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असली रिश्तेदार | Asli Rishtedaar

"मेहनत और लगन से आज इनके पास अपनी खुद की तीन कपडे की दूकान है, जमीन जायदाद अलग, जब दीनदयाल गुप्ता जी, बिलासपुर पहली बार आये थे, तब उनके पास सिर्फ पांच सौ रुपये थे, साथ में धर्मपत्नी,दो बेटे, दो बेटियाँ, और सामान के नाम पर कुछ कपडे, बस, लेकिन पच्चीस साल की मेहनत और लगन से आज इनका खुद का विशाल घर और कारोबार है, दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है, दोनों बेटे भी कारोबार सम्हालने में पूरा ध्यान देते हैं,
रोज सुबह श्री राम मंदिर जाकर, पंडित जी से रामायण की चौपाइयां सुनते और आरती के पश्चात ही उनके दिन की शुरुआत होती है, यहाँ वे रोज आते हैं, कभी कभी, मंदिर प्रांगण में झाड़ू भी लगाते दिख जाते हैं, कभी तो देर तक बैठकर, पंडित जी के साथ चाय पीते हुए धार्मिक चर्चा होती है, गुप्ता जी बहुत ही धार्मिक और दयाकू प्रतीत होते हैं,
लेकिन उनके व्यक्तित्व का दूसरा भाग यह है की, अपने मोहल्ले में किसी से नहीं जमती, अपनी मुख्य दूकान के ऊपर ही इनका विशाल मकान है, और किसी से भी इन्होने अच्छा सम्बन्ध बनाकर नहीं रखा है, इनके घर पर सिर्फ रिश्तेदार या बड़े अधिकारी, अमीर व्यक्ति ही आते हैं, इनकी दुकानदारी खूब चलती है, सबसे छोटे बेटे की शादी की बात चल रही है, यह इस घर की आखिरी शादी है, इसलिए हलवाई और फूल वालों को विशेष रूप से कानपुर से बुलाया गया है, मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए इस लिए एक महीने पहले से ही तैयारी शुरू हो चुकी है,
आज सुबह से घर में काफी चहल-पहल है, कुछ रिश्तेदार और थोड़े से विशेष अतिथि आ चुके हैं, इनके सभी प्रतिष्ठान आज बंद हैं, इनके छोटे लड़के प्रभात के तिलक के लिए लड़की वाले कबीरधाम जिले से से पधार चुके हैं, उनकी खातिरदारी और स्वल्पाहार के बाद, तिलक की रस्म का आरम्भ हुआ, पंडित जी पूजा शुरू कर चुके हैं, तिलक में लाये हाय सारे सामान, उपहार, पूजा की जगह के पास रख दिया गया है,
उसी वक्त लडकी वालों से किसी छोटी सी बात पर झड़प हो गई, और यह वाद विवाद में बदल कर बड़े झगडे में बदल गई, और जिस इंसान से इसकी शुरुआत हुई थी, वह कोने में जा छुपा, अब तो दोनों पक्षों में खूब लड़ाई होने लगी, गुप्ता जी के परिवार वालों को मार पड़ने लगी, क्योंकि जो रिश्तेदार और मेहमान आये थे, वे संख्या में कम थे, साथ ही कौन फ़िज़ूल की लड़ाई में कूदता, अब तो स्थिति विकट हो चली थी. उन्हें फोन करने का समय मिले तो वह किसी पुलिस अधिकारी को फोन लगाते, जिसको मार पड़ रही है वो, मददद के लिए चिल्ला रहा है, दुसरे को बचाने जाओ तो तीसरा मदद मांग रहा है,
आज उनके पास कोई बचाव का उपाय नहीं था. तभी मोहल्ले वालों को इस घटना की सूचना मिल गई, गाली गलौच की आवाज साथ में महिलाओं का चिल्लाना सुनकर पास के दुष्यंत काका से रहा नहीं गया, उन्होंने फ़ौरन पास के लोगों से मदद करने की अपील की, सौरभ नाम का लड़का बोल पडा, “ मार पड़ने दो सालों को, वैसे भी कौन सा ये लोग हमें अपना पड़ोसी मानते हैं, दुष्यंत जी भड़कते हुए बोले, “वो कैसे भी हों, हमें तो उन्हें फिलहाल बचाना है, बाकी बातें बाद में, और पूरे मोहल्ले के लड़के और जवान मर्द उन्हें बचाने कूद पड़े, उनके दूकान के सामने लगी शामियाने में घुसकर, लडकी वालों को हटाने लगे, और जो ज्यादा गर्मी दिखा रहा था, उसे पीटने लगे,
कुछ ही देर में हालात पर काबू पा लिया गया, अब उनको मार पड़ने लगी, और जो पिट रहे थे, उन्हें अब दुश्मनो को पलट कर मारने का अवसर मिल गया, जिन गाड़ियों में लडकी पक्ष के लोग आये थे, वे तुरंत उसी में जान बचाकर भागे, किसी ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, और इस तरह से गुप्ता जी का परिवार बचा, अब दीनदयाल गुप्ता जी ने हाथ जोड़कर मोहल्ले वालों को धन्यवाद दिया, और अपनी भूल का अहसास भी हुआ,
अब गुप्ता जी काफी बदल चुके हैं, मोहल्ले वालों का साथ देते हैं, हर उत्सव और त्यौहार में सहभागिता दिखाते है, मोहल्ले के हर सुख दुःख में बराबर शामिल होते हैं, आज तो वे चंदा देने में भी कंजूसी नहीं करते, सबसे पहल पडोसी ही साथ देता है, इसलिए अपने पड़ोस वालों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखें ...........................................

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