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मिलन | Milan

विजय दशमी का दिन - बैलगाड़ियों का झुण्ड कच्चे रस्ते पर आगे बढ़ा जा रहा है, आज विजय दशमी के उपलक्ष्य पर पालकी नामक गाँव में विशाल मेले और, जयभान गम्मत मण्डली की तरफ से नाच-गाने का आयोजन हुआ है, यह इतना प्रचलित नाम है की दस कोस दूर से भी गाँव वाले पूरी तैयारी और मित्र मण्डली के साथ यहाँ पहुँच रहे हैं , सड़कें भरी हुई और युवाओं की उत्साहपूर्ण संख्या ज्यादा नजर आ रही है,

अधिकाँश लोगों ने रात बिताने का प्रबंध साथ रखा हुआ है, जैसे कम्बल, बर्तन, अनाज और लकडियाँ, दिनभर मेले में खूब रौनक और चहल पहल रही, गाँव की तरफ से भी पीने का पानी और छोटी मोटी सुविधाएं उपलब्ध है, गाँव के बाहर विशाल मैदान में मेला चल रहा है, उससे कुछ दूर पर महाराज श्री मनोनीत सिसोदिया का स्मृति अवशेष, एक पुराना महल है जो टूट-फूट चुका है, लेकिन अवशेष आज भी बीते हुए दिनों का गौरव लिए सीना तानकर बुलंदी से खड़ा है, मेला देखने आये कुछ लोग यहाँ घुस कर अपनी निडरता का प्रदर्शन भी कर रहे हैं, साथ ही कुछ लोगों के लिए आज यह महल, शराब पीने और जुआ खेलने का उत्तम स्थल बन गया,

अवधेश नाम का युवक भी अपने दोस्तों के साथ मेले में आया हुआ है, वह पास के ही गाँव कुसमी से है, सभी लड़कों को खाने पीने से ज्यादा रस लड़कीयां ताड़ने में मिल रहा है, और युवतियां भी एक नजर देख कर उनको और ललचा रही हैं, यह आँख मिचौली का खेल युवाओं को अत्यधिक प्रिय है यह मेला कम और युवा महोत्सव ज्यादा लग रहा है, जैसे की बस्तर में घोटुल नाम का युवा पर्व मनाया जाता है, जिसमे युवा नाच गाने के साथ अपना मनोरंजन करते हैं और मनचाहे वर का चुनाव करते हैं,

शाम ढलते ही चारों तरह बड़े बड़े खम्बों में मशाल और कंदील जला दी गई, बैलगाड़ियां एक कतार से करबद्ध लगी है, जैसे आजकल कार को पार्किंग में लगाते हैं, बैलों को पास में ही बांधकर उन्हें चारा पानी दिया जा चुका है, सात बजे के आस पास रामलीला की समाप्ति पर वहां के मुख्य अतिथी के द्वारा प्रभु रामचंद्र और उनके दरबार की आरती हुई, और, रावण के पुतले को श्री राम चन्द्र जी के द्वारा धनुष और आग लगी हुई तीर से मारा गया,

थोड़ी बहुत आतिशबाजी के साथ रावण का पुतला जल गया, उसके जलने से बहुत रोशनी हुई और पूरा इलाका इस प्रकाश से थोड़ी देर के लिए प्रकाशित हुआ, इसके उपरान्त लोग वापस मेले में खरीदारी करने लगे, या तो खाने-पीने लगे, जिन लोगों को घर लौटना है वह घरवालों के लिए मिठाई और खिलौने लेने लगे, इधर जिस मंच में रामलीला का समापन हुआ, उसी मंच को दोबारा सजाया जाने लगा, रात में होने वाले गम्मत के लिए,

अवधेश उसी मंच के करीब एक बरगद की छाँव में बने चबूतरे पर बैठा, रात में होने वाले कार्यक्रम की राह देख रहा है, कुछ लोग अभी से वहां जमा होकर मंच के निकट स्थान पर कब्ज़ा करना शुरू कर चुके हैं, अवधेश बहुत ही अच्छी जगह पर बैठ चुका है, वहां से दायीं तरफ मंच है, और वहां से वह बैठा बैठा सब कुछ स्पष्ट देख और सुन सकेगा, किसी तरह का विद्युत् उपकरण या ध्वनिविस्तारक यंत्र नहीं लगाया गया है, यह दौर है बिना बिजली का,

