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ज्वाला | Jwala

परसराम की बीवी का पार्थिव शरीर उसके आँगन में पड़ा है, इस विशाल आँगन में सौ लोग आ जाएँ इतनी बड़ी जगह है. और घर भी किसी महल से कम नहीं, होना तो ये चाहिए था की पूरा आँगन और घर परिचित, बंधू बांधवों और गाँव वालों से भरा होता, शोकाकुल लोगों की रोने की आवाज गूंज रही होती, जो किसी भी पत्थर दिल इंसान का ह्रदय पिघला दे ,

लेकिन अजीब विडम्बना है की यहाँ कोई मौजूद नहीं, कोई नहीं , परसराम खुद अपनी मृत पत्नी के पार्थिव शरीर से दूर आँगन में नीम की छाँव में सर पकड़ कर बैठे हैं, उनका बड़ा बेटा ज्वाला जोकि मात्र ग्यारह वर्ष का है , वो भी घर के बरामदे के सामने वाले गलियारे में एक खम्भे के सहारे खडा है, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा की क्या हो रहा है, उसके दो छोटे भाई उसी के पास खड़े अपनी माँ को निहार रहे हैं, इस सोच में की उनकी माँ अब सोकर उठेगी, इस घर के सारे नौकर भी भगवान् को प्यारे हो चुके थे .

गाँव में संक्रामक बीमारी फ़ैली थी, ऐसी बीमारी की पूरा गाँव का गाँव निगल रही थी, हर परिवार डरा सहमा सा अपनी बारी का इन्तेजार कर रहा था, बस . कोई फर्क नहीं पड़ता की आप हिन्दू हैं या मुसलमान , बीमारियों का कोई मजहब नहीं होता, जब जिसका बुलावा आ जाए तब जाना ही पड़ता है . बर्तानिया राज चल रहा था, और डाक्टर बहुत दुर्लभ होते थे जो गाँव में शायद ही नजर आयें . गाँव में इलाज वैद्य या हकीम ही करते थे . इस गाँव के हकीम का परिवार भी स्वर्ग सिधार चूका था .

इसलिए किसी के मर जाने पर कंधा देने वाला भी कोई नहीं था, खुद परसराम अपनी मृत पत्नी के निकट जाने से घबरा रहे थे, उन्हें भी संक्रामक बीमारी का भय था, वे बहुत ही भोले और डरपोक किस्म के इंसान हैं, उनकी धोती काफी गंदी हो गई थी, लगता था की रात जमीन पर बैठे हुए बिताये हैं,

कभी यह आँगन गाँव वालों से भरा हुआ रहता था , गर्मियों के दिन में गाँव वाले यहाँ आम खाने आते थे, पीतल के बड़े बड़े हांडियों में पके आम भरे रहते , यह परिवार काफी संपन्न, आम और इमली के बगीचे, साथ ही दो सौ एकड़ जमीन पर एक हल की किसानी थी , और आज यह सूना आँगन चीख चीख कर गुहार लगा रहा था - “क्या यही प्रतिफल मिलेगा गाँव वालों से इस परिवार को, भूल गए शायद ही कोई बचा होगा जिसने इस घर का नमक न खाया हो . यहाँ सबको मदद मिलती थी .

इसी साल महात्मा गांधी ने नमक क़ानून तोड़कर , अंग्रेज तानाशाही के खिलाफ कड़ा विरोध प्रगट किया था. अंगरेजी साम्राज्य की नींव डगमगा रही थी, अभी इस बात को कुछ ही महीने बीते थे और भादों मास में यह गाँव महामारी का शिकार हो गया.

ज्वाला अपनी माँ के सामने खड़ा उसकी सूरत को निहार रहा है, वो जानता है अब उसकी माँ कभी नहीं उठेगी , आज के बाद यह सूरत उसे कभी दिखाई नहीं देगी, उस अबोध बालक का कोमल ह्रदय अपनी भावना व्यक्त करने में असमर्थ था . तभी उसकी दादी कदम पटकते अन्दर से आई और तीनो बच्चों को नीम्बू और प्याज से बनी माला पहनाने लगी, हकीम ने यह नुस्खा बताया था, सो वह इसे ही तैयार करने में जुटी थी, छोटे बच्चों ने इसे पहनने से मना किया तो उन्हें फुसलाने लगी “की पहन लो वर्ना बावा उठा के ले जाएगा. फिर उन्होंने घर के बाहर कदम बढाए , दरवाजे से बाहर झाँका , एक कुत्ता भी नहीं दिख रहा था , तो आदमी जात की बात ही क्या ? उन्होंने वापसी की और ज्वाला की आँखों में गंभीरता से देखते हुए बोली - “ज्वाला ये काम हमें ही करना है, तू करेगा न ? ज्वाला सहमत हुआ और प्रतिउत्तर में सिर्फ अपना सर हिला दिया .

फ़ौरन उसकी दादी ने उसे चाबियों का गुच्छा थमाया और बोलीं - जाओ बगीचे में , वहां बैलों को तैयार करके गाडी में जोतो , फिर बैलगाड़ी में गोबर के उपले और लकडियाँ भरकर उसे श्मशान में छोड़ आओ , उसके बाद तुम्हारी माँ को उसी बैलगाड़ी में ले जाकर अंतिम संस्कार कर देंगे, तब तक मै तुम्हारे छोटे भाइयों को कुछ खिला देती हूँ, ज्वाला गम्भीरता से संकल्पित होकर अपने घर से निकला .

वीरान गाँव की गलियों से होता हुआ वह अपने बगीचे में पहुंचा, वहां कृषि कार्य का सामान, जानवरों के लिए चारा, और ढेर सारी लकडियाँ , एक भण्डार गृह में रखा हुआ था . आज वह यहाँ पहली बार अकेला आया था , यहाँ बगल में कुछ गायें और दो जोड़ी बैल बंधे हुए हैं . दो बैलों को खोलकर गाडी से जोड़ा , फिर उसने बैलगाड़ी में गोबर के कंडे और लकडियाँ भरकर अकेले श्मशान पहुँचाया, इस विपरीत परिस्थिति में उसने अपना हिम्मत नहीं खोया ,

वापस घर आने पर उसने और उसकी दादी ने बड़ी मुश्किल से उस लाश को बैलगाड़ी में चढ़ाया , सिर्फ दो ही लोग इस शोक यात्रा में जा रहे हैं . उसकी दादी समझ चुकी थी की ज्वाला के पिता नहीं जाने वाले , सो उसके पिता और दोनों बच्चों को वहीं छोड़ दिया .

श्मशान में सिर्फ दो लोगों ने मिलकर, बड़ी मुश्किल से अंतिम संस्कार की क्रिया संपन्न की , ऐसा दृश्य देखकर देखकर किसी की भी आत्मा फट पड़ती, कलेजा मुंह को आ जाता, बड़ी बदनसीब औरत थी ज्वाला की माँ, जिसे चार काँधे भी नसीब नहीं हुए, न ही पति के द्वारा मुखाग्नि ..

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