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नक्षत्र | Nakshatra

वैसे तो लीलाम्बर नाथ को , ग्रह, नक्षत्र और राहू-केतु के दुष्प्रभावों में विशवास ही नहीं था, लेकिन उसे इसका जीवंत उदाहरण देखने मिल जाएगा, ऐसा उसकी कल्पना ने भी कल्पना नही की थी, एक गरीब घर से, कक्षा आठ का विद्यार्थी, एक मील दूर, रोज “अभनपुर” के सरकारी विद्यालय में पढ़ने जाता है,
कक्षा में आते ही, आज मुख्य शिक्षक के द्वारा एक नए बच्चे “बंसी लाल का परिचय करवाया गया, पढ़ाई शुरू हुए तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन क्या करें, बंसी के पिता सरकारी दफ्तर में बाबू का काम करते हैं और उनका अचानक अभनपुर में तबादला हो गया था, इसलिए उसे यहाँ दाखिल कर दिया गया.
आज गणित की पढ़ाई के दौरान, मास्टर जी ने उसे उठाया और सबके सामने उसके तिमाही परीक्षा में सर्वाधिक अंक पाने पर शाबाशी दी, और साथ ही उसकी आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उसे अपने घर पर निशुल्क विशेष कक्षा देने की बात की, यह उस कक्षा में बड़े गर्व की बात है,
विज्ञान की कक्षा में भी उसे शाबाशी मिली, साथ ही सभी बच्चों को आज विद्यालय का परिचय पत्र बनवाने के लिए विज्ञान की शिक्षिका श्रीमती कश्यप ने सबसे , पांच-पांच रुपये जमा करके खाली परिचय-पत्र ले जाने और उसे, कल भरकर एक फोटो लगाकर साथ में लाने को कहने लगी, फिर कल इस परिचय पत्र पर हेडमास्टर साहब दस्तखत करके सारे बच्चों को दे देंगे. कुच्छ बच्चों के पास पैसे थे, सो उन्होंने ले लिए, मगर अधिकाँश बच्चे पैसे लेकर नहीं आये थे, तो उन्होंने इसे कल लेने की प्रार्थना की, शिक्षिका जी मान गयी, मगर एक परिचय पत्र उन्होंने अपनी कक्षा के होनहार विद्यार्थी -लीलाम्बर को मुफ्त में दे दिया .

आज पूरे दिन उसे तिमाही परीक्षा में अव्वल आने पर शाबाशी के साथ, अनोखे तोहफे भी प्राप्त हुए, वह प्रसन्न है, साथ ही उससे कुछ दूर बैठे बंसी पर भी उसकी नजर है, उसके पास बैठे लड़के उससे दोस्ती कर रहे हैं, बात कर रहे हैं, और बंसी भी लीला की तरफ देख रहा है. बंसी बातें करने में तेज अल्हड़, मस्त मगन, और उसकी बातें भी सबको चौंकाने वाली प्रतीत हो रही है, और क्यों न हो, इससे पहले वह बड़े शहर के बड़े विद्यालय में पढ़कर आया है, उसके पिताजी बड़े सरकारी बाबू हैं, वह इस छोटे से कसबे में नया है, तो कई बच्चे उससे सहानुभूती जताते हुए साथ देने की बात कर रहे हैं,

उसका बेख़ौफ़ अंदाज लीला को पसंद नहीं आया, वैसे भी वह यह नहीं चाहता की ये नया लड़का दोस्ती के नाम पर उसके गले पड़ जाए, और अपने शहर की घिसी पिटी कहानी सुना सुना कर मेरा सर खा जाए, इसलिए उसने उस लड़के से दूरी बनाकर रखना ही उचित समझा. छुट्टी होने के बाद लीला घर पहुंचा, और आज अपने विद्यालय में हुई घटनाओं को बड़े गर्व के साथ सबको सुनाने लगा, उसके पिताजी बहुत खुश हुए, वे एक किसान हैं, माताजी एक गृहिणी, और एक बहन, जो अभी कक्षा चार में है,

