगा, लेकिन उसे डर था की यह बात घर में पहुँची तो पिताजी पता नहीं क्या करेंगे,

बात तुरंत हेडमास्टर तक पहुँच गई, उसे स्कूल से निकालने की बात उठी, उसके घर में सूचना भेजी गयी की आपके लड़के ने स्कूल में गुंडागर्दी की है, एक बच्चे का सर फोड़ दिया, उधर से आवाज़ आई, मै तुरंत स्कूल पहुँच रहा हूँ, ये उसके पिताजी थे, उसे हेडमास्टर साहब के कमरे के बाहर एक बेंच में बिठा दिया गया, और वह अब भी गुस्से में ही दिख रहा है, कुछ देर बाद सोहन के पिताजी अपनी वर्दी पहने पुलिस जीप में, स्कूल पहुंचे, वे खजुराहो थाने के थानेदार हैं, उनका शानदार व्यक्तित्व और तंदुरुस्त शरीर वर्दी के साथ और चमक रहा है,

उन्होंने सारी परिस्थिति को सम्हाल लिया और हेडमास्टर के सामने अपने बेटे, सोहन को डांटने का अभिनय भी किया, इसके बाद उसे चेतावनी देकर वापस कक्षा में भेज दिया गया, सोहन के बारे में अब सब जान गए थे की यह थानेदार का बेटा है, उसने कभी भी इसका जिक्र किसी से नहीं किया था, न ही कोई ऐसा लड़का था, जो की उसका अच्छा दोस्त हो, इसी साल तो वह इस स्कूल में आया था, अब ललिता उसकी तरफ देख रही थी, मगर सोहन अब कक्षा में बैठे सामने की तरफ घूरता रहा बस, आज उसने ललिता की तरफ देखा भी नहीं, और कक्षा ख़त्म होते ही वह ललिता का पीछा किये बिना घर चला गया,
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रात को सोते वक्त ललिता को आज बड़ा अजीब लग रहा है, वह सो नहीं पा रही है, मन में कई सवाल - “क्या अब सोहन मुझसे बात नहीं करेगा ? मैंने उससे बात भी तो नहीं की कभी, पता नहीं वो मुझसे दोबारा बात करेगा भी की नहीं, वह अपने बिस्तर में लेटी इसी तरह सोच रही है, बगल में सो रही उसकी बहन लक्ष्मी गहरी नींद में है, उसने आँख बंद करके फिर से सोने का प्रयास किया, मगर सो नहीं पाई, ऐसे ही रात बीती, और वह जल्दबाजी में स्कूल के लिए निकली, सोहन आज नहीं दिखा, और कई दिन वह विद्यालय ही नहीं आया, अब ललिता इस कमी को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है, उसका कोमल ह्रदय उस घटना को याद करता और खो जाता, “तेरी हिम्मत कैसे हुई उसको ऐसा बोलने की, यह सोहन के शब्द उसके कानों में गूंज रहे हैं, इस उम्र में सही गलत का निर्णय करना नहीं आता, जिसने प्रभावित कर दिया वह हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करता है,

एक सप्ताह बाद आज सोहन कक्षा में दिखा, ललिता खुश हो गई, और आज भी सोहन उसकी तरफ नहीं देख रहा है, न ही वह किसी लड़के से बात कर रहा है, अब ये बात उसको सताने लगी, मन को समझाना भी मुश्किल था, और अंततः वही उसके पास गई और बोली- “क्या मै यहाँ बैठ जाऊं ? उसने कोई जवाब नहीं दिया, न ही उसकी तरफ देखा, ललिता की शकल रोने वाली हो गई, कई दिन ऐसे ही बीते, ऐसा लग रहा था मानो, अब सोहन बदला ले रहा हो, इतने दिन उसने भी तो बात नहीं की थी, वह मन ही मन उससे प्रेम करने लगी, और विरह वेदना में जलने लगी, विज्ञान की कक्षा के बाद सोहन पुस्तकालय जाने लगा, ललिता उसके पीछे दौड़ी, और आज पुस्तकालय में कोई नहीं था, उसे अच्छा अवसर मिल गया अपनी बात रखने का, उसने किताबों की आलमारी के सामने अपना हाथ रख दिया, सोहन उसी आलमारी को खोलकर किताब निकालने ही वाला था,
वह बोली “मै जानती हूँ की मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया, कभी तुमसे ठीक से बात नहीं की पर अब देखो,, मै खुद तुमसे बात करना चाहती हूँ, देखो मुझे और मत रुलाओ, मै बहुत गिर गई हूँ अपनी नजरों में, क्या मै इतनी बुरी हूँ की तुम मुझसे बात नहीं करोगे ? और वह रो पड़ी, सोहन ने रूखे अंदाज में कहा - “देखो ये रोना बंद करो, मै ठहरा गुंडा, आवारा लड़का जो लड़कियों का पीछा करता है, तुम ऐसे लड़कों से कहाँ बात करोगी ? उसने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, ललिता ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “ नहीं मै ऐसा बिलकुल नहीं समझती,

