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प्रेम के दुष्प्रभाव 2 | Prem ke dush prabhav-2

एक छोटी सी गलती की वजह से ललिता की जिन्दगी बदल गई, अब वह अपने घर से दूर, "जबलपुर" के “रानी दुर्गावती विश्विद्यालय” से अपने कालेज की पढ़ाई करने लगी, यहाँ उसके ताउजी का घर है, और बड़ा ही सख्त माहौल . यहाँ उसे सिर्फ पढने की आजादी मिली, उसके ताउजी तो पिताजी से भी सख्त निकले, वैसे भी वह दूध की जली अबोध बालिका, सिर्फ पढ़ाई से मतलब रखने लगी, उसने समझ लिया था, की बचपन का प्रेम हमेशा घातक होता है, इतनी कम उम्र में, वह अब बहुत समझदार हो चुकी है, और इसी लिए किसी भी लड़के से वह बात भी नहीं करती, सीधे रस्ते कालेज जाना और वैसे ही वापिस आ जाना, उसने तो उम्मीद ही छोड़ दी, थी, की उसे आगे पढने दिया जाएगा, मगर किस्मत ने उसे एक और मौका दे दिया, इसलिए वह सिर्फ पढने में ही ध्यान दे रही है .

यहाँ उसकी दोस्ती एक लडकी से हुई, नाम है निशा रावत, जो दिन भर चहकती रहती है, इसके बहुत सारे दोस्त है, और कई लड़के इसके परम मित्र हैं, निशा खूब चहकती रहती और कई लड़कों को अपने उंगली के इशारे पर घुमाती भी रहती, ललिता उसे टोकती नहीं थी, न ही उसे ऐसा करते देख कभी आपत्ती हुई, वो जानती थी, इसको समझाने से कोई फायदा नहीं होगा, जिस दिन इसको ठोकर लगेगी उसी दिन इसको सदबुद्धी मिलेगी, बस वह कोई भूल नहीं करना चाहती थी, तो, उसने साफ़ साफ़ शब्दों में उसे समझा दिया था, की मै यहाँ सिर्फ पढने आई हूँ,

ललिता अपने घर वालों से बहुत कम बात करती थी, और अपनी बहन के फोन का भी अक्सर वह जवाब नहीं देती थी, उसका मन टूट चूका था, जिसको उसने अपार प्रेम किया था, वह भी उसे कबका भूल चूका था, जबलपुर में ही उसने पढ़ाई के दौरान ठान लिया था, की कुछ बड़ा करना है, कुछ बड़ा पाकर, वह अपने घरवालों के सामने दुबारा अपनी गँवाई इज्जत वापिस पाना चाहती है, इस लिए वह हमेशा मन लगाकर पढ़ती थी, और उसने ठान लिया था, की चाहे कुछ भी हो जाए, कुछ बन के दिखाना है,

यहाँ वो पढ़ाई में व्यस्त रहती है, दुसरी तरफ उसकी सहेली निशा हर वक्त मौज मस्ती में डूबी रहती, उसका पड़ोसी, विजय पढ़ाई में होशियार और बहुत ही सभ्य लड़का है, वह हमेशा उसे "ललिता जी" कहकर संबोधित करता, उसका इतना अच्छा व्यवहार देखकर ललिता हमेशा सोचती “हो न हो ये भी सिर्फ अच्छा दिखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके अन्दर भी एक बुरा "सोहन" रहता होगा, जो की सही वक्त आने पर अपना रंग दिखा देगा, उसे सारे लड़कों से नफ़रत हो गई थी,

