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एक चोर की व्यथा | Ek Chor ki vyatha

“मेरे इलाके में एक संतरे का बगीचा था, जहां बहुत ही स्वादिष्ट और रसीले संतरे फलते थे, कई बच्चे और बड़े वहां चोरी करने जाते थे, जी भर कर संतरे खाते और साथ में ले आते, ये बुरी बात है, लेकिन ऐसा कई सालों तक चला, उसके बाद समय बीतता गया, एक दिन एक बच्चा जो बड़ा हो गया था, उसे अपने प्रिय संतरे के बगीचे में चोरी छुपे जाकर उस जगह को देखने का मन हुआ, जब वो वहां पहुंचा तो वह उस बगीचे की हालत देख कर वह रो पडा, वह बगीचा पूरी तरह से बर्बाद हो चुका था,
सारे पेड़ मुरझा चुके थे, डालियाँ टूटी हुई थी, या तो अधिकाँश पेड़ में फल लगना ही बंद हो गया था, और तो और कंटीली तारों की बाड़ भी नष्ट हो चुकी थी, जो की दो कतारों में लगे थे, माने सारी सुरक्षा प्रणाली ध्वस्त हो चुकी थी, वह मन ही मन रो उठा, क्योंकि भले ही वह चोरी करने जाता था, लेकिन सिर्फ पके हुए फलों को ही वह तोड़ता था, जितनी जरूरत उतना ही वह वहां से लेता था, इस बीच उसने एक भी नुक्सान नहीं किया था, न ही कोई उत्पात मचाया था,
आज देखा तो जगह जगह पर, पेड़ों को तोडा गया था, कहीं पर बड़े पेड़ों को भी नुकसान पहुंचाया गया था, साथ ही अनगिनत पानी की बोतल, शराब की खाली बोतल, प्लास्टिक के गिलास और बहुत सारा कचरा बिखरा पड़ा था, वह समझ गया, की आजकल यह जगह, शराबियों और जुआरियों का अड्डा बन चुका है, लेकिन इस बगीचे के नष्ट हो जाने से उसे ज्यादा दुःख लग रहा था, वह उसी बगीचे को बाहर से टहलते हुए देख रहा था, तभी एक चौकीदार, हाथ में डंडा लिए उसी ओर आता दिखा, पहले तो चौकीदार को देखकर ही लड़के दूर भाग जाते थे, पर आज वह लड़का नहीं भागा,
कभी जिसे देखकर कलेजा सूख जाया करता था, आज उसी चौकीदार को देखकर बड़ा अपनापन लग रहा था, और किसी पुराने रिश्तेदार की तरह उसे गले मिलने का मन होने लगा, लेकिन क्या करें, सबकी मजबूरियां होती है साहब, कोई यहाँ पर बिना मजबूरियों के पैदा नहीं होता, वह चौकीदार अपना डंडा हिलाते उसी लड़के के करीब पहुँच गया, उस लड़के ने बड़े दुखी मन से पूछा “भैया यहाँ तो संतरे का बगीचा था न ? कैसे मैदान साफ़ हो गया ?