“मै तो तुमसे प्रेम करती हूँ, प्लीस मुझे अपना लो आई लव यु.
ये शब्द सुनते ही, सोहन थोडा सा मुस्कुराया, और उसके दोनों कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, मै भी तो तुमसे कबसे यही शब्द कहना चाहता था, आई,लव यू टू. और वह भी रो पड़ा, आज जो ख़ुशी ललिता को मिली वह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, वह चौंकते हुए बोली “सच. “क्या सच में तुम मुझसे प्यार करते हो ? या मुझे बहला रहे हो ? उसने कहा “मै सिर्फ तुम्ही से प्यार करता हूँ और जिन्दगी भर करता रहूंगा, और मेरी आख़िरी सांस तक सिर्फ तुम्हारा नाम ही लेता रहूंगा,

अगर ये बात कोई अध्यापक सुन लेता तो उसे अपने कानों में यकीन ही नहीं होता की दसवीं कक्षा में पढने वाले बच्चे इतना ज्यादा नौटंकी भी कर सकते हैं, उनकी भावना का अधिकाँश भाग सिनेमा से प्रभावित था,
सोहन अब मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा और ललिता के निकट पहुँच गया, अचानक उसके दिल की धड़कन बढ़ गई, और पेट में अजीब सी खलबली मच गई, सोहन उसके और निकट पहुंचा, और उसके गाल को चूमने ही वाला था की, ललिता उसे धक्का देकर वहां से मुस्कुराते हुए भाग गई,

उफ़... ये पहला प्यार, बहुत ही जानलेवा होता है, कहीं का नहीं छोड़ता, इन दोनों को भी यही बीमारी हो गई, और बहुत ही सावधानी से, किसी को नजर आये बिना अपने प्रेम का गुप्त रूप से संचालन करने लगे, अब तो सत्संग में भी बातें होने लगी, और मुलाकातें भी बढ़ी, जब से टंडन जी को यह पता चला था की सोहन के पिता दरोगा हैं, तब से उसकी विशेष आव भगत की जाने लगी, ऐसे ही सर्दियों के समय शीतकालीन अवकाश में, टंडन जी ने लखनऊ में होने वाले वार्षिक समागम में जाने की योजना बना ली, सभी तैयार और सही तिथि पर सभी लोग रेलवे स्टेशन भी पहुँच गए थे, टंडन जी ने पुलिस जीप से अपना पूरा परिवार सामान सहित वहां बुलवा लिया था, और खुद थाने से यहाँ अपनी मोटरसायकल में पहुंचे, यहाँ से इसे कोई सिपाही उस मोटर सायकल को थाने ले जाकर रख देगा,

अचानक श्रीमती जी को याद आया की उनके चूड़ियों का बक्सा तो घर पर ही छूट गया, अब क्या करें, तभी ललिता बोली मै सोहन के साथ आपकी मोटर सायकल में घर चली जाती हूँ और तुरंत ही वह बक्सा मै ले आउंगी, बात जम गई, और फ़ौरन ही, दोनों घर की चाबी लेकर निकल पड़े, सोहन गाडी चलाने में भी माहिर् था, उसने बहुत तेजी से गाड़ी चलाई और घर पहुँच गए, दोनों घर के अन्दर दाखिल हुए और दो मिनट में ही सामान लेकर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ भागे, उनकी मोटरसायकल हवा से बात कर रही है, पीछे बैठी ललिता हलके मुस्कान के साथ गाल-लाल, लिए थोड़ी शरमा भी रही है, आज घर में कुछ देर पहले सोहन ने उसे चूम लिया था, ऐसी बातें लडकियां कभी नहीं भूलती,

