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एक रुपया | Ek Rupiya

कभी कभी तो लगता है की कक्षा के बाहर चला जाऊँ और द्वार के ऊपर लिख दूँ - “चिड़िया घर, या पागलखाना. यहाँ कभी न खत्म होने वाला शोर हमेशा मौजूद रहता है. यह मेरा विद्यालय है, और मेरी कक्षा के अन्दर का दृश्य, खुद बातचीत में व्यस्त रहो तो शोर का अहसास नहीं होता, किन्तु जैसे ही आपको शांति की अभिलाषा होती है, या गलती से पढने का मन लगे तब ये शोर असहनीय प्रतीत होता है .

आज मै दुखी हूँ, और उदासी में “शांति” ही वास्तविक प्रेमिका प्रतीत होती है और, इस दुःख का कारण - आज बेर बेचने वाला आया था, अपनी सायकल के पीछे बेर से भरी टोकरी बांधकर, जो दूर से पीले लाल रंग के नजर आते हैं, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे, अगर होते तो मेरे दोनों जेब बेरियों से भरे होते, और मै मजे से अकेले अकेले बेर खा रहा होता, उस समय श्री नरेन्द्र मोदीजी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत नहीं की थी, इसलिए हम गुठलियाँ कहीं भी थूक देते थे . वैसे पच्चीस पैसे में भी बेर मिलता है लेकिन उसकी ,मात्रा मेरे और मेरे जेब को कम पड़ती है . मुझे भरपेट बेर खाने की अभिलाषा थी परन्तु न तो पैसे थे न ही किसी मित्र ने उधार दिए, मै अपनी पंक्ति में सबसे आगे जमीन पर टाट पट्टी पर बैठा था, दुखी और उदास, मेरा मन बेर खाने को व्याकुल हो रहा था,

यहाँ पढ़ाई कभी कभी और कभी भी हो सकती है, इसलिए किसी अध्यापक के कभी भी प्रगट हो जाने का ख़तरा भी सदैव बना रहता है, हालांकि हमारा कप्तान इस बात पर हमेशा सावधान रहता है और जैसे ही कोई अध्यापक इस कक्षा की ओर आता दिखे तो हमें वह हमें सचेत कर देता है .

आज इस शोर से भरी कक्षा में कोई अपनापन नहीं था, सभी पराये महसूस हो रहे थे, ऊपर से मेरा एक मित्र “मुरारी भी पैसे न होने का दुखड़ा रो चूका था . कुछ देर बाद जब लड़कियों ने उससे बेर खिलाने का आग्रह किया तो वह गिरगिट की भाँती फ़ौरन रंग बदल कर बेर लेने दौड़ पड़ा, न ही उसे रास्ते में किसी शिक्षक के द्वारा पकडे जाने का डर लगा न ही वह व्यायाम वाले शिक्षक से पिटने का भय, कुछ देर पश्चात वह दो रुपये का बेर लेकर हाज़िर हुआ, और उसने सबसे ज्यादा मात्रा बिंदिया को दी जिससे मुझे पहली बार ये अहसास हुआ की दाल में कुछ तो काला है ,

और ठीक एक दिन के बाद मेरे पूछे जाने पर उसने यह स्वीकार किया की, वह बिंदिया के लिए देवदास बनना चाहता है, अब उसकी नजर मुझ पर पड़ी जब वो लड़कियों को बेर बाँट रहा था, मजबूरी में उसने मुझे भी अनमने मन से मुट्ठी भर बेर दान किये, और आज तो बेर बहुत ही स्वादिस्ट थे, पूर्ण रूप से खट्टे मीठे, जैसा मुझे पसंद है , मैंने एक-एक बेर बड़े प्रेम से खाया और गुठलियों को लम्बे समय तक चूसता रहा, आज तो ऐसा लग रहा था के मै बेर की गुठलियाँ तक खा जाऊं , थोड़े से बेर पाकर अब मै थोडा सा खुश महसूस कर रहा हूँ .