“हाँ यार , यहाँ पर बहुत सुन्दर बगीचा था, और मेरे ही सामने यहाँ से संतरों को ट्रकों में लादकर पूरे देश में बेचने के लिए भेजा जाता था, क्या शानदार दिन थे, हम लोगों को भी खूब खाने मिलता था, मालिक हम लोगों को भी झोला भरकर संतरे दिया करते थे, जो मेरे बच्चों को बहुत पसंद आते थे, “यहाँ चोरी, तो शुरू से ही हो रही थी, लोग रात में भी जंगल के करीब, इस बगीचे में, चोरी करने पहुँच जाते थे, फिर भी कोई ख़ास नुक्सान नहीं पहुंचता था, ऐसा बोलकर वह टूटी फूटी कंटीली तारों की बाड़ देखने लगा, और कुछ सोचते हुए उसने, अपना डंडा बगल में दबाया, जेब से खैनी और चुना निकाल कर मलने लगा, वह फिर बोला, “
“पहले के चोर इमानदार होते थे, उनका भी कोई उसूल होता था, मर्यादा थी, उसने ठंडी सांस छोड़ते हुए कहना जारी रखा, “लेकिन जब नई पीढी के बच्चों ने यहाँ आना शुरू किया, तब तो हद ही हो गई, न तो उन्हें डर लगता था, न ही हमारे आने पर वो भागते थे, उलटे हम लोगों पर ही हमला कर देते थे, कभी कभी तो चौकीदारों को ही मार पीट कर भगा देते थे, जिससे हमें और भी मजबूत हथियार और डाबर मैन कुत्ते दिए गए, लेकिन वो चोर, रात में आकर उत्पात मचाने लगे, साथ ही पेड़ों को भी बर्बाद करने लगे, हम लोगों ने बहुत कोशिश की, इस बगीचे को सुरक्षित रखने की लेकिन क्या करें, रात में भी पहरेदारी होने लगी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, इतना विशाल बगीचा है, रात में पचास चौकीदार भी कम पड़ते थे,
जब और भी सुरक्षा तेज हो गई तो चोरों ने कच्चे फलों को तोड़कर फेंकना शुरू कर दिया, जब भी उन्हें मौक़ा मिलता, वे यहाँ आकर विनाश लीला करते, कभी कभी तो स्कूल के बच्चे , लड़के और लडकियां यहाँ आकर पिकनिक मनाया करते थे, जंगल में शिक्षकों के साथ घूमते, यहीं खाना बनाते, और यहाँ के छोटे से झरने से अपनी प्यास बुझाते थे, किसी को यहाँ कोई परेशानी नहीं होती थी, हम लोग ऐसे बच्चों और शिक्षकों को खुद जाकर संतरे बाँट आते थे, वे लोग भी ख़ुशी ख़ुशी धान्यवाद देते थे, कभी हमें भी वे लोग खाने के लिए पूछ लेते,
लेकिन धीरे-धीरे असामाजिक तत्वों को यह खटकने लगा, और उन्होंने यहाँ आने वाले बच्चों को तंग करना शुरू कर दिया, जिससे अच्छे लोगों का यहाँ आना ही बंद हो गया, और बदमाशों ने इस सुन्दर क्षेत्र को पूरी तरह से वीरान बना दिया,
आज तो यह जगह पूरी तरह से वीरान और सुनसान हो चुका है, कई सालों से संतरे के फल ही नहीं लगते, और जो थोड़े बहुत पेड़ों में फल लग भी जाते हैं, उन्हें बच्चे तोड़कर फेंक देते हैं, जैसे की उन्होंने ठान लिया है, की “हम नहीं खा सके तो !! किसी को भी खाने नहीं देंगे, ऐसी घटिया मानसिकता वाले लोग देश का कैसा भविष्य बनायेंगे बेटा?, मै यही सोचकर दुखी हो जाता हूँ, वह लड़का भी मौन रुदन रो रहा था, चौकीदार का गला भर आया था, उसने खैनी मुंह में दबाते हुए उस लड़के का नाम पूछा, क्या करते हो, और यहाँ इस तरफ कैसे आये, ये सब पूछा, उसने सब बताया, और बोला -
“मुझे आज से सुबह की सैर शुरू करने का मन हुआ, और मेरे मन मष्तिष्क में इस जगह के आलावा और कुछ नहीं सूझा, मगर मैंने रास्ते में कुछ नशेड़ी लोगों को भी देखा, फिर तो मेरा मन सकुचा रहा था, तभी इस जगह की दुर्दशा भी दिख गई और आपसे बात करने का मन हुआ,
“ठीक किया बेटा, अब तो यही हो रहा है, किसी को गलत काम करना है या नशा करना है तब वो यहीं आता है, तुमने देखा होगा, चारों तरफ गंदगी, कचरा और दारू की बोतलें ऐसे ही पडी है, असल में यहाँ के लोग खुद ही बर्बादी के जिम्मेदार हैं, इससे भले तो पहले के चोर थे, कम से कम उनके अन्दर का इंसान तो जिंदा था, हम लोगों की भी नौकरी खतरे में है, पुराना मालिक इस जगह को बेचकर चला गया, अब तो कोई विदेशी आदमी इस जगह का मालिक बन गया है, और इस बगीचे का पता नहीं क्या होगा, यह सुनकर मन भर आया, लेकिन क्या किया जाए ये उन दोनों को समझ नहीं आ रहा . ….

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