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युवराज की यात्राएं 1 | Yuvraj ki yatraen

मेरा नाम युवराज अवस्थी है, मै रायपुर शहर का निवासी, मेडिकल कालेज में पढ़ाई करता हूँ, मै हर रोज कालेज जाने से पहले और जब मन किया तब, कालेज के पास ही सड़क किनारे, शंकर भाई की चाय की टपरी पर जरूर पहुँच जाता हूँ, यहाँ चाय, सिगरेट पीते हुए और भी रसदार प्रतीत होती है, वैसे कभी कभी मै और मेरी दोस्त अनीता कालेज से भागकर जब फिल्म देखने जाते हैं, तो इसी टपरी में अपने कालेज बैग्स छोड़ जाते हैं, और वापसी में ले जाते हैं, यह रिश्ता कई सालों से हमारे बीच है, शंकर भाई और उनका बड़ा भाई अनुराग दोनों ही बहुत ही अच्छे इंसान हैं, मानो कोई पुराना रिश्ता हो इन लोगों के साथ,

अक्सर शंकर के ठेले पर मै रुक कर गप्पे मारता हूँ, कभी उसे कहीं जाना होता है तो दूकान भी सम्हाल लेता हूँ, यहाँ ऐसा लगता है मानो ये मेरी ही दूकान है, और उनका मुझपर पूर्ण विश्वास मुझे पसंद है, एक दिन जब मै शंकर भाई से मिलने रोज की तरह उनके दूकान में पहुंचा, तो उनके बड़े भाई अनुराग से भी मुलाक़ात हो गई, साथ में अनीता भी थी, उन्होंने मुझे देखते ही गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया और उनके हाथ में शादी का कार्ड था, उन्होंने उसी प्रेम से कहा, “युवराज अगले महीने मेरी शादी है, और मै कार्ड बांटने में ही लगा था, की तुम मिल गए, ये देखो इसमें तुम्हारा और अनीता दोनों का नाम लिखा हुआ है, उन्होंने कार्ड दिखाया हमें बड़ी खुशी हुई,
अनीता लगभग चहकते हुए बोली “वाओ भैया आपकी शादी में हम जरूर आयेंगे, मजा आएगा . अनीता बिलकुल मेरी तरह पागल है, उसकी सुन्दरता और भोलापन देखकर कोई भी उसको एक बार में पसंद कर लेता है, उसने पूछना शुरू किया की लड़की कौन है कहाँ से है, और मैंने तब तक कार्ड खोलकर देखा, अन्दर छपा एड्रेस देखकर मै अत्यंत दुखी हो गया, उनकी शादी उडीसा में होने वाली है, ओहो ! मै तो खैर कैसे भी पहुँच सकता हूँ, लेकिन अनीता तो एक लडकी है, उसके परिवार वाले कदापि नहीं मानेंगे, यह बात जब अनीता को पता चली तो वो भी दुखी हो गिया, और भैया “जरूर आना कहकर चले गए, शंकर समझ गया की इन लोगों का आना मुश्किल है,

समय बीत रहा था, और समझ नहीं आ रहा था, की जाएँ या नहीं, अगर नहीं जाते तो शंकर भाई को बुरा लगता, इसी बीच शंकर ने एक दिन कहा, “भाई परसों हम लोग पूरा सामान और परिवार वाले उडीसा के लिए निकल रहे हैं, अगर आप लोग आ रहे हैं तो परसों चार बजे तक रायपुर स्टेशन पहुँच जाना , साढ़े चार को आदि पुरी एक्सप्रेस निकलती है, उसी में साथ चलेंगे, मुझे तो तारीख पहले से पता थी, और वह जानता था, की सिर्फ थोड़ी सी जान पहचान वाली दोस्ती है, शायद ही मै आउंगा, उसने तो अनीता के आने की कोई उम्मीद भी नहीं की,

ऐसे थोड़े ही किसी की शादी में शरीक होने कोई उडीसा जाता है ? मै यही सोचकर मन को तसल्ली दे रहा था, साथ ही ये भी सोच रहा था, इतने दिनों की जान पहचान है, अगर नहीं गया तो ? अरे नहीं गया तो कौन सा भाई लोग बुरा मान जायेंगे ? लेकिन मन नहीं मान रहा था, और मेरा मन किसी निर्णय में नहीं पहुंचा था, जिस दिन निकलना था, उस दिन भी मै सोच रहा था, और दोपहर तक मै सोच में ही था, कैसे करना है, एक बजे के करीब अनीता का फोन आया, “जल्दी से तैयार होजा मैंने घर में बोल दिया है, की कालेज की तरफ से पुरी जगन्नाथ जी की यात्रा पर जा रहे हैं, तू कैसे भी करके तीन बजे तक मेरे घर पहुंच .

