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भाई साहब | Bhai Sahab

“भाई साहब , यह वाक्य सुनते ही, महेश कांपने लगता था , उसे इस नाम से इतना भय लगता था, की, उनके आगमन की सूचना मात्र पाकर,वह घंटों पहले पढने बैठ जाता, वैसे “भाई साहब, जो हैं, वे महेश के ताउजी के लड़के हैं और दुसरे गाँव में रहते हैं, लेकिन महीने में पांच बार तो, महेश के घर ज़रूर प्रगट हो जाते, और, महेश की खूब परीक्षाएं ले जाती,

हालांकि, महेश ठीक ठाक पढने वाला बच्चा था, उसे कोई बुरी संगती भी नहीं प्राप्त हुई थी, अपने घर में, छोटा लड़का, महेश का बड़ा भाई, रवि गुप्ता “वर्नाकुलर” की परीक्षा पास करके, वहां के मालगुजार के यहाँ मुंशी के अधीन लेखा सहायक बन गया था, जिससे महीने में वह तीस रुपये वेतन पाता था, दो- चार रुपये उपरी आमदनी होती थी, उसकी शादी हो चुकी है, उसकी पत्नी रेखा अपने नाम के अनुसार गुणवती है, और उसका बस चलता, तो वह तुरंत अपने पति संग, इस घर से चली जाती, लेकिन ये भी ताउजी के बड़े लड़के, देवीप्रसाद गुप्ता जी से बहुत डरती हैं,
महेश के माता-पिता, अपनी किसानी और पशुपालन में मस्त रहते हैं, उन्हें किसी की मदद नहीं चाहिए, वे खुद अपना उदर पोषण करने में सक्षम हैं, और घर चलाना उन्ही से होता है, बड़ा लड़का ठीक से रूपये नहीं देता, ऊपर से बहाने बनाता रहता है, इस माह बहु के इलाज में बहुत खर्चा हो गया, वैद्य जी ने खूब “चूना लगाया, इससे अच्छा तो शहरों के डाक्टर होते हैं, ऊपर से मेरी तनख्वाह ही कितनी है, उसे लगता है, की माता पिता को क्या जानकारी होगी, मेरी कमाई के बारे में, लेकिन पूरा गाँव जानता है उसकी कमाई के बारे में .
देवीप्रसाद गुप्ता जी, चालीस के आस पास, लेकिन पहलवानी से करीबी नाता होने से कोई नहीं कह सकता की दो बच्चों के बाप है, इन्हें आज भी कहीं लड़की दिखाने ले चलो, ऐसा आकर्षक व्यक्तित्व की लड़की वाले भी तुरंत आँख मूंदकर अपनी लडकी का गौना कर दें .
आज रविवार का दिन है, सुबह से महेश पढने बैठा है, माँ समझ गई की ऐसा क्यों हो रहा है, आज न तो वह खेलने गया न ही घर के बाहर दिखाई दिया, ये प्रभाव है भाई साहब के डर का . भाई साहब एक मदरसे में, अंगरेजी भाषा पढ़ाते हैं, और अपने क्षेत्र हीरापुर में सम्माननीय शिक्षक हैं, खासकर दो चार शब्द अंगरेजी में बोल देने वाले इंसान को तो गाँव में कोई भी बहुत सम्मान देने लग जाता है, ये तो पूर्ण रूपेण अंग्रेजी के ज्ञाता हैं, इनकी तो बात ही निराली है,
पास के गाँव “नावला में अपने चाचाजी के यहाँ आते जाते रहते हैं, अपनी सायकल पर सवार कभी भी आ जाते, और अपने चाचाजी के घर का हर फैसला इन्ही के द्वारा लिया जाता, भले ही वह उनकी बुद्धी से परे हो, पिछले महीने पशु मेले में इन्ही को दिखाकर ही गाय खरीदी गई थी, और आज भाई साहब, दोपहर को ही महेश के यहाँ पहुँच गए, आते ही, उन्होंने अपने चाचा जी को प्रणाम किया, फिर महेश दौड़कर आया और भाईसाहब के पैरों में गिर गया,
“कैसे हो "भैया" महेश ? तुम्हारी पढ़ाई के क्या हाल हैं, "बबुआ ? भाईसाहब ने उसे घूरते हुए पूछा, “ठीक हूँ भाई साहब, और अभी के मासिक इम्तिहान में मुझे सबसे ज्यादा अंक मिले हैं, महेश थोडा सा गौरव पूर्ण मुस्कुराते हुए धीरे से बोला, भाई साहब ने उसकी उम्मीद के विपरीत कोई शाबाशी नहीं दी, उलटे सख्त होकर बोले - “कैसे दिख रहे हो, लगता है आजकल बुरी सांगत में पड़े, आवारा लड़कों के साथ घूम रहे हो , देखो न ही तुम्हारी देंह कैसे खजूर के पेड़ की तरह लम्बी है, ऊपर से चेहरे में कोई चमक नहीं,
“नहीं भाई साहब मै तो सिर्फ पढता हूँ, और घर में खूब खाता हूँ आप माँ से पूछ लीजिये, महेश सोचने लगा, पिछले रविवार की शाम को छोटेलाल के शादी के जलसे में खूब नचनियां आई थी, और वो भी उस रंगारंग कार्यक्रम को दूर से झाँकने चला गया था बस, इन्हें किसने बताया होगा ?
“मुझे किसी से नहीं पूछना, मै सब जानता हूँ, तुम्हारी हर चाल की खबर रखता हूँ, भाई साहब अब आँगन में बिछी खाट पर बैठे, उनके ठीक सामने एक मौसंबी का पेड़ है, और उसके नीचे तुलसी चौंरा, जो की चूने और नील से सजा हुआ है, नीचे आँगन में गोबर से लिपाई हुई है, उनके ठीक पीछे, गायों का तबेला है, भाई साहब ने आदेश दिया “इधर आओ मेरे पास बैठो, महेश कांपते हुए उनके पैर के पास नीचे जमीन पर बैठ गया, भाई साहब उसे ही घूर रहे हैं, वे फिर बोले "अपना कुरता निकालना, और सीधे बैठो सीना तान के . कैसे मरियल सियार की तरह पेट में पैर घुसाए बैठे हो,
अब महेश अपना कुरता निकाल के नंगी देह सीना तान कर बैठ गया, भाईसाहब उसे ही घूरे जा रहे हैं, इस दौरान पंद्रह साल का लड़का महेश अपने द्वारा किये गए, सारे कुकर्मों का हिसाब करने लगा, जो उसने किये भी न होंगे, और मन में द्वंध चल रहा है, “हे भगवान् आज मुझे बचा लो, कल से मै दिन रात सिर्फ पढ़ाई करूँगा, नोहर और प्रभात के साथ कभी नहीं घूमूँगा, हे भगवान् …..
भाईसाहब उसकी आँख में देखते हुए बोले - तुम कैसे मुरझाये हुए दिख रहे हो, सुबह-सुबह दौड़ लगाओ, दूध- घी पियो, रोज गुड और चना चबाया करो, तब ताकत आयेगी, और क्या करते रहते हो सारा दिन घर में ? “भाईसाहब मै विद्यालय से आकर पढ़ाई करता हूँ, शाम को गायों को चारा पानी देता हूँ, फिर पढता हूँ बस, मगर फिर भी काफी वक्त बच जाता है, उसका कैसे उपयोग करूँ ?
“अरे” रोज घर के काम किया करो, दूध दूहा करो, फिर भी समय न कटे तब रोज चूना लेकर अपने घर के पीछे की दीवार पोता करो, खेत में काम करने जाओ, समय कहीं नहीं बचेगा, समझे . महेश ने मौन स्वीकृति में अपना सर हिला दिया, और आज तो उसने अपने खाली होने की बात कहकर अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार ली, महेश ऐसा ही करने लगा, और वह पूरी कोशिश करने लगा की भाई साहब नामक प्राणी को खुश रखा जाए, साथ ही वह उन जासूसों को ढूंढने लगा जो भाई साहब को जाकर मेरी चुगली करते हैं,