दोपहर को खाना खाने के बाद वह अपने दोस्तों के साथ मैदान में क्रिकेट खेलने चला गया, और शाम तक अपने दोस्तों के साथ खेलता रहा, उसके बाद लौटते हुए, मैदान के निकट खेतों में जाकर सारे लड़के बेर खाने लगे, कोई बड़ा सा पत्थर उठाकर मारता कोई झरबेरी की डाली को हिला कर बेरियाँ गिरा देता, जिसे बाकी लड़के बीनने लगते, और जिसने खूब मेहनत से पेड़ की डाली को हिलाया था, उसके आते तक मैदान साफ़ हो जाता, लड़के अपने जेब में बेरियाँ भर लेते, इससे लड़कों में विवाद होता, मगर तभी दूसरा लड़का, उस लड़के को बोलता, “ले भाई अब मै बेर गिरा रहा हूँ सिर्फ तुम बीन लेना इस बार,
सूर्यास्त होने में कुछ समय बाकी था, और दूर से एक लड़का सायकल चलाते हुए उस तरफ आता दिखा, जब वह पास पहुंचा, तो लीला ने पहचान लिया, ये तो बंसी है, वह उसे यहाँ देखकर चौंक गया, उसे वहां खड़ा देख बंसी सायकल रोककर बोला, “अरे यार मै तुम्हारे घर गया था, वहां पता चला तुम यहाँ हो, लीला समझ गया, की ये मुझसे ही बात कर रहा है, “हाँ बंसी हम लोग इधर रोज खेलने आते हैं, लीला अनमने मन से बोला, वह चुप होकर उसके आने का कारन जानना चाह रहा है, और लड़के उसकी चमचमाती हुई बीस इंच वाली छोटी सायकल देख रहे हैं,
“अरे यार मुझे भी तुम्हारे साथ, ठाकुर सर की कोचिंग जाना है, उनका घर कहाँ है, और कब से तुम्हे बुलाया है, बताओ न, कल से मै भी तुम्हारे साथ जाऊँगा, बस यही बताने के लिए आया था, ठीक है भाई मै कल स्कूल में बता दूंगा, फिर मेरे साथ चलना, बंसी ठीक है यार कहकर वापस चला गया. लड़कों ने ऐसी छोटी सायकल सिर्फ टी.वी. में ही देखा था, तो इसी बात पर वे चर्चा करने लगे, और लीला से बोलने लगे, भाई ये तो बहुत महंगी आती होगी, तुम्हारे दोस्त के पास है, तो तुम्हे भी चलाने मिलेगी, हमें भी कभी चलाने देना भाई,. वो झुंझला कर रह गया, वो बंसी को आफत समझता था, और आज ही उससे दूरी बनाकर रखने का निर्णय लिया था, मगर ये “राहू” का बच्चा. आज ही मेरे घर तक पहुँच गया, हे भगवान् ये क्या हुआ ?
अगले दिन उन दोनों को पता चल गया की विद्यालय की छुट्टी के एक घंटे बाद अभनपुर में ही ठाकुर जी अपने घर पर बच्चों को पढ़ाते हैं, जिसमे उस विद्यालय के कुछ बच्चे भी आया करते हैं, अधिकाँश गरीब विद्यार्थी कोचिंग क्लास नहीं जाते, और विद्यालय की छुट्टी के बाद, वह जल्दी से घर पहुंचता खाना खाकर लीलाम्बर वापस अभनपुर जाता, और वहां बंसी भी मिल जाता, इस प्रकार न चाहते हुए भी बंसी उसका अघोषित मित्र बन गया, और लीला को यह बात स्वीकार करनी पड़ी,

कुछ ही दिनों में बंसी ने बातें बनाकर पूरी कक्षा में अपना रंग जमा लिया, और वह पढ़ाई में बहुत विलक्षण बुद्धी का बच्चा, हर विषय में अव्वल आने लगा, जो कक्षा कभी लीला के लिए वाह वाही करती नहीं थकती थी, अब बंसी की जय जयकार करने लगी, और अब लीला दुसरी श्रेणी में आ गया, इससे लीला और चिढ़ जाता, मगर अंदर ही अंदर कुढ़कर रह जाता, उसे तो अपना गुस्सा जताना तक नहीं आता, अब तो कक्षा में बस सिर्फ बंसी और उसके सायकल, जूते, हाथों में पहनने वाले दस्ताने, और एक से एक खिलौनों का ही जिक्र होता था, उसके पास सोनी कम्पनी का एक छोटा सा ऑडियो कैसेट प्लेयर भी था, जिसमे हेडफोन लगाकर कहीं भी किसी भी जगह गाने सूना जा सके, अब तो बच्चे एक बार गाना सुनने के लिए, लाइन लगा लेते, लडकियां भी इस हीरो के जैसे दिखने वाले लड़के से बात करने का कोई मौका हाथ से नहीं गंवाती थी,

कभी कभी तो बंसी अपने पिताजी की मोटर सायकल लेकर स्कूल आता, लेकिन वह सिर्फ लीला को ही उसकी सवारी कराता, स्कूल की छुट्टी के बाद दोनों लीला के घर जाते, लीला की माँ दोनों को प्रेम से जो भी घर में बना होता, उसे खिला देती, चाहे कुछ भी बना हो, बंसी उसकी खूब तारीफ़ करता, और वाह करते हुए बोलता, “अरे आंटी आप बहुत बढ़िया खाना बनाती हो. हम लोग शुरू से शहर में रहे हैं ना, इसलिए, गाँव और गाँव के स्वाद को बहुत तरसते थे, मगर आपके हाथों से खाना खाकर मेरा पेट और मन दोनों भर जाता है, उसकी चिकनी चुपड़ी बातें सुनकर लीला की अम्मा भी बहुत खुश होती, साथ ही “आंटी” संबोधन सुनकर थोडा सा सकुचा जाती, आम तौर पर इस घर में छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग होता था, मगर जैसे ही कोई अमीर या शहरी मेहमान आ जाए तो वार्तालाप हिंदी में होने लगता है,

