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दो भाई | Do Bhai

घरवालों ने बहुत मना किया, की मेला घूमने मत जाओ, घर में एक धेला नहीं था, माँ कैसे अपने बच्चों को बिना पैसों के मेले में भेजती. वहां जाकर खेल खिलौने और चाट की दूकान देखकर किसका मन नहीं ललचाता? माँ ने हनुमान जी से विनती की हे प्रभु मेरे बच्चों को मै कैसे भेजूं ? इन्हें कैसे समझाऊं की मत जाओ, लेकिन दोनों भाई नहीं माने,

और चल पड़े एक पुरानी सायकल में, अपने गाँव से पच्चीस किलोमीटर दूर - बानबरद नामक गाँव में, यहाँ माघ पूर्णिमा के दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, सबको जाता हुआ देख दोनों भाइयों का भी मन हुआ इस प्रसिद्द मेले में घुमने का, और खाली जेब निकल पड़े , मन में मेला जाने की ख़ुशी इतनी थी की न ही पैसों की चिंता हुई न ही पुराने कपड़ों में झिझक .
दोनों भाई आपस में बात करते हुए, मेले में क्या-क्या अनोखा नज़ारा देखने मिलेगा इसी की संभावनाओं की चर्चा करते हुए, उबड खाबड़ रास्ते पर चले जा रहे हैं, सन उन्नीस सौ सत्तर का दशक, ये आम बात थी की बीस या तीस किलोमीटर पैदल चलना या सायकल से कहीं जाना, आम जनता को इसकी आदत थी, विलासिता पर कम ही खर्च किया जाता था .
बड़ा भाई शंकर सायकल चला रहा है , छोटा भाई पुराण पीछे की जगह में बैठा है ,
दोनों के मन में अपार उत्साह है, और बिलकुल भी दुःख नहीं है की हमारे पास पैसा नहीं है, इसी तरह आधा रास्ता बीता, अचानक बड़े भाई ने जोर से ब्रेक लगाईं, और धुल भरे रास्ते पर सायकल रुक गई, थोडा सा टायर फिसला मगर सायकल नियंत्रित रहा, छोटे भाई ने उत्सुकता से पूछा “क्या हुआ भाई ?
“अरे थोडा उतर तो . छोटा भाई फ़ौरन आज्ञा पाकर उतरा, मन में कौतुहल लिए हुए, उसके बाद शंकर भी उतरा सायकल खड़ी करके वह सड़क के किनारे थोडा आगे गया और जमीन से कुछ उठा कर वापस मुड़ा , उसके हाथ में दो रूपये का नया नोट था, यह देखकर दोनों भाई बहुत प्रसन्न हो गए, छोटा भाई पुराण हाथ जोड़कर भगवान् को धन्यवाद देने लगा - “हे बजरंगबली आपकी दया और महिमा अपरम्पार है . चार आने भी बहुत थे , इन्हें तो पूरे दो रुपये मिल गए, यह एक बहुत बड़ी राशी थी, उस ज़माने में.
अब तो कोई समस्या नहीं थी, और दोनों भाई मेले के अन्दर पहुंचे . यहाँ बहुत बड़ी संख्या में लोग पैदल पहुँच रहे हैं, सड़क के किनारे से ही लोगों की भीड़ नजर आ रही है, विशाल मैदान में मेला लगा है, चारों तरफ लोगों की भीड़, असंख्य छोटी बड़ी दुकाने, जिनमे खेल तमाशे, बायोस्कोप वाले , खिलौने और चाट पकौड़ी की गुमटी भरी पडी है, दोनों भाई मेले का आनंद ले रहे हैं, शंकर के हाथ पुराण के कंधे पर है,
वह जता नहीं रहा था परन्तु उसे अपने छोटे भाई की सुरक्षा का विशेष ध्यान था, वह उसे दो पल के लिए भी अकेला न छोड़ता, इसीलिए उसने अपने हाथ अपने भाई के कंधे पर रखे थे ,