आज निशा, सुबह सुबह ही ललिता के घर पहुँच गई, जींस और काली टी शर्ट पहने खूब श्रृंगार किये हुए, और उससे कहने लगी - "तैयार नहीं हुई अब तक, ? जल्दी करो भई, हम कालेज में लेट हो जायेंगे, ललिता अभी-अभी नाश्ता करके उठी थी, और कालेज के लिए तीन घंटे बाकी थे, उसकी ताईजी रसोई घर से हाथ पोंछते हुए आश्चर्य से पूछा “आज इतनी जल्दी कैसे ? कालेज तो बारह बजे से है, ना ? उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में शंका व्याप्त है, “वो आज विशेष कक्षा है ना, बायो वाले सर की, इसलिए जल्दी निकलना है, ये बात तो ललिता को तो पता ही नहीं थी, वह कुछ बोली भी नहीं, जल्दी से तैयार होकर अपना बैग लिया और दोनों निकल पड़े बस स्टॉप की तरफ पैदल,

अब ललिता ने चलते हुए पूछा “तुझे कैसे पता की आज स्पेशल क्लास है ? और तू मेरे घर तक कैसे आई ? उसको ये बात जानने की उत्सुकता थी, निशा मुस्कुराते हुए बोली, अरे यार ठण्ड रख, आज कोई स्पेशल क्लास नहीं है, और मै कैसे आई, अभी पता चल जाएगा, कुछ ही देर में निशा का पड़ोसी, जो उसी के क्लास में पढता है, अपनी बाइक पर वहीं आया, उसके आते ही, निशा तुरंत उसके पीछे बैठ गई और बोली - "अब क्या न्योता देना पड़ेगा, मैडम को? ललिता को समझ नहीं आया की क्या हो रहा है, ऊपर से वह डर रही थी, की ताऊ जी के लड़कों ने देख लिया तो आफत आ जायेगी, इसलिए वह डरते हुए बोली - हम कहाँ जा रहे हैं, तुम्हे पता है ना मुझे ये सब पसंद नहीं, निशा भी महाभयंकर जिद्दी और बेशरम लडकी थी,

अरे बैठ तो सही, सब बताती हूँ, मेरी माँ ! जल्दी से बैठ यार, उसने उसका हाथ खींचकर उसे आखिरकार बिठा ही लिया, और विजय को गाडी बढाने का आदेश दे दिया, तीन लोग एक मोटरसायकल पर सवार, सिविल लाइन रोड, पर वो लोग आगे बढ़ने लगे, ललिता बहुत घबराई हुई है, उसको कोई भी गलती करने से कैसे भी बचना है, निशा भी कुछ बता नहीं रही थी, और उसने विजय को भी मना कर दिया, बीस मिनट बाद एक पुराने किले के पास गाड़ी रुकी, सुनसान इलाका यहाँ दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा, वो अब भी हैरान है, हम क्यों यहाँ आये हैं,
यहाँ पर पहले से एक बाइक खड़ी है, और प्रवेश द्वार टूटा हुआ है, उसके बाद खूब बड़ा किले का प्रांगण उसके उपरान्त किले की दीवारें, उस किले के चबूतरे में एक लड़का बैठा हुआ है, जो की पीले रंग की शर्ट पहने दूर से ही आकर्षक लग रहा है, उन लोगों को आते हुए देखकर वह उठा, और आगे बढ़ने लगा, इन लोगों ने भी गाड़ी वहीं रखी और अन्दर दाखिल हुए, ललिता का दिल ज़ोरों से धड़क रहा है, वो बेगुनाह है, और कुछ भी गलत करने नहीं आई, पर फिर भी ये बात उसके घरवाले थोड़ी न समझेंगे,
वह लड़का करीब आ गया, और आते ही, निशा कूदकर उसके गले जा लगी, लड़का गुस्से में था, और बोला “जानती हो कब से इन्तेजार कर रहा हूँ , और तुम अब आ रही हो, निशा माफ़ी मांगते हुए बोली “माफी दे दो हमका, आगे से ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी सरकार, और उसने उसके गाल चूम लिए, ललिता को आश्चर्य हुआ, इस बात पे, और उसने अपनी नजरें विजय की तरफ की, ताकि वह उसकी भी प्रतिक्रया देख सके, मगर उसने हलकी मुस्कान के साथ, अपनी नजरें नीची कर दी, ललिता तुरंत भांप गई विजय को निशा का किसी और के करीब जाना पसंद नहीं आया,