इस देश में अजीब परम्परा है, हमारे देश में किसी अमीर या शहरी मेहमान को देखकर हम, स्थानीय भाषा का प्रयोग नहीं करते, और किसी अंग्रेज को देखकर हमारे अन्दर का अंग्रेज जागृत हो जाता है. ठाकुर सर की विशेष कक्षा के उपरान्त बंसी, वापस लीला को छोड़ने आता, और फिर दोनों मित्र मैदान पहुँच जाते, और जी भरकर खेलते, कभी कभी खेल बंद करके खेत में बैठकर सारे बच्चे शास्त्रार्थ करते, और इस समागम का विषय अक्सर - सिनेमा, शहरी जीवन, खिलौनों का विकास, और टी.वी. में काम करने वाली लड़कियों के क्रमिक विकास पर होता.

आज सारे बच्चे तीसरे खेत की ऊँची मेढ़ जिसका नामकरण “काठमांडू” किया गया है, वहीँ पर बैठे ज्ञान विज्ञान चर्चा कर रहे हैं, आज चर्चा का विषय है - क्या लडकियां सच में टी.वी में हीरो को चुम्मा देती या लेती हैं, आज का विषय थोडा गोपनीय है, इसीलिये, इस एकांत में चर्चा हो रही है, प्रदीप सबसे छोटा लड़का है, इसलिए वह कुछ नहीं बोल सकता, जो बच्चे गप्प नहीं हांक सकते, वे सिर्फ सुनकर मजा ले रहे हैं, क्योंकि कुछ भी कहा तो उन्हें भगाया भी जा सकता है, जो भी थोडा सा जानता या टी.वी. ज्यादा देखता है, वह ही यहाँ सक्रीय उद्बोधन कर रहा है, अब धर्मेन्द्र कहने लगा, मेरे हिसाब से तो ऐसा नहीं करते होंगे, क्योंकि कोई भी लडकी ऐसा करती होगी तो उससे शादी कौन करेगा, “क्योंकि जो लडकी, टी.वी. में किसी को भी चुम्मा दे देती है या गले मिलती है उसे कौन अपने साथ गौना करवा के ले जाएगा, सभी लड़के हामी भरने लगे,

“बिलकुल सही बात, धर्मेन्द्र सच्ची बोल रहा है, मै भी इसका तरीका जानता हूँ. सुनो - अब ललित बोलने लगा- असल में ये लोग जब टी.वी. में काम करते रहते हैं तब, जब भी चुम्मा लेना होता है तो उसी वक्त फोटू खींचने वाला, दो लोगों की परछाईं की फोटू लेता है, फिर दो लोगों की परछाईं जो दूर तो खड़ी है, परन्तु उन दोनों की परछाईं गले मिल रही है ऐसा लगता है, फिर एक ठो “इसपेशल” मशीन से उस फोटू को रंग लगाते हैं जिससे ऐसा दिखने लग जाता है, जैसे दो लोग गले मिलकर चुम्मा ले रहे हैं, उसने आख़िरी शब्द धीरे से कहा ताकि उनकी आवाज दूर तक न जाए, वैसे भी यह वार्तालाप निम्नतम आवाज से की जा रही है.
अब तो लगने लगा की वह ही सही है, लेकिन सिर्फ अर्जुन संतुष्ट नहीं हुआ, अब इनकी बातों को बीच में टोकते हुए, बंसी चिल्लाया, “अबे चुप”, “साले, गधों तुम लोग क्या “ख़ाक जानते हो, मेरे घर में डिक्स लगा हुआ है, पांच “ठो” चैनल आता है, और वो भी, बिना कुछ भी "काट-छांट" किये, तुम लोग खाली “डी.डी. वन देखते हो जिसमे सबकुछ कांट के दिखाते हैं, अभी पिछले शुक्रवार को डी.डी.वन पर “जानी दुश्मन” सिनेमा दिखाया गया, साला पूरा डरावना सीन काट दिए, कुछ था ही नहीं देखने लायक, सरकारी चैनल देखोगे तो ऐसा ही होगा न ..
“अच्छा ये बताओ - शक्तिमान कौन से रंग का कपडा पहनता है ?
सारे लड़के तुरंत बोले - काले रंग का. और लीलाम्बर भी बोला हाँ “काले रंग का.
बंसी - जोर से हँसते हुए, वो काला नहीं है मेरे भाई लोग, वो लाल रंग का है, कभी मेरे घर में आना. “मै दिखाऊंगा तुम लोगों को रंगीन टी.वी. में, और फिल्मे भी बिना कांटे-छांटे, वही पिक्चर डर जाओगे “माँ कसम”. और ऐसा नहीं है की हीरोइन है तो शादी नहीं होगी, सबकी होती है, अब तो सब चुप और यहाँ भी वह बाजी मार गया,
असल में इनके मोहल्ले में सिर्फ दो ही टी.वी. थी, एक पटेल जी के यहाँ दूसरा धर्मेन्द्र के यहाँ, दोनों ही श्वेत-श्याम, वर्ण का टेलीविजन था, और उन्हें पता था, की “गंगाधर ही शक्तिमान है”, लेकिन ये पता नहीं था की शक्तिमान लाल रंग के कपडे पहनता है, लीला का मन फिर से दुखी, उसकी बात भी बंसी ने काट दी, बंसी उससे एक साल बड़ा है, और चौदह साल का है, लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हो जो वह नहीं जानता, वह कुशलता से मोटरसायकल चलाता है, और बड़े गर्व से सबको कहता फिरता है की मेरे अभनपुर का पहला दोस्त लीला है, बाकी बच्चों को यह सुनकर गर्व होता, मगर लीला के लिए तो वह नक्षत्र था,