समय का पहिया घूमता रहा, रवि आखिरकार अपनी पत्नि मोह के कारण हीरापुर स्थानांतरित हो गया, यहाँ उसने पक्का मकान बनवा लिया और अपनी पत्नी के साथ मजे से रहने लगा, वह अपने माता पिता की चिंता से मुक्त हो गया, उसके कुछ समय बाद ही, महेश के पिताजी “सर्पदंश की वजह से स्वर्गवासी हो गए, इस कठिन परिस्थिति में भी रवि ने सिर्फ आर्थिक मदद ही दी, जो की मुंशी जी की तरफ से मिली थी, और सारा अंतिम कार्यक्रम निपटा कर वापस जाने लगा तब, समाज वालों ने उसे समझाना चाहा, “बेटा अब तुम ही इस घर के मुखिया हो, इस घर की पगड़ी अब तुम्हारे सर पर है, न जाओ बबुआ, .. पर माँ नहीं, मानी उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया, उसकी खुसी में हामाओ खुस है, तुम जाओ बिटवा, अपने जोरू संग आनंद भये रहो.
महेश को सबसे ज्यादा उम्मीद अपने हीरापुर वाले भाईसाहब से ही थी, की उनके रहते हमारे घर पर कोई आंच नहीं आयेगी, उसका बड़ा भाई गया तो क्या हुआ ? मगर भाईसाहब भी उन्ही की तरह चमत्कारी निकले, जब तक आव भगत होती रही तब तक बराबर आते रहे, अब तो महीने में एक-दो बार आ गए तो बहुत है, महेश इसी बात से थोडा दुखी हुआ, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी. उसने पढ़ाई छोड़ दी, अब खेती-बारी में अपनी माँ का हाथ बंटाने लगा,
उसकी माँ खूब मेहनती महिला हैं, सारा दिन काम करती, भोर होते ही दूध दुहती, गाय को चारा खिलाती, खाना पकाकर, खेत चली जाती, शाम को लौटकर फिर वही प्रक्रिया दोहराती, और अँधेरा होने से पहले दिया-बाती, करके, घर का चूल्हा जल जाता, महेश पूरी तरह से अपनी माँ की मदद करता, वह भी रोज कुँए से पानी भर लाता, और हरसंभव काम करने लग जाता, बाहर से सब कुछ ठीक लगता, मगर अपनी माँ के छुपे हुए आंसुओं को देखकर उसका मन भी भर आता,
बड़ा भाई कभी-कभी आकर बड़े होने की खानापूर्ति करके चला जाता, उसकी पत्नी रेखा हर बार बीमारी का बहाना बना देती, महेश इससे कुढ़ जाता मगर माँ उन्हें अपना आसीस देती, साथ में ढेर सारा साग-भाजी, तिलहन और दूध घी, भी भिजवा देती, इस दौरान महेश ने यह पता किया की उसके ही गाँव के ही दो बुज़ुर्ग जन - सुक्खी, और दीना, काका, जो सारा दिन तो, राम राम करते रहते हैं, उन्ही लोगों की गुप्तचर कला के कारण महेश की हर खबर भाई-साहब तक पहुँच जाती थी, उसने इन दोनों को सबक सिखाने का इरादा बनाया.