यहाँ रंग बिरंगी दुकानें थी जिसमे मन को ललचाने वाली एक से बढ़कर एक चीज़ें थी, जैसे लकड़ी के बने मोटर गाडी, खिलौने, चमकदार कपड़ों की दूकान, सर्कस वाले, देसी घी से बने मिठाइयों की मोहक सुगंध,
सबसे पहले दोनों भाइयों ने चार आने की बर्फी उड़ाई, और उतनी ही मात्रा घरवालों के लिए खरीदी जिसे पत्तों से बने पात्र में रखकर फिर उसे मोटे कागज़ की थैली में रख लिया, उसके बाद वे आखिरी सिरे तक पहुँच गए, जहां आम का बगीचा है, यहाँ कई लोग अपने दोस्तों के साथ मौज - मस्ती कर रहे हैं , कुछ लोग अपने परिवार के साथ घास पर बैठ कर खा पी रहे हैं .
इसी बगीचे के सामने श्री विष्णु भगवान् का भव्य मंदिर है . अब दोनों भाई उसी रास्ते से होते हुए एक दूकान के पास पहुंचे जहां बहुत भीड़ थी, ये जानने की यहाँ क्या हो रहा है ? इस बड़े अस्थायी लकड़ी के मंच पर खूब सजी हुई दूकान है, ऊपर का हिस्सा तिरपाल से ढंका गया है. यहाँ दुनिया भर की चीजें, जिनमे अधिकतर वस्तुएं दैनिक गृहप्रयोग की थी , कई लोग सामान के दुसरी ओर बैठे हैं , एक आदमी जोर - जोर से चिल्ला रहा है - “ आइये आइये मात्र पचास पैसे में इनामी कूपन पाइए, निश्चित उपहार का वादा , उपहार पसंद ना आने पर पैसे वापस, वापस , वापस .
लोग उत्साह और लालच में आकर कूपन खरीद रहे थे . कुछ लोगों को राशी जितनी कीमत का सामान मिल रहा था, किसी किसी को कई गुना दाम का सामान उपहार में प्राप्त हो रहा था , शंकर ने छोटे भाई से पूछा - “क्या कहते हो “पुरु “ ले लूँ , मै भी एक कूपन ?
पुराण उत्साहित होकर बोला “हाँ भैया ले लो ना .
उसने भी एक कूपन खरीदा. वह लाल रंग की छोटी सी पुडिया थी उसे खोलने पर अन्दर से एक सफ़ेद रंग का परचा निकला, जिसमे अंगरेजी भाषा में स्टोव लिखा था, उसने फ़ौरन अपने छोटे भाई को यह शुभ समाचार सुनाया और खुशी - खुशी वह कागज़ का टुकडा सामने खड़े दुकानदार को थमाया ,
उसने सोचा “गाँव के तो लग रहे हैं , इन्हें क्या पता होगा अंग्रेजी भाषा के बारे में, और उसने स्नो क्रीम की डिबिया उठाई और शंकर को थमाने लगा . शंकर तुरंत उस दुकानदार से बोला “भैया किसको बेवकूफ बना रहे हो” मै अभी मैट्रिक कक्षा में पढता हूँ , अपने कक्षा में सबसे अव्वल आता हूँ अंगरेजी भाषा में . इतना सुनकर वह दुकानदार बुरी तरह झेंप गया और बात सम्हालते हुए बोला “अरे नहीं भाई मुझसे पढने में गलती हो गई , मैंने गलती से स्टोव को स्नो समझ लिया, अभी आपका इनाम आपको देता हूँ , ऐसा बोलकर उसने एक बड़ा सा सीलबंद डब्बा शंकर को दिया जिसमे लिखा था - नूतन अमिका स्टोव .
आज तो दुगुनी ख़ुशी मिल गई , बड़े भाई ने वहीं पर उस डब्बे को खोलकर अन्दर के सामान को जांचा, तभी उसने वह दूकान छोडी .
इसके बाद उन्होंने अपनी बहनों के लिए भी कुछ खिलौने लिए, और ताजे हरे चनाबूट भी खरीदे,
फिर चने खाते हुए वे ख़ुशी ख़ुशी अपने घर लौट आये। 

समाप्त

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