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पाप और पुण्य | Paap Aur Punya

“यह विषय कृपया बुद्धिजीवियों और धर्म गुरुओं पर छोड़ दीजिये, इसकी बस एक आसान सी परिभाषा याद रखिये, जिस काम को करके किसी का दिल दुखे. या आपको कुछ पाने के लिए ऐसा करना पड़े जो गलत लग रहा है, या कुछ अपने आप हुआ, और उसे आपका ह्रदय स्वीकार नहीं कर रहा है, जो काम आप करके सही समझते हैं, लेकिन वही काम छोटे भाई-बहन करे, और आपको बुरा लगे, तो उस काम से दूर रहें, कुछ चीज़ें तुरंत लाभ पहुँचाती तो है, परन्तु शायद ! भविष्य में वह कष्ट दे .
उदाहरण में एक वृत्तांत देखते हैं -
“एक साहसी युवा था, जो काम करते हुए खुश नहीं था ना ही उसे अपनी कमाई से संतुष्टी थी, दिन रात वह अमीर बनने का सपना देखता था, पर बात नहीं बन रही थी, उसने कई बार अतिरिक्त व्यापार करने का भी प्रयास किया पर असफल रहा, एक वक़्त ऐसा आया की उसने बुरा रास्ता पकड़ने की ठान ली, अच्छे से सोच विचार किया की मुझे किसी को लूटने या उसे मार देने से कोई ग्लानी नहीं होगी, न ही मै इस बात का कभी भविष्य में पश्चाताप करने वाला हूँ, अतः वह दिन रात किसी बड़े व्यापारी या दूकान को लूटने की योजना बनाने लगा, रात भर वह अपनी शिकारी निगाहें जमा कर कोई मालदार आसामी ढूंडता या फिर किसी घर में चोरी करने की योजना करते हुए, पूरी रात सड़कों पर बिता देता और दिन में वह अपने काम में लग जाता,
वक्त के साथ उसका धैर्य भी कम हो रहा था, दैवयोग से एक दिन वह नदी किनारे एक पुलिया के किनारे, बैठा था, बिना किसी डर के , आधी रात बीत चुकी थी, तभी एक मोटर-कार वहां आते नजर आई, इसने ठान लिया की इस वाहन में जो भी बैठा होगा उसे आज मै लूट कर रहूँगा, और उस कार के पास आते ही वह सामने कूद गया, चालाक ने अचानक मानव आकृति देखी तो घबरा कर जोर से गाडी रोकने का प्रयास किया, इसकी वजह से गाडी अनियंत्रित होकर पलट गई और नदी किनारे घिसटते हुए पहुँची, वहां पहुंचकर देखा तो एक व्यक्ति घायल अवस्था में लहु-लुहान, पड़ा था, उसे तुरंत उपचार की जरुरत थी, लेकिन उस चोर ने गाडी की तलाशी लेना शुरू कर दिया, उसे एक छोटा सा सूटकेस मिला उसे खोलने पर उसकी आँखे चौंधिया गई, उसमे हीरे-जवाहरात, भरे पड़े थे, उसने उसे उठाया और उस घायल इंसान को उसी अवस्था में छोड़कर भाग गया,
अब वह निश्चिंत होकर तेज़ दिमाग के साथ उस अनमोल हीरों-जवाहरातों की बदौलत धीरे-धीरे अमीर होने लगा, और एक के बाद एक कई प्रतिष्ठानों का मालिक बन गया, कई साल में वह इस बात को भूल गया की ये उसकी पाप की कमाई है, शादी हुई ,बच्चे हुए, अब वह एक इज्जतदार और शांत जीवन यापन करने लगा, जिसमे अभाव के लिए कोई स्थान नहीं था,
समय और बीता, उसके बच्चे बड़े होकर कारोबार में हाथ बताने लगे, उसे बेहद सुकून और वैभव की ज़िंदगी मिल चुकी थी, एक रात को वह सोया हुआ था, की अचानक उसके सीने में तेज़ दर्द हुआ और वह पसीना-पसीना हो गया, उसे एक मिनट में भगवान् और अपने सारे पिछले करम याद आ गए, उसकी पत्नी वहीँ मौजूद थी, चिकित्सक को तुरंत फोन करके बुलाया गया,

उसके आने पर उन्होंने उनका उपचार किया और जांच करके कुछ दवाई दी और बोले “कुछ नहीं हुआ था बस शरीर में ज्यादा गैस हो गई थी. ऐसा कहने के बाद चिकित्सक चले गए, उसने दवाई ली और आँख बंद करके लेट गया, लेकिन आज उसकी आँख से नींद ग़ायब हो चुकी थी, तीस साल पहले उसकी वजह से जो व्यक्ति घायल हुआ था, उसका क्या हुआ होगा ? क्या रात में किसी ने उसकी मदद की होगी, या वह रात भर तड़प कर मरा होगा ? इस सवाल ने उसकी नींद उड़ा दी , अच्छा खासा अपनी ज़िंदग़ी में वह इंसान खा-पी रहा था, मौज़-मस्ती के साथ जी रहा था , अब उसकी हालत गंभीर हो गई, अब वह एकांत में गुम-सुम पाया जाता, अन्दर ही अन्दर वह घुटने लगा, इस बात को वह किसी से कह भी नहीं सकता था,
कभी कभी अपने मन को तसल्ली देने का प्रयास करता “की वह किसी राहगीर के द्वारा बचा लिया गया होगा, उसे कुछ नहीं हुआ होगा, मगर मन नहीं माना. उसने अब मंदिर जाना, दान-पुण्य करना शुरू कर दिया, समाज में वह बहुत बड़ा दानी और धर्मात्मा भी घोषित हो गया, मगर मन की शांति नहीं खरीद पाया, अब उसने कारोबार चलाना भी छोड़ दिया, सब कुछ उसके बेटे बेटियाँ कारोबार सम्हालने लगे,
एक वक़्त आया की वह पागल हो गया . या यों कहें की समाज में वह पागल घोषित हो गया, जब स्थिति नियंत्रण के बाहर होने लगी, और उसके व्यवहार में अजीब बदलाव आने लगे, तब घरवालों ने भी उसे महंगे पागल-खाने में स्थानांतरित कर दिया, जहां पर विशेष सुविधाएं और महंगी चिकित्सा पद्धती द्वारा उपचार होता था, ये सब चुप-चाप देखते हुए भी, वह कुछ न बोल सका, इसके बाद जब तक जिया, बस एक ही बात बोलता रहा , चिल्लाता रहा --- “जाओ भाई कोई उसे बचा लो”, “”कोई तो जाओ …. “””नदी किनारे वह, तड़प रहा है””””………………..

समाप्त…

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