अब वह पूर्णतः किसान बन चूका है, साथ ही, उसके कुछ साथ के किसान जो उसी की उम्र के हैं वे लोग, बीड़ी और खैनी, का उपयोग करने लगे हैं, वो उन्ही लोगों के साथ घिरा रहता, और कभी भी अगर सुक्खी और दीना दिख जाते तो वह उनके सामने खैनी रगड़ने लगता और बीड़ी का धुंआ उड़ाने लग जाता, मौका मिले तो इन दोनों के सामने किसी मंदहा की तरह, महुए के नशे में झूमने का अभिनय करने लग जाता, इस दौरान उसको अपने पराये की समझ हो चुकी थी, और उसने जान लिया की पिता और पैसों के बिना समाज में इज्जत नहीं मिलती,

उसका बिछाया जाल, आखिर काम कर गया, फगुआ त्यौहार के एक दिन पहले भाई साहब महेश के घर पहुंचे, आज तो वे विशेष नाराज दिख रहे हैं, उन्होंने महेश को आते ही डांटना शुरु कर दिया, “क्यों रे तू बड़ा आदमी हो गया, महुआ पीने लगा है, खैनी चबा के छैला बनत है, मंदहा बनके पडा रहेगा कभी किसी नाले में या सड़क पर तो तोहरे बाबूजी की आत्मा को बहुतेही सांति मिलेगी न ? सही कह रहे हैं की नाही....., सच सच बताओ, वे महेश की आँखों में झाँकने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन महेश आज कुछ नहीं बोल रहा, उसकी अम्मा रसोई की बाहर द्वार पर ही चुपचाप खड़ी है, कुछ देर बाद वे थोडा सा जलपान करके चले गए,
महेश अब समझ चूका है, की दो जासूसों की बात सच थी, सत्य को प्रमाण क्या ? भाई साहब ने आज उसके तंदुरुस्त शरीर और चमकते हुए चेहरे को नहीं देखा, मन में तो सिर्फ जताने और डांटने की चाहत थी, तो ??
उसके गुण कहाँ से दिखेंगे, उन्हें ये नहीं दिखा की घर में एक और नई गाय आ गई है, उसके घर में सफाई और पुताई हुई है .