इस ख़ुशी में आनंदित मै शान्ति से बैठा हुआ बेर खा रहा हूँ, अचानक मेरी पंक्ति के सारे लड़के एक साथ उठे और लघुशंका के लिए रवाना हो गए, सरकारी विद्यालय में ऐसा होना आम बात है, मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और बेर खाने में दोबारा व्यस्त हो गया और उसी समय सही मौका पाकर लड़कियों ने मुझ पर हमला कर दिया, दरअसल वे लोग बिना टाट पट्टी के बैठे थे, फर्श गन्दा था, जिसमे साल में कभी कभी ही सफाई होती थी. यहाँ के सारे सफाई कर्मचारियों को अगर गलती से भी कोई झाड़ू- पोंछा लगाने कह देता तो उन्हें बड़ी पीड़ा होती थी,

सो मुझे अकेला पाकर लगभग आठ - नौ लडकियां टाट पट्टी को पकड़ कर पूरी ताकत लगा कर खींचने लगी, जिस से मेरी पंक्ति के सारे लड़कों के बस्ते और मै लुढ़क गए और मै दूसरी पंक्ति के लड़के से टकरा गया, जब तक मुझे होश आया तो देखा - लड़कियां अपनी पंक्ति में वो लूटी हुई लम्बी टाट पट्टी बिछा रही थी, मै फ़ौरन उनकी तरफ झपटा और टाट पट्टी का अग्रिम सिरा मेरे हाथों में आ गया, मैंने पूरा जोर लगा दिया उसे खींचने में , विपक्ष में कई लडकियां, इधर मै अकेला, मेरे मित्र और सहयोगकर्ता नदारत. मै अकेला असहाय, बाकी के लड़के इस घटना से अपार मनोरंजित हो रहे थे और मुझ पर टीका टिपण्णी भी की जा रही थी .
मेरी पकड़ मजबूत थी, परन्तु कहते हैं न - नारी शक्ति सब पर भारी . मै भी किसी खजाने की तरह वह चटाई का टुकडा छोड़ने को तैयार नहीं था, और लडकियां भी कई तरह के दांव लगा रही थी, कभी मेरे हाथों को अलग करने के प्रयास करती कभी कोई मुझे गुदगुदाने लग जाता, मै अकेला पुरुष इन खूंखार लड़कियों के बीच में अकेला फंसा हुआ था, चटाई का मोह भी नहीं छूट रहा था, अगर यह चटाई मेरे हाथ से गई तो बाहर गए लड़के जब लौटेंगे तो हो सकता है वे क्रोधित होकर मुझे कहीं से भी दरी की व्यवस्था करने की सजा दे दें,

इसी डर की वजह से मै उन दुष्ट लड़कियों से भी लड़ने को तैयार हार नहीं मान रहा था, इस दांव पेंच के चक्कर में जो लड़की मेरे निकटतम थी उसका संतुलन बिगड़ा और उसका हाथ सीधे मेरी दायीं आँख से जा लगा, जिससे मै हताहत हुआ, और मेरी पकड़ ढीली पड़ गई, वह लड़की ठीक से संभली भी नहीं थी की अचानक उसका पैर मेरे पैर के ऊपर आ गया, मैंने त्वरित प्रतिक्रिया के द्वारा पीछे हटने का प्रयास किया लेकिन मेरा भी संतुलन बिगड़ा और मै पीछे गिर गया, और मेरे ऊपर वह लड़की गिर गई, जिससे एक शर्मनाक हादसा और हो गया, अब तो इसी दुर्घटना के नाम पर कई दिन मुझे चिढाया जाएगा, इस प्रक्रिया में चटाई तो हाथ से गई, साथ ही मेरी प्राणप्रिय चप्पल भी टूट गई .