साधारण परिचय और थोड़ी बहुत वार्तालाप के बाद, निशा ललिता की तरफ देखकर बोली, “मुझे इससे अकेले में कुछ बात करनी है, इसलिए मै थोड़ी देर में आती हूँ, ललिता समझ गई की ये ना तो बात की बात है, न ही, थोड़ी देर लगेगा, उसने आँखे दिखाते हुए गुस्से से कहा “अरे ये सब करना था तो मुझे क्यों, लाइ? जो मन में आता है वो करो मगर अकेले आया करो, उसकी क्रोधित आँखे देखकर भी निशा का रवैया नहीं बदला, “अरे यार मेरी मम्मी मुझे घर से अकेले कहीं जाने नहीं देती, और विजय को वो बहुत मानती है, इसीलिये तो मै इसे अपने साथ ले आई, मगर बेचारा अकेले-अकेले बोर हो जाता, तो सोचा क्यों न तुमको साथ ले चलूँ, आखिर तुम भी तो मेरी दोस्त हो न, इतना तो मेरे लिए कर ही सकती हो,

“दोस्त हूँ इसका मतलब, ये नहीं की तुम मेरी इज्जत पर ही खतरा बन जाओ, मै ये सब एक बार भुगत चुकी हूँ, अब और नहीं, मुझे वापस कालेज छोड़ दो और फिर तुम जानो, और तुम्हारा काम, ललिता बहुत गुस्से में थी, मगर निशा भी कहाँ मानती, अरे बहन थोड़ी देर रुक जा, मै दो मिनट में आ रही हूँ, प्लीस, प्लीस, ऐसा बोलते हुए वह किले के पीछे झाड़ियों की तरफ अपने प्रेमी के साथ चली गई,
ललिता हैरान परेशान उसकी तरफ ही देखती रही, उसे इन्तजार करना था, और कोई चारा भी नहीं था, न ही यहाँ से उसे कोई ऑटो या बस मिल जाता, मजबूर मन से वह वहीँ रुक गई, विजय उसकी तकलीफ समझता था, उसने उसकी तरफ देखते हुए बोला “आइये , उधर कोने में चलते हैं, यहाँ से कोई भी आपको देख सकता है, ललिता ने "हूँ" बोलते हुए, गुस्से से भरे अंदाज में उसके साथ पैदल चलने लगी, उसके बगल में कनेर के पौधों की कतारें हैं जो बहुत घनी और विशाल हो चुकी है, उसमे लगे पीले फूल मन को लुभा रहे हैं,
ललिता ने चलते हुए अपना सर उठाया और विजय की तरफ देखा, उसके चेहरे में अब उसका दुःख झलक रहा है, जो ललिता ने कुछ देर पहले महसूस किया था, उसने उसी की तरफ देखते हुए सवाल पूछा - कब से जानते हो निशा को ? विजय - “मुझे खुद नहीं पता, जब से होश सम्हाला तब से निशा मेरी दोस्त है, साथ स्कूल गए अब साथ में कालेज, और उसकी माँ मुझे बहुत पसंद करती है, और बहुत भरोसा करती है, जिसका निशा हमेशा गलत फायदा उठाती है, मेरे मना करने पर वो बात न करने की धमकी देती है, और मुझे हर बार उसकी हर बात माननी पड़ती है, ऐसा बोलते हुए वह पीछे मुड़ा, निशा जिस तरफ गई थी, और उसके चेहरे में फिर वही दर्द छा गया,