अवधेश अपने मित्रों से उत्साहपूर्ण बातें कर रहा था, तभी उसकी नजर दुसरी तरफ महिलाओं के लिए बने घेरे की तरफ गई, एक सुन्दर कन्या न जाने कब से उसे ही निहार रही थी, लेकिन जैसे ही नजरें मिली उसने अपना मुंह फेर लिया, लेकिन अब ये कहाँ मुंह फेरने वाला था, गोरा चिट्टा, मजबूत देह का अवधेश अब अपने दोस्तों की बातों में कम और उस कन्या पर ध्यान ज्यादा दे रहा है, लेकिन उसका व्यवहार ऐसा है की वह लड़कों की सारी बातें सुन रहा है,

उस मृगनयनी की बड़ी बड़ी आँखें भी प्यासी हैं और वह भी, बराबर उसे देखती और नजरें घुमा लेती, वह नवयौवना किसी अप्सरा से कम सुन्दर नहीं, स्वर्ग की देवी की तरह कत्थई रंग की साडी जिसमे सुनहरे रंग की धारियाँ बनी है, उसके काले लम्बे बाल जो पूरी तरह से संवारे गए हैं, अपने परिवार के संग बैठी हुई है, सारे नियमों से बंधी हुई, जब मौका मिलता एक झलक उस लड़के को जरुर देख लेती.
रात के नौ बजे कार्यक्रम की शुरुवात हुई, सबसे पहले सरस्वती माता और सभी देवताओं की स्तुति और वंदना से भक्तिमय वातावरण निर्मित हुआ, प्रभु रामचंद्र जी की जयघोष की प्रतिध्वनी दूर दूर तक गूँज गई. उसके उपरान्त नृत्य संगीत की शुरुआत हुई.

दर्शकों को अब तक ऐसा लग रहा है, की उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए जो आज नींद की बलि दी है, वह व्यर्थ नहीं गई . शानदार सुमधुर संगीत और लोकगीतों के साथ कार्यक्रम पारम्परिक वाद्य यंत्रों के साथ चल रहा है, इस कार्यक्रम में सिर्फ दमदार आवाज वाले ही प्रदर्शन किया करते थे, क्योंकि किसी भी प्रकार का ध्वनी विस्तारक यंत्र मौजूद नहीं, मंच भी थोड़ी उंचाई पर बना हुआ है ताकि, दूर से भी लोगों को दिखने में परेशानी न हो.

जगह जगह पर अलाव जल रही है, लोग आग के सामने उसकी गर्मी के साथ कार्यक्रम का आनंद ले रहे हैं, अवधेश अपनी मित्र मण्डली के साथ जलती आग के सामने चबूतरे में बैठा, संगीत और माधुर्य रस का आनंद ले रहा है, साथ ही वह मौका पाकर भीड़ में बैठी कन्या के नजरों में डूब जाता, आग के प्रकाश में चमकती उस कन्या की वही प्रतिक्रिया है, दोनों आपस में मिलकर बात करने और एक दूसरे का नाम-गाँव जानने को उत्सुक हो रहे हैं, आधी रात के बाद बादल छा गए, शीत का बरसना कम हुआ, मगर ठण्ड में थोड़ी बढ़ोतरी हुई.

अब मंच में कवीराज बिसाहू प्रसाद सिन्हा के गाने, लोगों को अपने प्रेम और विरह की याद दिलाने लगे, उसके गानों में सिर्फ प्रेम, वासना और मिलन-विरह की ही मौजूदगी है, पति काम करने परदेस गया है, और उसकी पत्नी उसकी याद में कैसे तड़प रही है, मिलन को आतुर, उसके साथ को और उसके साथ बिताये हुए पल को याद करके वह रात में सो नहीं पा रही है, ये सब अब माहौल को गर्म करने लगे, मशालें अब ज्यादा गर्म प्रतीत होने लगी, उसके संगीत को सुनकर, लोगों की धडकनें तेज होने लगी, युवा वर्ग आंह भरने लगे, पेट में ठंडी हलचल होने लगी, जो मन को गुदगुदाने लगी,

अवधेश का भी वही हाल हो रहा है, इस कविराज के गानों से उसकी विरह वेदना भी बढ़ने लगी, अब तो उस युवती की नजर भी लम्बे समय तक उस पर जमी रहती, मानो दोनों एक दुसरे से मिलने को व्याकुल हों, और बहुत पुराने परिचित हैं जो कई साल बाद आज मिले हैं, दोनों आँखों ही आँखों में बातें करने लगे, जैसे अब तक कहाँ थे ? आज कैसे मेरी याद आई, अवधेश आँखों ही आँखों से माफ़ी मांग रहा है, "माफ़ कर दो मुझे, आगे से मै तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा, एक पल के लिए भी, तुम मेरी हो “सिर्फ मेरी. अब उसका सीना चौड़ा हो गया, मानो अपनी मजबूती का प्रदर्शन कर रहा हो.