समय थोड़ा सा आगे खिसका, कक्षा दस में पहुंचते हैं, अब बंसी और भी कुशाग्र हो चूका है, कक्षा में वह ठीक से पढता नहीं, सारे बच्चों से लड़ जाता है, लड़कियों को हाथ मरोड़ कर खूब रुलाता है, खेल कूद में सबसे आगे, किसी भी शिक्षक की गलती ढूंड लेने वाला, दिन भर नए नए शरारतें करना, साथ ही लीला को खूब तंग करना, यह उसकी दिनचर्या है, मगर फिर भी वह कैसे भी करके कक्षा में प्रथम स्थान पाता. लीला दुसरे स्थान पर संघर्षरत. अब तो बंसी पैसे भी कमाने लगा है, वह दो विडिओ गेम्स का मालिक है, जिसको उसने एक दुकानवाले को किराए पर दे राखी है, इससे हर महीने उसकी अच्छी आमदनी होती है, उसके आलावा भी वह कई लोगों को ब्याज पर पैसे दे देता है, और वसूली करना भी बखूबी जानता है,

उसने तो कई बार अपने पिताजी को भी क़र्ज़ दिया था, दोनों बाप बेटे महाकंजूस और पैसे से खूब मोह था, कई बार तो वह अपने पिताजी की भी गलती निकालकर उन्हें सुना देता, और उसके पिताजी भी अपनी गलती को मानकर चुपचाप सुन लेते, लीला यह देखकर बहुत दुखी होता, बंसी ने जैसे प्रण लिया हो की कुछ भी हो जाए कभी गलती नहीं करूँगा, और किसी की गलती माफ़ भी नहीं करूंगा, इसीलिए वह कई बार अपने बड़े भाई को भी पीट देता, उसका बड़ा भाई सीधा “गाय” था, लीला कई बार उसके भीषण गुस्से से भी चिढ जाता, और बोलता “अबे काहे को इतना गुस्सा होता है, वह भी हमेशा की तरह जवाब देने को तैयार कह देता, “क्या करूँ यार कोई गलत करे, या कोई गाड़ी चलाते हुए मुझसे आगे हो जाए तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता.