“कब से प्यार करते हो उससे ? ललिता का यह सवाल सुनकर सकपका सा गया,
मतलब ? उसने ललिता के सामने अनभिज्ञ बनने का प्रयास किया,
ललिता - देखो मुझसे कुछ नहीं छुपता, और तुम्हारी आँखे, तुम्हारा साथ नहीं देती, तो प्लीस मेरे सामने तो कम से कम सच बोल दो, विजय परेशान सा हो गया, उसने कनेर का एक फूल तोड़ा उसे सूंघते हुए अनजान बनने का नाटक करने लगा, मगर आज उसकी चोरी पकड़ी जा चुकी थी, ललिता ने उस पर दबाव डालते हुए पूछा “देखो विजय छुपाने से कोई फायदा नहीं, शायद निशा ये बात नहीं जानती, मगर मै समझ गई, चलो अब बता भी दो, कम से कम मुझसे तो बोल ही सकते हो. अब विजय हार चूका था, सो उसे कबूलना ही पडा, “निशा को मै बचपन से पसंद करता हूँ, एक बार तो उसकी माँ ने मेरी माँ के सामने बोल दिया था, की विजय को अपना दामाद बनाउंगी, मै शर्म से लाल हो गया था, तब से मै उसे चाहता हूँ, मगर उसकी जिन्दगी में मेरे लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए मै भी उससे कभी बोल ही नहीं पाया, अब तो कालेज ख़तम करके, दुसरे शहर चला जाऊँगा, फिर वहीं कोई नौकरी कर लूंगा, ताकि उससे दूर रह सकूँ,

“उसकी ये सब हरकतें देखकर भी उससे प्यार करते हो ? वह तो न जाने कितने लड़कों के साथ……...ललिता ने दूसरा सवाल दागा,
विजय - “हाँ तो क्या हुआ, लड़के भी तो ऐसा करते हैं, जब उन्हें पूरी आजादी है तो लड़कियों को भी ऐसी छुट मिलनी चाहिए, ललिता ये जवाब सुनकर चौंक गई, पहली बार किसी लड़के ने लड़कियों के हक़ की बात की, उसको यह जवाब अच्छा लगा, और एक फूल उसने भी तोड़कर हाथ में ले लिया, दोनों टहलते हुए पीपल के विशाल और पुराने वृक्ष के पास पहुंचे, और उसी के नीचे चबूतरे पर बैठ गए, ललिता ने अपना नीले रंग का बैग अपनी गोद में रख लिया और अपने खुले बालों को दोनों हाथों से रबर बैंड से बाँधने लगी,

इस मैदान में ढेर सारे जंगली पौधे और झाड़ियाँ उग आई हैं, ऐसा लगता है अंग्रेजों के जमाने में इस किले की सफाई हुई थी, दीवारें जगह जगह से उखड़ी हुई हैं, और उसमे लगा लाल रंग भी धुंधला हो चला है, और पत्थरों की जोड़ के अन्दर का सफ़ेद चूना नजर आ रहा है, विजय और ललिता ऐसे ही बातें करते हुए, उन दोनों कलयुगी लैला मजनू की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ललिता विजय से काफी प्रभावित लग रही है, उसे विजय से कोई ख़तरा नहीं हो सकता, ऐसा वह सोच रही है, क्योंकि, विजय तो निशा से प्रेम करता है, और वह लड़कियों का पूरा सम्मान भी करता है, इसलिए उसे विजय बड़ा अच्छा लगा.

लगभग दो घंटे की निजी मुलाकात के बाद निशा और उसका मौजूदा प्रेमी उनके निकट पहुंचे, दोनों के कपडे सिकुड़े हुए और बाल में घास के तिनके लगे हुए हैं, अब वो कुछ भी कहें, हालात सबकुछ बयाँ कर चुके हैं, वैसे निशा को कोई फर्क नहीं पड़ता, दोस्त अच्छे हों तो अपना असली रंग छुपाया नहीं जाता, यहाँ से वे कालेज की तरफ निकले, और पीले शर्ट वाला मजनू वहीँ से लापता हो गया, विजय इन दोनों के साथ कॉलेज पहुंचा,

निशा को पढ़ाई में कोई रूचि नहीं है, वह तो कोई भी नया सजीला जवान देखकर ललचा जाती, एक प्रकार से वह रोज नया शिकार खोजती, लड़के हमेशा उसके आगे पीछे घुमा करते, और अक्सर वह जहां खड़ी होती थी, वहां लड़के उसे घेरे खड़े पाए जाते, कालेज में तो उसके किस्से मशहूर हैं, कोई भी लड़का थोड़ी सी मेहनत करके उसे पा सकता था, “मानो, निशा लड़के घुमाने का विश्व कीर्तिमान बनाना चाहती हो .