उसके बाद इन लोगों की लखनऊ यात्रा बहुत ही मनोरंजक रही, ट्रेन में खूब मस्ती हुई, सफ़र के दौरान लक्ष्मी ने सोहन को बताया, वाह भैया क्या बात है आप तो बहुत ही महान हो, सोहन ने पूछा क्यों ? तो उसने जवाब दिया “मेरे पापा अपनी गाड़ी किसी को भी चलाने नहीं देते, लेकिन आपको दे दिया, वाह ! …
इस समागम में पूरे देश भर के भक्त और श्रद्धालु पहुंचे थे, यहाँ बहुत लोग ऐसे भी थे जो मुफ्त में लखनऊ घूमने आये थे, सबका अपना अपना स्वार्थ होता है, कोई ऐसे ही किसी से जुड़ नहीं जाता,
इस यात्रा में बच्चों को खूब आनंद आया, और चार दिन के इस कार्यक्रम में सोहन और ललिता को एकांत में भरपूर समय मिला, वे दो दिन तो अकेले ही लखनऊ घूमते रहे, टंडन जी को इससे कोई आपत्ति नहीं हुई, “भला इस सत्संग का लड़का कैसे मेरी बेटी के साथ कुछ गलत कर देगा, ऊपर से वह मेरे अफसर का लड़का है, इसी तरह ये यात्रा संपन्न हुई,

इन दोनों का प्रेम प्रसंग अभी तक गोपनीय था, किसी को कानो कान खबर नहीं थी, स्कूल में भी कोई समझ नहीं पाया, हालांकि दोनों हर वक्त साथ पाए जाते, सोहन ने ललिता को सख्त हिदायत दे रखी थी, की, मेरे और तुम्हारे प्रेम के बारे में, कोई तीसरा जान गया तो मै उसी पल तुम्हे छोड़ दूंगा, और ललिता ने ये बात अपनी बहन लक्ष्मी. तक, को नहीं बताई थी,

कक्षा बारहवीं तक सब कुछ ठीक चला, मगर ललिता ने ध्यान दिया की सोहन आजकल दुसरी लड़कियों पर भी ध्यान देता है, और उसी की कक्षा की मानसी के साथ भी वह खूब बातें करता है, उसके देखने और बात करने का तरीका बिलकुल, किसी आशिक की तरह होता था, इस बात पे कई बार लड़ाई भी हुई, अब इन दोनों में रूठने मनाने का दौर चलने लगा, कई बार सोहन गुस्से में आकर खूब शराब पी लेता या अपने हाथ काट लेता, जो ललिता को बाद में पता चलता, और ऐसा होने पर हर बार उसे अपराध बोध का अहसास होता था, मगर वो भी क्या करे ? देखकर मक्खी भी तो नहीं निगल सकती . और अब तो हद ही हो गई थी, सोहन और मानसी के प्रेम के चर्चे पूरी कक्षा में होने लगे,

और जब इस बारे में उसने सफाई मांगी, तो सोहन पैंतरा बदलते हुए बोला “ऐसा नहीं है, मै तो लोगों को जान बुझकर ऐसा जता रहा हूँ, ताकि कोई तुमपर शक ना कर सके, मुझे तुम्हारी इज्जत की बहुत परवाह है, इसीलिए भले ही, उसका नाम बदनाम हो जाए. पर तुम्हारा नहीं होने दूंगा, बस मेरे प्यार पर भरोसा रखो, ललिता फिर मान गई और उल्टा वह खुश होकर उसके गले लग गई,

अब वह लड़कियों के मुंह से अक्सर सुनती थी, की दोनों होटल गए थे, साथ घूमते और खाते पीते हैं, और सबकुछ कर के बैठे हैं, सोहन अब बहुत बिगड़ चुका है, बाप के पैसे से खूब अय्याशी करता है, और उसने इस इलाके के सारे आवारा और बदमाश लड़कों से दोस्ती कर ली है, कभी भी किसी को भी पीट देते हैं, मगर प्यार में अंधी ललिता को कुछ भी बुरा दिखाई न दिया, वो सोचती थी, थानेदार का लड़का है, पैसे की कमी नहीं है तो दोस्त तो बनेंगे ही, अब वो बुरे हैं तो इसमें उसकी क्या गलती, और वह शराब तभी पीता है जब मै उससे नाराज होती हूँ,.