पूरी तरह से फ़िल्मी संवाद को रटकर उसे अपनी जिन्दगी में उसी का अनुसरण करते हुए बंसी सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा था, भले ही इससे लोगों को पीड़ा हो या उन्हें बुरा लग जाए, अब तो लीला को इस दुष्ट नक्षत्र को झेलने की आदत सी पड़ गई थी, वह जानता था, उससे पहली मुलाक़ात में उसने उसे सटीक पहचान लिया था, और ये उसकी जिन्दगी में कुण्डली मारकर बैठ गया था. उससे कितना भी लड़ लो या उसको मार पीट के भगा लो वह पूरी बेशर्मी से हंसता हुआ उसके पास आता और बोलता - “भाई तू ही तो मेरा एकलौता दोस्त है अभनपुर में, और पहला भी. यह बोलकर चिपक जाता, फिर से लीला मन मसोस कर रह जाता.
बंसी अपने दुश्मन खुद बना लेता था, और कोई न कोई उससे लड़ जाता, जिससे आये दिन वह या तो मार खाता, या फिर कुछ लड़कों का प्रबंध करके उसे मारने पीटने पहुँच जाता, और जिसने उसे पीटा था, उससे भी चार दिन बाद दोस्ती कर लेता, उसकी बेशर्मी की कोई हद नहीं थी, और तो और वह अपनी गलती कभी नहीं मानता था,
ऐसे ही एक दिन बंसी और लीला मोटरसायकल में बैठ कर पास के गाँव घूम रहे थे, यहाँ एक तालाब के किनारे, वे लोग रुके, और सामने खेतों में धान के फसल की कटाई हो रही थी, अब बंसी पूछने लगा, “क्या हो रहा है दोस्त ? लीला को आश्चर्य हुआ , ये कैसा सवाल है, क्या बंसी को कुछ भी पता नहीं है खेती-बाड़ी के बारे में ? उसने उसे ताना मारते हुए पूछा “ये क्या पूछ रहा है, ? तुझे नहीं पता, यहाँ क्या हो रहा है, उसने गंभीर होते हुए कहा, सच में नहीं पता भाई, हाँ इतना पता है, की खेती वाला काम हो रहा है. लीला को लगा, शायद बेचारे को सच में खेती के बारे में कुछ पता नही होगा,
इसलिए उसने उसे इस बारे में संक्षिप्त जानकारी देना शुरू किया, की कैसे धान की बुआई होती है फिर, निंदाई कोड़ाई, खाद पानी देते हुए अंत में फसल की कटाई, तक, अब इसे काटकर घर ले जायेंगे,फिर धान की बालियों से चांवल निकालने की विधी सुनाई, तब जाकर बंसी संतुष्ट हुआ, उसे बस इतना पता था, की उसके गाँव वाले घर में भी किसानी होती है, और उसके यहाँ खूब सारे खेत, कई नौकर और खुद का ट्रेक्टर भी है जिसका नाम वह हमेशा लेता है , “मेसी फोर्गुशन" दस पैंतीस, डी. आई. जे. सीरीज, और उसकी पसंदीदा कार है टाटा इंडिका , आगे चलकर यह कार उसको लेनी है ,
अब तो बंसी कभी भी लीला के घर पहुँच जाता और रात में भी रुक जाता, कभी कभी तो वह रातभर आवारा लडको से साथ घूमता, उसे इतनी छूट देकर घरवाले भी पछता रहे थे, जैसे ही दीपावली का त्यौहार नजदीक आया, उसी समय एक नई मोटर सायकल को बाज़ार में उतारा गया, इसे देखकर बंसी ने इसे लेने का मन बना लिया, फिर क्या था, उसने हड़ताल कर दी, और अपनी मांग पर अड़ गया, उसके पिताजी भी इतनी आसानी से कैसे मान जाते, उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया, बंसी धरने पर बैठ गया, उसकी मांग पूरी नहीं हुई तो उसने घर छोड़ दिया, और पता नहीं कहाँ वह पिछली रात रहा, ऐसे ही कुछ दिन बीते, और एक दिन तो वह लीला के घर पर ही रह गया, रात में खाना खाते हुए उसने जमकर खाने की तारीफ़ की, फिर लीला की माँ के सामने रोने लगा,
“देखो न आंटी, मेरे पापा मेरे लिए गाड़ी नहीं खरीद रहे हैं, अरे कोइ बात नहीं बेटा, घर में पैसे नहीं होंगे, माँ ने समझाया, “अरे नहीं आंटी, अभी तो गाँव में जमीन खरीदे हैं. ऊपर से पचास हजार का ऍफ़. डी. भी कराये हैं, मेरे को सब पता है, फिर भी नहीं मान रहे, घर में एक ही गाड़ी है, उसे भी पापा अपने ऑफिस ले जाते हैं, मेरा भाई सायकल में कालेज जाता है, अब आप ही बताओ, क्या मैंने कुछ गलत माँग लिया, माँ ने फिर समझाया “कोई बात नहीं बेटा, बाद में ले लेना, पर ऐसे ही कोई घर थोड़े ही छोड़ता है ?
बगल में बैठा लीलाम्बर सब समझता है, उसे पता है, की उसे अपने बड़े भाई की कोई चिंता नहीं है, और न ही मतलब, पर इ, "ऍफ़.डी.” का होता है?, वह यही सोचने लगा, खैर अगले दिन वह चला गया, और ठीक दो दिन बाद, वह शाम को बंसी से मिलने घर आया, उसने बाहर से ही आवाज दी, "लीला ओ लीला, बाहर तो आना जरा ,,,, लीला बाहर निकला और बोला अरे यार अन्दर क्यों नहीं आया ? बंसी कुछ न बोला, बस मुस्कुरा दिया, और कुछ देर करुणा से भरे चेहरे से उसे देखता रहा, ऐसा लग रहा है की वह बहुत दुखी है, उसका दुःख देखकर लीला भी दुखी हो गया, भले ही वह कितना कमीना था, लेकिन आज वह सच में बहुत ही दुखी लग रहा है,
बंसी फिर बोला, “चल मै चलता हूँ. "अरे ये क्या ? न तू अन्दर आया न ही कहीं हम लोग घुमने गए, ऐसा ही करना था तो मेरे घर क्यों आया ? लीला दुविधा में है अब.
“बस यार तुझे देखना था, अब मै चलता हूँ, वह मुस्कुरा दिया, मगर ये मुस्कान लीला को बहुत भारी लगी, जैसे उसका ह्रदय इतना दुःख सम्हाल नहीं पायेगा, उसने उसे रोका और बोला - ठीक है जा, मै तुझे नहीं रोकूंगा, लेकिन मेरी एक बात याद रखना, तेरा एक दोस्त रहता है यहाँ, जो तुझे बहुत चाहता है, और तुझे एक खरोंच भी आ गयी तो सबसे ज्यादा मेरा दिल दुखता है, ये सुनकर बंसी उसके गले से लग गया, और तेजी से अपनी सायकल से वहां से चला गया, उसको आशंका थी, कहीं ये लड़का नयी गाड़ी न मिल पाने के दुःख में आत्महत्या न कर ले, उसकी हरकतें उसी ओर इशारा कर रही थी, इसी लिए उसने अपने अंतिम संवाद में उसके प्रति अपना मिथ्या प्रेम और अपार मित्रता का प्रदर्शन कर दिया, जो उसके दिल में बिलकुल भी नहीं था. ये करते हुए उसे अपार दुःख भी हुआ था, लेकिन ऐसा उसने सिर्फ उसकी जान बचाने के लिए किया .