लड़कियाँ विजय का उत्सव मनाने लगी, अब वे चटाई पर आराम से बैठने लगी, और मै वापिस चुपचाप अपनी जगह , घायल अवस्था में , रुमाल से आँख सेकता हुआ, टूटी हुई चप्पल के साथ बैठ गया .
अब पता नहीं कितने दिन बिना चप्पल के गुज़ारा करना पड़े, अभी घर में चप्पल के लिए आन्दोलन करने से कोई लाभ नहीं होगा, मेरे पिताजी एक साधारण पुरोहित हैं इसलिए पिताजी के किसी अच्छी जगह पूजन हवन करने के बाद ही मेरे लिए नई चप्पल खरीदने पर विचार किया जाएगा.

उधर लड़कियों के झुण्ड में जिन- जिन लड़कियों को हाथ मरोड़ कर, चोटी खींच कर मैंने रुलाया था आज वे लडकियां अत्यधिक प्रसन्न हैं और प्रसन्नता से मुझ पर टिप्पणी कर रही हैं “कैसे मुन्ने क्यों रो रहा है, किसने मार दिया, तेरी आँख को किसने लाल कर दिया ? लड़कों के जानलेवा शब्द कम थे जो अब लडकियां भी मेरी खिंचाई करने लगी . इसी लिए मै आज शान्ति को बहुत याद कर रहा हूँ और मेरी आँखे सुकून तलाश रही है .
ऐसे ही इन्तेजार करते करते दुःख की घड़ी समाप्त हुई और आखिरकार पूर्ण छुट्टी होने की घंटी बजी, मन में तसल्ली हुई की जान छूटी . अब सभी को सिर्फ घर जाने से मतलब था, बाकी का चिढाना कल पर छोड़ दिया गया, चुपचाप नीची नजरों के साथ अब मै भी बाहर निकलने लगा, मै अपनी टूटी हुई चप्पल को हाथ में लिए हुए चल रहा था, बस्ता मेरे कंधे पर टंगा हुआ था . जिस चप्पल ने कई महीने मेरा साथ दिया था आज उसके टूट जाने पर उसकी मौजूदगी मुझे शर्मिंदा कर रही थी .

तभी मेरा प्रिय मित्र धनंजय, मेरे समीप आया और उसने मेरे चप्पल अपने हाथ में ले लिए और बोला - “चल, “चल आ मेरे साथ. मै सदमे में डूबा हुआ यंत्रवत उसके पीछे चलने लगा, स्कूल के बाहर थोड़ी दूर पर मोची की दूकान है, वहां उसने मेरे चप्पल की मरम्मत करवाई, इस काम में एक रुपये लगे, जिसको धनंजय ने दिए, हालांकि जब मैंने बेर खाने के लिए धनंजय से पैसे मांगे थे तब उसने मन कर दिया था . मगर अब जो ख़ुशी मेरे चेहरे पर थी वह शायद बेर खाकर नहीं मिलती, क्योकि वह बस जीभ का लालच था और ये जरूरत .

हम दोनों मित्र शांति से घर की ओर पैदल चलने लगे . अब धनंजय ने मेरी तरफ देखा और गंभीरता से कहा - “भाई मेरी जेब में पैसा था और मै बेर के लिए पैसा दे सकता था, लेकिन मेरे दोस्त ये पैसा मेरा नहीं है मेरे पिताजी के पान दूकान का है, और मै भी वहां स्कूल के बाद काम करता हूँ, इसलिए मैंने बेर के लिए मना कर दिया, लेकिन बात जब तुम्हारी जरूरत की आई तब तो मै लाखों रुपये भी खर्च करने से पीछे नहीं हटूंगा , और तुम्हारी परेशानी खत्म करने के लिए तो खर्च किया ही जा सकता है . ऐसा बोलकर वह मुस्कुरा दिया , उसकी दिव्य मुस्कान देखकर मै भी मुस्कुराया दिया . मन ही मन मै अपने मित्र के लिए कृतज्ञ था . आज मुझे पहली बार बचत करने और फ़िज़ूल खर्च बंद करने का महत्व पता चला, और मुझे आज एक रूपये की असली कीमत का अंदाजा हुआ ..

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