महेश धीरे-धीरे अपने परिवार वालों से चिढने लगा, और चिढ़े भी क्यों न ? सब दिखावे के होते हैं, वह अपने काम-धाम और माँ की सेवा में ही ख़ुशी पाता, मगर भाई साहब नहीं बदले, हर बार एक ही संवाद - “क्या सुन रहा हूँ तुम्हारे बारे में ? ये क्या कर रहे हो आज कल ? हर बार महेश का गुस्सा नियंत्रण के बाहर हो जाता, और उसके सब्र का बाँध टूटने के कगार पर था,
ऐसे ही एक दिन, भाई साहब फिर महेश से टकरा गए, लेकिन इस बार जगह कुछ और है, वो है, परिवार में किसी की शादी का कार्यक्रम, शामियाने के अन्दर मेहमान और परिवार के लोग मिलन समारोह मना रहे हैं, और महेश के लिए आज भी वही संवाद और भाषण, मगर इस बार श्रोताओं की संख्या थोड़ी ज्यादा थी, बिना मतलब के शुरू हुए भाषण का क्या अर्थ ? मगर ऐसे ही मौके तो परिवार वालों को चाहिए, ताकि, दूसरों के बच्चों और उनकी गलतियों का जी भरकर रसपान किया जाए . और फिर सुनी सुनाई बातों को मसाला मार के आगे प्रचारित किया जाए, मगर आज भाईसाहब ने भारी भूल कर दी, ऐसा करके.
उनके भाषण को बीच में ही रोकते हुए महेश चिल्ला बैठा,- बस ! भाई साहब बस, बहुत बोल लिया आपने, और बहुत सुन लिया मैंने !! , "लेकिन कब तक ? जब देखो तब मेरी ही बुराई, मेरी ही गलती नजर आती है, कभी अपने बेटे की भी जासूसी करवा लेते, अपने सुक्खी और दीना से बोलकर तब पता चल जाता. मै सर झुका कर सुनता रहता हूँ, इसका मतलब ये तो नहीं की मै सार्वजनिक ढोलक हूँ . कोई भी राह चलता आकर पीट जाए … मुझे माफ़ करो भैया, लेकिन अब ये झेला नहीं जाएगा. ऐसा बोलकर उसने चरों तरफ एक नजर दौड़ाई और उसने अपना लाल गमछा गले में घुमाया, फिर पाँव पटकता हुआ वहां से निकल गया. सब लोग उसे ही जाते देखता रह गए, और भाई साहब को आज अपनी गलती का अहसास हुआ, मगर ये सिर्फ उन्हें ही हुआ. आज उनके मुंह से कुछ नही फूटा, और वे चुप रह गए.

आगे जो हुआ, वह तो सबको पता है, कई महीने दोनों घरों में बात चीत बंद रही, मगर धीरे धीरे सब कुछ बदल गया, महेश की शादी हुई, बच्चे हुए एक बार फिर उसका घर खुशियों से भर गया, परिवार में भी उसे पूछा जाने लगा, समय एक दिन वापस लौटकर जरूर आता है, और खोई हुई खुशियाँ फिर लौर आई, महेश अपने परिवार वालों को हमेशा याद करता है, कभी कभी अपने परिवार के लोगों से मिलने जाता है, कोई घर पर आये तो खातिरदारी में कोई कमी नहीं की जाती,

और हाँ “भाई साहब, भाई साहब भी आते हैं, महेश भी उनके घर जाता है, पुरानी बातें सब भूल गए हैं, महेश अब समझ चुका है, की भाई साहब उसके भले के लिए ही उसको डांटते थे, और जितना फिक्र वो करते हैं, उतना परिवार में कोई नहीं करता, इसलिए अब वो भाई साहब को सदैव सम्मानित मानकर चलता है, हाँ,!! उनका डांटना थोड़ा ज्यादा था, लेकिन अब सब ठीक है, बस ज तुमसे मिल जाए, जो तुम्हारे साथ समय व्यतीत करे उसे हमेशा प्यार और सम्मान दो, और किसी से आस मत लगाओ की, कोई हमेशा तुम्हारी मदद करता रहेगा, इसी प्रकार किसी से कोई उम्मीद न लगा के जीने में ही सच्चा सुख है ….

समाप्त …...

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