दिमाग में पर्दा पड़ा हो तो अच्छे बुरे की पहचान कहाँ होती है, ललिता का इस साल पढ़ाई में बिलकुल भी ध्यान नहीं था, और उसके पिताजी ने कब से तैयारी कर ली थी, की बारहवीं के बाद ललिता को किसी बड़े कालेज में दाखिल करूँगा,
और एक दिन अनहोनी घट ही गई, सोहन और ललिता दोनों घर से स्कूल जाने निकले थे, मगर दोनों उसकी मोटरसायकल में उनके शहर से दूर, सुंदरम,, थिएटर में फिल्म देखने पहुँच गए, और सबसे पीछे बैठकर दुसरी पिक्चर चला रहे थे, ये तो आम बात हो गई है, स्कूल कालेज में पढने वाले बच्चे पीछे बैठकर पूरी बेशर्मी से चुम्मा-चांटी, करते पाए जाते हैं, जो की हमारी सभ्यता या संस्कार नहीं सिखाता, हम उस देश के वासी हैं जहां प्रेम सम्बन्ध एकांत में बनाए जाते हैं,

लेकिन इन दोनों का दुर्भाग्य आज इनके साथ ही आया था, उन दोनों से दो कतार नीचे ललिता के मामा का लड़का अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने आया था, और उसने ललिता को जब पूर्ण रूप से पहचान लिया तभी, वह उनके सामने जाकर खड़ा हो गया, ललिता इस सदमे के लिए तैयार नहीं थी, उसके मामा का लड़का विराट, गुस्से से आग बबूला हो गया, उसने सबसे पहले अपनी बहन को जोरदार थप्पड़ मारा, फिर उसने सोहन की खूब पिटाई कर दी, उसके दोस्तों ने भी खूब हाथ साफ़ किये, और सोहन को वहीँ छोड़ विराट अपनी ममेरी बहन को लेकर उसके घर की ओर निकल पडा, रास्ते भर ललिता ने अपने भाई को मनाने की बहुत कोशिश की, मगर वह नहीं माना, यही तो खराबी है, भारतीय भाइयों में, भले ही उसकी कई प्रेमिकाएं हो मगर अपनी बहन का कोई लड़का मित्र भी उसे फूटी आँख नहीं सुहाता,

घर पहुँचते ही, विराट ने सारा किस्सा सूना दिया, साथ में थोडा मिर्च मसाला लगाया सो अलग, हवलदार टंडन साहब फोन किये जाने पर तुरंत घर पहुंचे, और आज ललिता की खूब मरम्मत हुई, उसे कई दिन स्कूल जाने नहीं दिया गया, बड़ी मुश्किल से उसकी मां ने टंडन साहब को मनाया की आखिरी साल है स्कूल का, ये आखिरी परीक्षा उसे दिला देने दो, फिर इस लड़की का घर से निकलना बंद कर देना, और टंडन साहब मान गए, अब ललिता पर नजर रखी जाने लगी, जिन-जिन को शक था, की दोनों के बीच कुछ खिचडी पक रही है, उन्हें भी अब ललिता पर कीचड उछलने का अधिकार मिल गया, स्कूल और मोहल्ले में बदनामी हुई वो अलग, सत्संग में भी टंडन परिवार सोहन से कोई बात नहीं करता, सोहन अब उसके घर पर नहीं जाता,