कन्या ने भी सहमती दिखाते हुए अपनी बड़ी बड़ी आँखे कुछ पलों के लिए झुका दी, और शर्माते हुए उसने अपने भावी वर को सहमती दे दी, मौन भाषा में पहली बार दोनों बात कर रहे हैं . अब उसके गीतों में विरह का दर्द और बढ़ने लगा, लोग झुमने लगे, रस बरसने लगी, रसिक लोग दोनों हाथ उठाकर “वाह “वाह करते नहीं थक रहे हैं.

अब हलकी बूंदा बांदी भी होने लगी, जिससे कार्यक्रम में बाधा पड़ने का भी डर सताने लगा, मगर इतना तो सहा जा सकता है, इस हल्की सी बारिश से लोगों का उत्साह किंचित भी कम न हुआ लेकिन कुछ ही पलों में जोरदार बारिश शुरू हो गई, जो बिन बुलाये आ गई, अब तो लोगों को उठना ही पडा, बारिश के साथ तेज हवाएं भी चलने लगी, जिससे लोगों की परेशानियां और बढ़ गई, जिन लोगों के पास बैलगाड़ी और परिवार था, वे उन्हें बचाने और किसी सुरक्षित स्थल पर ले जाने में जुट गए, घने पेड़ की छाँव में लोग आश्रय लेने लगे, कुछ गाँव की तरफ भागे, जो लोग नींद आने पर बैलगाड़ी के नीचे सो गए थे, उन्हें भी घोर झटका लगा, सब अपने बैल और मवेशियों को सही जगह पर ले जाने लगे, कुछ बड़े विशेष लोगों ने मंच पर ही आश्रय ले लिया. पर कुछ ही देर बाद तेज हवाओं के आगे वह मंच न टिक पाया,

सब अपनी जान बचाने में लगे हैं किसी को दूसरे की नहीं पड़ी है, अपनी जान सर्वप्रथम, और जिनके पास बैलगाड़ी और परिवार नहीं था, वे अब सिर्फ अपनी देह उठाकर भाग रहे हैं, अवधेश अपनी मित्र मंडली के साथ आश्रय खोजने लगा, उसके मन में वह कन्या की याद घूम रही है, और सोच रहा है, की कैसे इन लड़कों से पीछा छुड़ाकर वापस अपनी प्रियतमा के पास जाऊं, पता नहीं वह सुरक्षित है भी की नहीं.
इस आपाधापी में वह अपना स्वार्थ प्रदर्शन नहीं कर पाया, और दोस्तों के साथ उसने पास ही के महल में आश्रय लिया, इस खंडहर में अधिकाँश लोग घुसते नहीं थे, भुत प्रेत का डर ही काफी है, लोगों को ऐसी जगह से दूर रखने में, वे लोग अन्दर घुसे तो पाया की लगभग सौ से अधिक लोग बिना भूत प्रेत की परवाह किये, यहाँ आश्रय लिए बैठे हैं, सब के सब गीले कपड़ों में ठंड से काँप रहे हैं, फर्श पर पैरों से पानी और मिटटी बिखरने लगी,

लड़कों ने आते वक़्त स्तंभों से कंदील और मशालें निकाल ली थी, जिसमे मिटटी का तेल भरा हुआ था, और एक चरवाहे के पास चकमक पत्थर मौजूद था, अन्दर कचरे के अलावा ढेर सारी लकडियाँ पड़ी थी, तुरंत ही आग जलाई गई, भयातुर लोगों की चीख पुकार कम हुई, अब आग की गर्माहट से लोगों को सुकून मिला और सब अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने शरीर और कपडे सुखाने लगे, इसी तरह कई और अलाव जला दिए गए ताकि सबको आंच मिल सके, इस जो महल कभी इस पूरे राज्य को आश्रय देता था आज भी वही महल लोगों को आश्रय दे पाने में सक्षम है, मगर अवधेश मन ही मन उस लड़की का कुशल क्षेम जानने हेतु व्याकुल हो रहा है,

“क्या पता दोबारा वह लड़की उसको मिलेगी ? क्या वो दोबारा उसको दिखेगी, अब वह इस विरह वेदना में व्याकुल होने लगा, अधिकाँश लोगों ने यहीं आश्रय लिया, जानवरों को इस महल के विशाल बरामदे में बाँध दिया गया, अब भी बारिश लगातार बरस रही है, "पर, हवा की गति अब थोड़ी कम हुई, जो की ठण्ड को और बढ़ा रहा था, लोगों को गर्मी मिली तो बातें करने लगे, वैसे भी दो तीन घंटे बाद सूर्योदय हो जाएगा, फिर सब ठीक हो जाएगा, सब परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना और परिवार की कुशलता की याचना कर रहे थे,