आज रात को उसने ठीक से खाना नहीं खाया, और रात में वह अपने बिस्तर में छटपटा रहा है, आँखों से नींद गायब है, मन में सिर्फ एक ही विचार “कहीं वो पागल सच में न मर जाए, अगर वह मर गया तो ? अब उसका दिमाग भविष्य की तस्वीरें दिखाने लगा, - कल उसकी लाश किसी तालाब किनारे मिलेगी, उसके पास और कुछ नहीं मिला, अब उसकी लाश घर में लाइ जा चुकी है, उसकी माँ यह सदमा सहन नहीं कर पायेगी,
"हाँ,, लेकिन उसका भाई जरूर खुश होगा, और मन ही मन प्रसन्न होगा. उसके पिताजी तो सबसे ज्यादा खुश होंगे, अच्छा हुआ मेरे जीवन का सबसे बड़ा बोझ हल्का हुआ, इसने तो मेरा जीना हराम कर दिया था, उसके बाद भले ही लोगों को दिखाने के लिए चिल्ला चिल्ला के रोयेगा, हाय ! मेरे बंसी… तुझे क्या होगया ??? ,,, मेरे प्यारे बेटे… मै अब तेरे बिना कैसे जियूँगा…….आं आं आं ,,,,ऊँ ………..
और मै, याने उसका अभनपुर का पहला महामित्र , उससे लिपट लिपट कर रोउंगा, और अपने घुटने के बल बैठकर खूब रोउंगा, अचानक उसने इस चित्र को मिटाया,!! नहीं,! नहीं, यह सीन बहुत पुराना हो गया है, मै कुछ नए तरीके से रोउंगा, अब लीला का दिमाग यह सोच रहा है, की कल जब वह नासपीटा लाश बनकर लेटा होगा, तब मै किस तरह से रोऊँ ? जो लोगों को वास्तविक लगे, और मेरा दुःख देखकर सबको अपार दुःख की अनुभूती हो, मगर कैसे ? क्या मै दीवार पर सर टिका कर रोऊँ ? नहीं ये भी होता रहता है,! एक काम करता हूँ , मै ,, मै ना.. चुपचाप उसी के बगल में बैठकर मौन रूप से रोउंगा,, किसी से कुछ न कहूंगा, … ऐसा करके मुझे ही सबसे ज्यादा दुखी माना जाएगा, लोग मुझे खूब सांत्वना देंगे, ,
"हाँ . यह उत्तम तरीका है रोने के लिए,,,, इस तरीके से रोने का अभ्यास करने के बाद, अब उसके दिल को ठंडक मिली, वह हल्का महसूस करने के बाद ऊँघने लगा, और पता नहीं कैसे उसकी आँख लग गई ,,,

पता नहीं कितनी देर वह सोया होगा, अचानक, बंसी किसी प्रेतात्मा की तरह, उसके ऊपर बड़े ही प्रेम से आवाज देने लगा, “लीला ओ लीला , उठ .. देख तेरा दोस्त तुझसे मिलने आया है, कमरे की रोशनी जगमगा रही है, लीला ने दुखी मन से आधी नींद में आँख खोली, सामने का नजारा देखकर वह अत्यंत दुखी हो गया, और अलसाई आवाज में बोला “अरे यार तू है. क्या तू सच में मर गया ? और मरकर सच में तू "हेल्लो ब्रदर" फिल्म के जैसे भूत बनकर मेरे पास ही टपक गया, घर का दरवाजा तो बंद था, तू क्या सच में उड़ कर आया ?

"वो सब छोड़, चल उठ. बंसी ने उसे जल्दी से उठने को कहा और उसके चादर को एक तरफ सरका दिया, बंसी ने कहा है, उठना तो पडेगा ही, वह उठा, उसे बंसी के भूत से कोई डर नहीं है, और जब वह दरवाजे के पास पहुंचे तो दरवाजा सच में बंद था, रात के बारह बज रहे हैं, खैर उसके साथ वह बाहर चला गया, कुछ दूर टहलने के बाद दोनों मैदान के पास पहुंचे, रात में सन्नाटा पसरा है, उसके गली के कुछ कुत्ते साथ हो लिए, और अपनी वफादारी दिखाते हुए दुम भी हिला रहे हैं.

चांदनी रात में लीला दुखी मन से चला जा रहा है, और बंसी उसे गंतव्य तक ले पहुंचा, एक छोटे से नाले के पास छोटी सी पुलिया पर दोनों मित्र रुके, उस पुलिया से पांच-छः फीट नीचे छोटा सा नाला बह रहा है, साथ ही जंगली घास-फूस से पूरा नाला सुशोभित है, बंसी नीचे देखते हुए बोला “वो देख लीला लड्डू से भरा एक डब्बा. लीला ने नीचे झाँका, मगर इतने अँधेरे में कुछ नहीं दिख रहा, उसने, उसकी "हाँ में "हाँ मिलाया और बोला “हाँ यार दिख रहा है, "कौन गधा लड्डुओं से भरा डब्बा फेंक गया होगा ?