टंडन साहब को भरोसा ही नहीं हो रहा था, सोहन जैसा लड़का जो सत्संग में इतनी सारी ज्ञान की बातें करता है, जो हमेशा नशे से दूर रहने और परमात्मा प्राप्ति पर अक्सर सुविचार प्रगट करता है, वो लड़का इतना बिगड़ा हुआ है, जो शराब और सिगरेट पीते हुए कहीं भी दिख जाता है, उस लड़के को कई बार घर में उन्होंने खाना खाने, रोक लिया था, साथ में हिंदी फिल्मे देखने वह घर में अक्सर आया करता था, वह लड़का इतना दुष्ट निकलेगा, ये उनकी कल्पना से परे था,

ऐसे ही कुछ दिन बीते थे, की खबर आई , विराट को उसके गाँव में ही कुछ गुंडों ने बहुत बुरी तरह से पीट दिया है, वह अपने दोस्तों के साथ चाय की टपरी पर बैठा था, अचानक कुछ लड़के आये और वो भी चाय पीने लगे, और छोटी सी बात पर इन लोगों की बहस हो गयी, और विराट और उसके दोस्तों को खूब पीट दिया गया, ये खबर सुनकर टंडन जी समझ गए की इसके पीछे किसका हाथ है, लेकिन वो कुछ कर भी नहीं सकते थे, थानेदार के लड़के को आखिर क्या बोल सकते थे, ललिता भी डरी सहमी सी, चुपचाप स्कूल जाती और बाकी समय घर के अन्दर.

रविवार के दिन टंडन परिवार रात का खाना खाकर टी.वी. देख रहा था, सब lलोग ध्यान से कोई कार्यक्रम देख रहे थे, तभी किसी शराबी की आवाज गूंजने लगी, और ये आवाज तुरंत पहचान ली गई, सोहन नशे में धुत्त उसके घर के बाहर खडा है, उसके पाँव लडखडा रहे हैं, वो जोर जोर से चिल्ला रहा है, “ललिता बाहर निकलो, अगर तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो तो, बाहर निकलो, अबे टंडन !! साले दो कौड़ी के हवलदार, क्या बिगाड़ लेगा तू मेरा., एक फोन लगाऊंगा , बेटा, तेरी वर्दी उतरवा दूंगा,, नहीं तो ‘ चम्बल में तेरा ट्रांसफर करवा दूंगा, वह लगातार गाली गलौच के साथ चिल्ला रहा है, उसके पड़ोसी भी बाहर नहीं निकले, टंडन साहब इसके खुद जिम्मेदार थे, जिन्दगी भर पड़ोसियों से लड़ते रहे, कभी भी उनसे अच्छा व्यवहार नहीं किया था, तो पड़ोसियों को क्या पडी थी, उन्होंने दरवाजा ही नहीं खोला, और अपने थानेदार साहब को फोन करके, इस विषम परिस्थिति से अवगत कराया, उसके पिता जी फ़ौरन जीप लेकर पहुंचे, और अपने बेटे को प्यार से सम्हालते हुए घर ले गए, उसे डांटा भी नहीं,

ललिता अब पछता रही थी, और उसे समझ आने लगा था की सोहन सही लड़का नहीं है, दो दिन स्कूल न जाने के बाद आज वह स्कूल आई है, डरी सहमी सी वह चुपचाप एक कोने में बैठी है, इस कक्षा के लड़के और लडकियां उसे ऐसे घूर रहे हैं जैसे बहुत बड़ी अपराधी हो, वो सर झुका कर बैठी रही, खाने की छुट्टी के बाद वापस कक्षा में जाने से पहले वह बाथरूम गई, यह बड़ा सा लड़कियों का बाथरूम, जिसमे दस टॉयलेट बने हुए है, एक लाइन में और उसके सामने हाथ धोने के लिए नल लगा हुआ है और उसके ऊपर , दो छोटे-छोटे आईने भी लगे हुए हैं, बाथरूम में घुसने के बाद उसने दरवाजा लगाया नहीं था की, बाजू वाली टॉयलेट से किसी लड़के की आवाज सुनाई दी, उसने धीरे से दरवाजा बंद किया और बाजू की बाते सुनने लगी,