अचानक भवन के अन्दर ऊपर जाने के लिए बनी सीढ़ियों के पास कुछ लोग बैठे दिखे, उसमे से गुमसुम उदास लडकी नजर आई, और तपाक से उसे पहचान लिया, अब अवधेश का क्षोभ शांत हुआ, और उसी के बगल वाले दल में वह जा बैठा, यहाँ बैठे लोग आज हुई जान-माल की हानि का अनुमान लगा रहे हैं, और अपने आप को कैसे बचाया इसकी साहसिक कथा का वर्णन भी हो रहा है, अवधेश उस कन्या की तरफ ही देख रहा है, ताकि उससे नजर मिला कर बता सके की मै सकुशल हूँ और मेरी चिंता करना बंद कर दो, लेकिन वो है की अपने प्रियतम के खो जाने का शोक मना रही है,

अवधेश अपने दल को छोड़ कर आ चुका है, सिर्फ उसका परम मित्र ब्रजेश ही उसके साथ है, उसने बहाना बना दिया की, मै और ब्रजेश यहाँ से अपनी बहन के ससुराल जायेंगे उसके बाद वहां से घर लौटेंगे, और ब्रजेश अब तक नहीं जानता, की वे लोग इसी स्थान विशेष पर, क्यों आकर बैठे, छुप छुप कर वो अपनी प्रियतमा को ही देख रहा है, और उसकी प्रियतमा नजरें ऊपर ही नहीं कर रही, लेकिन विधाता की मर्जी से ही तो आज ये लोग मिले थे, विधाता ने इस महल में दोनों को वापस मिला दिया था, और अब विधाता की ही कृपा से उसने नजरें उठाई, और सीधे वहीँ देखा, जो की शायद उसके अवचेतन मन को चुभ रही थी, दोनों की नजरें मिली और ह्रदय में प्रसन्नता की वीणा बज उठी,

अब उस कन्या ने बनावटी गुस्सा धारण करते हुए आँखों से सवाल किया “कहाँ चले गए थे, मुझे ऐसे ही छोड़ कर क्या फिर भाग जाओगे ?

अवधेश - “नहीं “नहीं, कभी नहीं, अब तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा, ये मेरी आखिरी गलती थी, अब तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा, मन में तो आया उसे अपने छाती से लगाकर जकड लूँ, उसे अपने अन्दर समा लूँ, और उसे दिखाऊं की कुछ ही समय में तुम मेरे लिए सब कुछ बन गई. आज सुबह जब वह सोकर उठा, तो, कल्पना भी नहीं की थी की, उसे अपनी भावी अर्धांगी मिल जायेगी, मन में सिर्फ इसी भावना के साथ वह, ऐसे ही बैठा है, और नजरें छुपा कर वह उसकी तरफ झाँक रहा है, जिसका नाम भी वो नहीं जानता.

उसका दोस्त अब समझ गया की, वे लोग यहाँ क्यों बैठे हैं, जैसे ही उसने इस बात का प्रदर्शन करना चाहा, की, वह जान गया है, उसे तुरंत अवधेश की बड़ी बड़ी क्रोधित आँखे देखने मिली जिससे वह आगे एक लम्बे समय के लिए मुंह फुलाकर बैठ गया, अभी कुछ भी बोलना खतरनाक था, हो सकता है इसी समूह में कोई जान पहचान का बैठा हो और उन दोनों की अच्छी खासी मरम्मत हो जाती, तो उसके दोस्त के रूठ जाने में ही भलाई थी, और इसी तरह अपने दोस्त को बिना मनाये उसने सुबह होने की राह देखी,
सूर्योदय होते ही, सूर्यदेव अपने सारथी अरुण के साथ, सात घोड़ों के रथ पर सवार, लालिमा के साथ पूरे विश्व को जगमगा कर निराशा रूपी अँधेरा दूर करने लगे, इससे लोगों घोर निराशा दूर हुई, और, नई उर्जा, उत्साह के संचार के साथ लोग अपने दल और परिवार के साथ, अपने-अपने, बसेरों की ओर लौटने लगे,

जब उस कन्या के परिवार ने भी इस खँडहर से विदा ली, और, आगे बढ़ने लगे, तब वह उठा और अपने दोस्त को मनाया, मान मनुहार और पूरी बात समझाने के बाद ही वह माना, और उठ कर तैयार हो गया, रातभर के जागे लोग, फुर्ती और तेजी से अपने अपने घरों को लौट रहे हैं, उस लडकी के एक निश्चित दूरी पर पहुँच जाने के बाद, अवधेश भी अपने मित्र के साथ उसका नाम-गाँव, जानने को पीछे-पीछे चल पड़ा............

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