"वो गधा मै हूँ, मेरे दोस्त, मैंने सोचा आज तुझे आख़िरी बार देख लेता हूँ. फिर उसके बाद मैंने "बबीता होटल से ये लड्डू लिए, और फिर उसमे तेज़ जहर मिलाया, जो की मेरे एक दोस्त ने खाद की दूकान से जुगाड़ा था, और मै इसी पुल में आकर इसे खाने ही वाला था, तभी तेरी याद आ गयी, तेरे कहे एक एक शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे, फिर पता नहीं तेरी सूरत मेरे आँखों के सामने आ गयी, मानो वह कह रही हो, चाहे कितनी भी मुसीबतें आये, तेरा दोस्त लीलाम्बर हमेशा तेरे साथ है…

"बस मैंने उसी वक्त मरने का इरादा छोड़ दिया. और भागकर वापस तेरे घर आ गया, मेरे भाई, ऐसा बोलते ही वह अपने प्रिय मित्र लीला के गले से लग गया. और इस बात से लीला को जो दुःख हुआ, वह कोई भी यक्ष,गन्धर्व या देवता, वर्णन नहीं कर सकते, और अब वे लोग ख़ुशी ख़ुशी वापस लौटने लगे, लेकिन सिर्फ बंसी खुश है, लीला की तो सपनों की दुनिया ही उजड़ गई थी, घर लौटकर बंसी, लीला के साथ ही लिपट कर सो गया,
लीला भी बगल में लेटे हुए, ऊपर लकड़ी की बनी छत को घूर रहा है, अब नींद कहाँ, “जिसके अंतिम संस्कार में कल किस तरह से रोना है, कैसे अधिकतम शोक संतप्त दिखना है, इसकी शानदार योजना बनाकर वह सोया था, मगर क्या करें, वही इंसान अब तुम्हारे साथ तुम्हारे ही बिस्तर पर हाथ पैर चलाते हुए सोया है, और आप सिकुड़ कर एक कोने में पड़े हैं.

अगले दिन शाम को दोनों मित्र बंसी के घर पहुंचे, लीला इस घर में कभी कभी आता है, और ज्यादा देर न रूककर तुरंत ही भाग जाता है, आज लीला खुश है, कम से कम यह अपने घर वापस तो आया, इसकी माता जी को तसल्ली होगी, लेकिन बंसी के मन में कौन सी खिचडी पक रही है यह लीला समझ नहीं पाया,
अन्दर प्रवेश होते ही, उसके पिताजी ने उसे घूरकर देखा, मगर कुछ कहा नहीं, माताजी भी शांत अपने बेटे को बिना किसी प्रकार की लड़ाई हुए, अन्दर ले जाना चाह रही है, मगर बंसी तो आते ही शुरू हो गया, और पिताजी से ऊँचे सुर में कहने लगा, “आप वो गाड़ी लेने के लिए पैसे देंगे की नहीं ? पिताजी ने तुरंत नहीं कह दिया, बंसी फिर चिल्लाया - आप क्या करेंगे पैसा बचाकर, आखिर सब् मेरा ही तो है, ऊपर से घर में एक गाड़ी, भैया और मै, हमेशा बाइक के लिए परेशान रहते हैं, आप तो दफ्तर चले जाते हैं, लेकिन हम लोग क्या करें,

अगर आप नई गाड़ी नहीं लेंगे तो ठीक है, फिर तो आप बाइक छोड़कर ऑटो या रिक्शे से दफ्तर जाना, मै गाड़ी के बिना अब कहीं नहीं जाऊँगा. ऐसा सुनते ही, उसके पिता जी , गुस्से से दांत पीसते हुए उसकी ओर दौड़े, बंसी भी सीना तानकर खडा था, मानो वह अपने पिता से नहीं डर रहा, मगर आज उसके पिताजी, भयंकर गुस्से से पागल हो गए और उसके सामने पहुंचाते ही, उसे पीटना शुरू कर दिया,

पीटने के साथ वो चिल्ला रहे हैं, - नया गाड़ी लेगा, बड़ा वाला रेसर बनेगा. ताड-तड़ाक, मेरा बाप बनने चला है, मुझको दिमाग देने चला था, धिशूम, ढिशूम.. बंसी को कुत्ते की तरह मार पड़ने लगी,
दो चार थप्पड़ पड़ने तक तो वह निडर था, उसके चेहरे पर कोई दर्द और डर, नजर नहीं आया, मगर आज उसके लिए महाभयानक दिन था, अब तो वह रोने, गिडगिडाने लगा, “पापा, नहीं, पापा नहीं“ “गलती हो गई, "आह . छोड़ दो, नहीं, उह्ह्ह , आगे से ऐसी गलती नही करूँगा…. आह्ह्हह्ह………