“अरे मानसी तुम भी ना’’ किसकी बात कर रही हो, मै उस बेवकूफ ललिता से प्यार नहीं करता, मै तो तुमसे प्यार करता हूँ मेरी जान. ये तो सोहन की आवाज है “ ललिता कान लगाकर उनकी बातें सुनने लगी, अब मानसी की आवाज आई, लेकिन तुम तो उसे बहुत चाहते थे, और सत्संग भी तो जाते हो उसी की "ब्रांड वाला", सोहन - “अरे नहीं रे, मै तो बस उसको पटाने के लिए ही, उस फटीचर बाबा का सत्संग झेलता रहा, और तेरे को एक बात बताऊँ, वहां कोई ज्ञान वान पाने नहीं जाता, सब अय्याशी करते हैं, जवान लोग वहां सत्संग की आड़ में खूब रंगरेलियां मनाते हैं, और बुड्ढे लोग अपना दुकानदारी और ग्राहक बनाने के लिए उस गधों के सत्संग में जाते हैं, मै भी खूब मजा किया, और कई लड़कियों को मैंने ही लड़की से औरत बनाया,
मानसी - “तो क्या मुझे भी, खा पीकर छोड़ दोगे ?
सोहन - नहीं यार तुम तो मेरा सच्चा प्यार हो, तुमको देखते ही मै समझ गया था, की तुम्ही मेरे जीवन की असली आधार हो. तुमसे मिलकर ही मुझे पता चला, की मै क्यों जी रहा था, अब तक.
मानसी - ओह्ह सोहन,,, मुझे अपनी बांहों में ले लो,,, मै भी तुमसे सच्चा प्यार करती हूँ, मुझे कभी छोड़कर मत जाना, नहीं तो मै मर जाउंगी.
सोहन - कभी नहीं ! जिस दिन मै तुमसे दूर रहने का सोच भी लूँगा, मै उसी दिन मर जाउंगा,... ये कहते हुए उसने जोर से उसे गले से लगा लिया, उसके बाद होने वाली घटना की विचित्र और खौफनाक आवाजें आने लगी, जो बच्चों को नहीं सुननी चाहिए,
ऐसा कुछ होगा ये कल्पना से भी परे है, वो भी लड़कियों के बाथरूम में, कोई शिक्षिका भी ये सुन लेती तो भी क्या कर लेती.
ये सुनकर ललिता के दिल पर क्या बीती सिर्फ वही जाने.
इस दिन के बाद से ललिता का कोमल ह्रदय पत्थर की भाँती सख्त हो गया, उसका प्यार और इंसानियत से भरोसा उठ गया, उसने अपनी स्कूल की पढ़ाई जैसे तैसे पूरी की, उसके बाद वह कालेज की पढ़ाई करने अपने ताऊ जी के यहाँ, जबलपुर चली गई …….

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राधेकृष्ण की प्यारी लीला, श्री राम का धीरज और संस्कार हूँ मै, दुनिया को ज्ञान सत्यमार्ग बताने वाला व्यास , हाँ अन्धविश्वास हूँ मै ।
गणपति जी की प्रथम वंदना, रावण का श्राद्ध कराने वाला क्षत्रिय,अपने राष्ट्रकुल का गौरव बढ़ाने वालादेश का परम दुर्लभ इतिहास, अन्धविश्वास हूँ मै ।
देशऔर समाज बदला, बदल गए इतिहासकार,हर तकलीफ के साथ, कभी न बदल कर उपनिषदों को स्मरण करता हुआ, वेदों का ह्रदय में सहेजने वाला, पुराणोंमें रमने वाला विज्ञानहूँ मै, क्या सिर्फ अन्धविश्वास हूँ मै ।
क्या जरूरत थी धोती बचाने की, क्या जरुरत है तिलक लगाकर विचित्र दिखूं ?या अपनी शिखा की लम्बाई रोक ना पाऊं,क्यों मै दूसरों की शादी करवाता हूँ ?शुभ-अशुभ घड़ियों में निमंत्रित होकरक्यों ? मै अपमानित होकर जीता हूँ ?महान परशुराम का वंशज, क्या सिर्फ अंधविश्वास हूँ मै ।
लांछन लगाया जाता है,कभी मुझको शास्त्र सिखाया जाता है,कभी समाज मेरी गलतियों को खोजते हुए पाया जाता है,क्यों युवा वर्ग को मोह नहीं? क्यों…