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मेरे दो बैल | Mere Do Bail

बचपन की सबसे अच्छी बात ये है की फिक्र क्या है, ये हम नहि जानते थे, और गर्मी की छुट्टियों में मामा के गाँव जाना और अपने ममेरे भाई बहनों के साथ खूब मस्ती करना मुझे बहुत भाता था . लेकिन सिर्फ एक ही दिक्कत थी , की स्नानघर जाने के रास्ते में दो बैलों को बाँधा जाता था, और जब भी मुझे स्नानघर जाना होता तो वो दोनों बैल मुझे अपनी गर्दन हिलाकर खूब डराते, और अपने लम्बे-लम्बे सींग दिखाते, जिससे मुझे बहुत दिक्कत होती थी. हर बार किसी न किसी को मै साथ ले जाता की मेरे साथ चलो मुझे पेशाब जाना है,
कई बार तो मन में ख़याल आता की अब गाँव नहीं जाऊँगा, लेकिन हर बार मै पारिवारिक प्रेमवश अपने मामाजी के गाँव जरूर जाता था. इस बार भी गाँव पहुँच कर सबसे पहले मैंने उन बैलों को ही झाँका, उन्होंने भी अपने परिचित अंदाज़ में मुझे घूरा .
दोनों अपने आराम स्थल में खूंटे से बंधे हुए चारा खा रहे थे, उनके सामने पत्थर का बहुत बड़ा पात्र रखा था, जिसमे उनके पीने का पानी रखते हैं, स्थानीय भाषा में इसे “कोठना” कहते हैं .
खैर, पारिवारिक मिलन होने के बाद, हम सारे भाई बहन बातें करने लगे और गर्मी की छुट्टियों को आनंददायी बनाने की योजना बनाने लगे, शाम के वक्त मैंने सबको एक हिंदी कविता सुनाई जिसकी खूब तारीफ हुई, मन प्रसन्न हो गया, अपार ख़ुशी और आनंद से मेरा ह्रदय प्रफुल्लित था, उसी वक्त मुझे पेशाब जाने का मन हुआ और कदम बढ़ चले बैलों की ओर,
आज मन प्रसन्न था और पता नहीं एक अजीब सी ऊर्जा मेरे अन्दर विद्यमान थी, जिससे ऐसा लग रहा था की मै आज कुछ भी कर सकता हूँ, तो मैंने बैलों का सामना करने की सोची, और उसी सोच के साथ मै बैलों के निकट पहुँच गया, लेकिन थोडा डर भी लगने लगा, दोनों सफ़ेद बैल दिखने में हष्ट पुष्ट , पांच फीट ऊँचे मुझे देखते ही नथुने सिकोड़ने लगे, मैंने सहमे हुए अपने हाथ आगे बढाए , निकटतम बैल ने अपनी सांस छोड़ते हुए जोर से माथा हिलाया, डर के मारे मेरे हाथ फ़ौरन एक झटके में वापस आ गए, मैंने फिर प्रयास किया इस बार दोनों बैल एक साथ अपना सर हिलाकर विरोध जताने लगे, मानो वे मुझसे बहुत ज्यादा नाराज हैं, कुछ देर तक मै अपने हाथ आगे बढाता रहा , लेकिन उनके सिंग भी नहीं छू पाया, आज मेरे पास अजीब सी आत्मशक्ति थी, जो मुझे हारने नहीं दे रही थी,

एक बार फिर से हाथ आगे बढे, इस बार बैलों के गुस्से को सहता हुआ मेरा हाथ पहले खड़े बैल के मस्तक को छू गया और उसका सर लगातार हिलता रहा, मैंने भी हाथ नही हटाये और दुसरे हाथ से पीठ सहलाने लगा, फिर दुसरे बैल को छूकर उसे भी सहलाया. धीरे से दोनों बैल शांत होने लगे और मुझे वहां रहने और खुद को मेरे द्वारा छुआ जाना स्वीकार करने लगे, अब मैंने पहली बार उन मौन जीवों का प्यार महसूस किया और उन्हें गले से लगा लिया, ऐसा करके जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता,
उसके बाद मै आगे बढ़ा और लघुशंका से निवृत्त होकर वापस उन बैलों के साथ काफी समय व्यतीत किया, आज से वो दोनों मेरे मित्र बन गए और मै उन्हें पाकर प्रफुल्लित हो गया, उस दिन के बाद मुझे उनके साथ कभी भी कोई दिक्कत नहीं हुई और, उल्टा घरवाले घोर आश्चर्य में पड़ गए की इसको क्या हुआ ? पहले तो बैलों के नाम से चिढ़ता था, और अब देखो - कैसे बैलों के साथ बातें करने लगा है . उन दोनों बैलों से जो प्रेम मिला वो शायद ही कभी जीवन में मिल पाए .
आज भी वो दोनों बैल मेरे परम मित्र हैं , और अब गाँव जाने की बात से मै बहुत खुश हो जाता हूँ ..

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