ललिता उसे समझाती भी नहीं, और तो और, निशा, ललिता को अपनी माँ से मिला चुकी थी, घर ले जाकर, उसकी माँ को ललिता बहुत पसंद आई थी, और उसके पिता श्रीमान अजेश कुशवाहा जी को यही लगता था, की मेरी बेटी ने कितने अच्छे अछे दोस्त बनाये हैं, और मेरी बेटी की संगती भी बहुत साफ़ है, उन्हें पता नहीं था, उसकी बेटी अपने कालेज में कितनी बड़ी चर्चित हस्ती है . अब तो निशा अक्सर ललिता या सोहन का नाम बताकर खूब घुमती, और ललिता को इस बात का डर बना रहता की कोई अनहोनी न हो जाए, इसी डर से वह निशा से दूर भागती लेकिन निशा तो किसी ज़हरीली नागिन की तरह उसके पीछे पड़ चुकी थी,

उबड़-खाबड़ रास्तों से भरी ज़िंदगी, धीरे-धीरे कट रही है, ललिता सिर्फ पढने में मगन रहती है, अब उसने अपना रास्ता चुन लिया है, कालेज के बाद उसने "आई. ए. एस." करने की ठान ली थी. उसके शिक्षकों को भी ललिता में वो बात नजर आती है, उसन एक-दो साल के अन्दर अपने चरित्र और प्राप्तांक का कद काफी उंचा उठा लिया था, उसके परिवार में उसका मान सम्मान वापस आने लगा है, उसकी स्कूल की गलती लोग भूलते जा रहे हैं,

लेकिन भाग्य में लिखा हो अगर जिमीकंद तो कहाँ से मिलेगा - कलाकंद. निशा की प्रेम पिपासा समय के साथ बढ़ती चली गई, और इसी तरह एक रात वो किसी नए प्रेमी के साथ भाग गई, और शादी भी कर लिया, वो लड़का उसी क्षेत्र के विधायक का पुत्र था, उसने सही समय में अपने हुनर का उपयोग कर ऐसा सफलता पूर्वक कर लिया, उसने शाम के वक्त घर से निकलते हुए कहा था, की वह विजय और ललिता के साथ ही पास में रहेगी, और आधे घंटे के बाद लौट आएगी, उन्होंने सोचा तक नहीं था की उनकी लाडली ऐसी निकलेगी .

अगले दिन सुबह के समय जब ठीक से दिन की शुरुआत भी नहीं हुई थी, श्रीमान और श्रीमती कुशवाहा, विजय को साथ लिए ललिता के ताऊ जी के यहाँ घुस गए, और बड़े ही आक्रोश और गुस्से से भरे हुए, ललिता पर दोषारोपण करने लगे, उन्होंने सवालों की बौछार कर दी, “कहाँ है मेरी बेटी ? तुम्हे जरूर पता होगा, बताओ ? तुम्ही ने मेरी बेटी को ये सब सिखाया है ? है ना ? वो ऐसी नहीं थी, विजय को भी घेरे में लिया जा चूका था, ललिता के ताऊ जी भी कुछ बोल पाने में असमर्थ, उन्होंने भी वही मान लिया जो कुशवाहा परिवार ने कहा, लोगों की भीड़ भी साथ थी, विजय और ललिता, दोनों बेकसूर अपने आप को निर्दोष भी साबित नहीं कर पा रहे हैं, उनका सिर्फ इतना ही दोष था, के वह निशा के दोस्त थे,

