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लेखक होने का दुख | Lekhak hone ka dukh

लेखक होने का दुख :
किसी पत्थर से सर टकरा लेना या किसी पागल कुत्ते के सामने नाचना ज्यादा आसान है, लेखक होने की तुलना में .
लेखक अक्सर कई लोगों की आंख में खटकता रहता है, कई लोगों के बारे में अगर कुछ बुरा लिखा हो तो उनकी दुश्मनी झेलना, चौंथी फेल हलवाई भी तुम्हे रोककर कहानी कैसे लिखते हैं तुम कैसे महान लेखक बनोगे इसका पाठ पढ़ायेगा . तुमने ये क्यों नही लिखा तुमने वो क्यों नही समझाया ऐसा सवाल पूछा जाएगा, सम्मानित और पवित्र आशिक अपनी प्रेमिका को प्रेम पत्र लिखवाने आपके पास जरूर पहुंचेंगे . अगर प्रेमपत्र विफल हुआ तब तो लेखक महोदय का चीर-हरण होना तय ।
पड़ोसी बच्चों को हर साल स्कूल में सुनाने के लिए निबंध और कविताये लिखकर देना स्थानीय लेखक का ही कर्तव्य होता है . छुपकर जीने के बाद भी नासपीटे समीक्षक लेखक को कैसे भी ढूंढकर उसको लम्बा चौड़ा प्रवचन जरूर देंगे, जिसने कभी कहानी का क अक्षर भी न पढ़ा हो वह भी शब्दकोश और व्याकरण की अशुद्धता खोज निकालेगा और लेखक के सर दे मारेगा, लेखक किताब लिखता है अपनी कहानी व्यक्त करने परंतु, कई बार उसकी किताब किसी किसी इंसान का मानसिक संतुलन हिला देता है, अब इसमें लेखक की क्या गलती फिर भी उस इंसान के रिश्तेदार डंडा लेकर लेखक महोदय को ढूंढते नजर आते हैं,
हमारे एक मित्र सदैव एक बात कहते हैं इस दुनिया मे दो ही तरीके हैं आगे बढ़ने -
या तो अच्छे कर्मों के द्वारा ख्याति कमाओ 
या फिर सबको कड़ा जवाब देकर लड़ते हुए कुख्यात बन जाओ, अब लोगों को लेखक कैसे समझाए की उसे बहस करना या किसी से लड़ना बिल्कुल पसंद नही तभी तो उसने बांस का बम्बू ना चुनकर कलम उठा लिया ।।।

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