उसकी माताजी, अपने पतिदेव के गुस्से से वाकिफ थी, इसलिए वो दूर ही खड़ी रही, और रो रही थी, इधर बंसी के पिताजी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था, हाथ में जो आ रहा था वो उससे उसे मार रहे थे, और मुंह से शुद्ध हिंदी गालियों की बौछार माहौल को अत्यंत डरावना बना रहा है, लीला भी पहली बार अंकल जी का रौद्र रूप देखकर काँप रहा है, अंकल जी कई सालों की भड़ास निकालने पर टूल गए,

“नया गाडी लेगा, हांह्ह्ह ,,, पिछले महीने गाँव गया था, तब तू ट्रेक्टर से कई बार, भर भर कर मंडी, गया था न!, उसमे कई लोगों के धान बेचने में मदद की, वहां तूने दो-तीन हजार कमाए, “ट्रेक्टर चलाकर . "वो पैसा कहाँ है ? हांह्ह्ह , ? वो उसे पीटते जा रहे हैं, साथ ही सवाल भी पूछ रहे हैं, “इतना ही मन है गाड़ी लेने का तो अपने पैसे से लेले जा, कौन रोकता है तुझे, ?
बगल में खडा लीला समझ गया की बंसी को तो, खेती बाड़ी की अच्छी जानकारी है, फिर भी मेरे सामने अनजान बनने का नाटक किया था, अब तो वह भी मन ही मन बोलना लगा, और मारो इस फर्जी लड़के को, तभी अंकल जी ने लोहे की हथौड़ा उठा लिया, बंसी का सर बस फूटने ही वाला था, तभी हिम्मत करके लीला बीच बचाव करने कूड़ा, और बंसी को बचा लिया, अंकल जी से उसने हथौड़ा ले लिया, फिर भी अंकल शांत नहीं हुए, और बिस्तर में मच्छरदानी लगाने के लिए जो लोहे की पाइप लगी थी, उसे निकाल कर फिर से उसका सर फोड़ना चाहा, इस बार फिर से लीला ने ही उसे बचाया,

“नहीं अंकल छोड़ दो अंकल, छोड़ दो इसे, ऐसा बोलते हुए कांपते हुए लीला उसके सामने खड़े हो गया, और ले देकर बंसी की जान बची, उसकी माँ रोते हुए अब सामने बैठी है, पिटाई रुकी तो उसने राहत की सांस ली, इधर बंसी ने भी राहत की सांस ली. अब वह किसी पानी में भीगे हुए कुत्ते की तरह सिकुड़ कर बैठा है, मानो खूब ठण्ड लगी हो, उसके पिताजी गुस्से से पैर पटकते हुए अन्दर के कमरे में गए, और कुछ देर बाद वापस लौटे, उनके हाथ में कुछ पैसे थे, उसने उसकी तरफ हाथ बढाते हुए कहा - ये ले दो हजार हैं, दीपावली के लिए कपडे ले लेना, उसने तुरंत पैसे ले लिए, कुछ कहा नहीं, उसके बाद सौ रुपये का नोट लीला को देते हुए कहा 
“तुम भी कुछ ले लेना बेटा, उन्होंने अपने हाथ लीला की तरफ बढाए, मगर लीला बोला “जी मुझे नहीं चाहिए अंकल, मैंने दीपावली की खरीदारी करली है, उन्होंने तुरंत डांटते हुए कहा, अरे ले लो यार, इस बार लीला उन्हें टाल नहीं सका, और उस नोट को रख लिया,

अब बंसी उठा, बाहर जाने लगा, तब अंकल फिर गरजे, “रुको ! खाना खालो फिर चले जाना, बंसी फ़ौरन वापस मुड़ा और खाने की टेबल पर बैठ गया, लीला भी चुपचाप बैठ गया, दोनों ही डर के मारे बैठ गए, माँ ने दोनों को भोजन परोसा, उसके बाद दोनों खाना खाने के बाद ही खरीदारी कैने निकले, बाजार में बंसी ने आज की घटना का कोई ज़िक्र नहीं किया, और ख़ुशी ख़ुशी उसने कपडे खरीदे, उसे देखकर नहीं लग रहा था, की कुछ देर पहले उसे खूब मार पडी. और तो और वह जो भी मिलता उससे हंसकर बातें कर रहा है, लीला ने यह देखकर सोचा, वाह कितना बड़ा बेशर्म लड़का है, मानना पड़ेगा, और ऐसे ही ख़ुशी ख़ुशी दोनों बंसी के घर लौटे,

उसके इस व्यवहार से लीला को शक हो रहा था, कहीं ये पागल तो नहीं है, इतनी बड़ी बेइज्जती और मार पड़ने से वह तुरंत सुधर गया, ये क्या चक्कर है, ? खैर उसे बंसी घर छोड़ने गया, और आज की घटना की वजह से बंसी बहुत दिनों तक किसी भी प्रकार की होशियारी और हीरोगिरी करते नहीं पाया गया.

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