विजय ने ललिता को बचाने की खातिर निशा के पूरे करम काण्ड खोलकर रख दिए, “आपकी बेटी कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी, जो किसी के बहकावे में आ जाए, पूरा कालेज जनता है, आपकी बेटी के कारनामे, मेरा मुंह मत खुलवाइये, और ये लडकी सिर्फ पढ़ाई में ध्यान देती है, इसकी गलती सिर्फ इतनी है की वह निशा की दोस्त है, विजय लगभग तनाव और गुस्से से भरा था, उसके माथे पर लकीरें साफ़ ये दिखा रही हैं,
ललिता के ताऊ जी उलटा उसी पर चढ़ गए, “अरे छोरे हमें मत सिखा, तेरे तो शकल से ही मुझे शक हो रहा है, तू क्यूँ इसकी तरफदारी कर रहा है, तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है , ये तो देख के ही समझ आ रहा है, न जाने कब से तुम दोनों कालेज जाने के बहाने मुंह काला करा रहे हो. अब उन्होंने ललिता की तरफ घूर कर देखा, वो तो डर के मारे थर-थर काँप रही थी, “ये तो हमारी नाक कटवा के रहेगी, पहले अपने पिता की बदनामी कर आई, अब हमें बदनाम करके रख दिया, पूरे जबलपुर में मेरी गर्दन झुका दी, मै तुझे अपने घर पर, अब और नहीं रख सकता, तेरे पिता को आज ही फोन करके तुझे वापिस ले जाने को बोल दूंगा, जिसकी आफत वही भुगते, हम क्यों किसी आफत को अपने घर पालें, ? अब ललिता किसी को समझाने में असमर्थ , चुपचाप खड़ी है, उसकी आँखों से आंसू, झर-झर बह रहे हैं,

श्रीमती कुशवाहा, अब भी शांत नहीं, वो फिर चिल्लाने लगी, कुछ भी हो जाए, मेरी बेटी को वापस लाओ, कैसे भी, “पता नहीं मेरी मासूम बच्ची किस हाल में है, किसके साथ होगी अभी. और विजय तू .. तुझे बचपन से अपने बेटे की तरह समझा, कभी भी तुझे घर आने से रोका तक नहीं, आज तूने जता ही दिया की तू भी आखिर पराया है, और मेरी बेटी के बारे में इतनी गंदी बातें बोलते हुए तुझे लाज नहीं आई, ये ठीक कहते थे, लड़कों से दोस्ती होनी ही नहीं चाहिए, देख ,,आज तेरे कारण हमारी नाक आखिर कट ही गई ना….

विजय ने बहुत कोशिश की, मगर किसी ने उसकी एक न सुनी, ललिता अब समझ चुकी थी, आगे क्या होने वाला है, इसलिए सिर्फ वह रोती रही, काफी देर तक हंगामा मचाने के बाद कुशवाहा दम्पति अपने लाये हुए भीड़ के साथ वापस चले गए, आज रात तक ताऊ जी के परिवार वालों ने भी उसको खूब खरी खोटी सुनाई, रात को वह खाना भी नहीं खा सकी, विजय भी अपने दुःख के सागर में डूब गया, उसकी आख़िरी उम्मीद थी, की एक दिन वह निशा को पा ही लेगा, मगर वो अब हमेशा के लिए पराई हो गई थी,
दो दिन बाद श्रीमान गुलशन टंडन अपनी पत्नी के साथ जबलपुर पहुंचे, और उसी दिन अपनी बेटी को लेकर वापस खजुराहो निकल गए, ललिता की कालेज की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा दी गई, और उसकी शादी के लिए लड़का ढूंढने लगे, वो कैसा दीखता है, क्या कमाता है, ये सब जरुरी नहीं था, बस लड़का समाज का हो यही काफी था, ललिता ने प्रयास किया की उसे फिर से पढने दिया जाए, मगर किसी ने उसे कुछ भी बोलने नहीं दिया, न ही उसे अब कोई इंसान समझ रहा था, जैसे तैसे एक लड़का मिला जिसका कांच की बोतल और सामान बनाने का कारोबार था, और दो सप्ताह के भीतर एक शराबी, अधेड़, उम्र के आदमी के साथ उसकी शादी कर दी गई .
समाप्त ...................................................

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