“अरे … जो फैसला मै तीन दिन में नहीं कर पाया, उस लड़की ने फटाक से कर दिया, अब तो तुरंत कपडे लत्ते, एक ट्रेवल बैग में ठूंसने पड़े, और मैंने अपने पड़ोसी दोस्त को फ़ौरन कार लेकर साथ चलने के लिए राजी कर लिया, जो की बहुत कंजूस है, घर से निकल कर जैसे ही पहला पेट्रोल पंप मिला, उसने गाडी रोक दी, और “पहले पेट्रोल भरा कुत्ते, तब गाडी आगे बढ़ेगी, ऐसा बोलकर साला भिखारी मेरी तरफ उम्मीद लगाकर देखने लगा, “आज मेरी जरूरत थी, इसलिए मैंने प्र्टोल भरवाया, और अनीता के घर पहुंचे, यहाँ वो तैयार मिली =, पता नहीं उसके घरवाले कैसे मान गए होंगे, मै यही सोच रहा था, तभी उसने मुझपर चिल्लाया “ अरे यार मेरा बैग कौन उठाएगा, ? मै क्या करता उसकी माँ के सामने उसे कुछ बोल भी नहीं पाया,
जैसे तैसे हम लोग रायपुर स्टेशन पहुंचे, मेरा भिखारी दोस्त नयी फरमाइश करने लगा “भाई अब एक बीयर भी पिला देता तो मेरे बीवी बच्चे तुमको दुआ देंगे,

“तू कब से बीवी बच्चों वाला हो गया रे ? मैंने उसे घूर कर पूछा , वो बोला भाई कभी तो आयेंगे, तब दुआ दे देंगे, मै भी सफ़र के लिए स्फूर्तिदायक पेय पदार्थ लेने की उम्मीद कर रहा था, और अभी एक घंटा समय बचा हुआ था, सो मैंने अनीता से कहा “तुम कार के अन्दर बैठे रहो, हम लोग आते हैं, वो समझ गई की दाल में कुछ काला है, इसलिए कार से उतर कर उसने जोर से दरवाजा बंद किया और गुस्से से बोली, “जी नहीं आप लोग अकेले नहीं जा सकते , जहां भी जा रहे हैं, मुझे साथ ले जाना होगा, और हाथ बांधकर वह हमारे सामने खड़ी हो गई,
मरता क्या न करता, मजबूरी में उसे भी बीयर बार ले जाना पड़ा, “एक बात तो मैंने बताई ही नहीं, मै और अनीता बचपन से दोस्त हैं, जिन्दगी का पहला बीड़ी हम दोनों ने साथ पिया था, हम लोग हर गैर कानूनी काम जो घरवाले लोग पसंद नहीं करते हम साथ साथ करते हैं, और आज भी ये नियम चल रहा है, वो मेरे साथ बीयर पीती है, और जान बुझकर किसी शराबी जैसे अभिनय भी करती है, बिलकुल ही पगली है, अनीता . हम लोगों ने बीयर पिया, उसके बाद सफ़र के लिए कोल्ड ड्रिंक के बोतल में व्हिस्की मिलाई, साथ में नशे की पूरी व्यवस्था, मेरा भिखारी दोस्त अब खुश लग रहा है, और कार को पार्किंग से निकालते वक़्त जब वह जाने लगा, तब आदतन उसने शाम के जुगाड़ हेतु सौ रूपये और मांगे, अपन भी पीने के बाद दिलदार हो जाते हैं सो उसे एक सौ का नोट थमा दिया, वो भी किसी चौकीदार की तरह सलाम करके दुसरे हाथ से स्टीयरिंग घुमाकर निकल गया,

हम दोनों कन्धों में बैग लटकाए, स्टेशन के अन्दर दाखिल हुए, मुंह में मीठी सुपारी चबाते ताकि बदबू न आये, अन्दर पहुंचे तो शंकर भाई, हम दोनों को देख कर चौंक गया, उसके साथ कुछ लोग और थे, उनकी दीदी और एक महिला भी साथ में थी, और एक तेरह साल का लड़का भी था, जो शंकर भाई का भांजा है, साथ में ढेर सारा सामान, हमें देखते ही बोला “अरे भाई मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है, आप लोग सच में आ गए, मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी, मैंने कहा कैसे नहीं आते, अनुराग भाई की शादी है, बार बार थोडेना होगी,
“लेकिन मैंने तो जनरल कोच की आठ टिकट ही खरीदी थी, अभी रुको तुम लोगों के लिए टिकट लेकर आता हूँ, फिर टी.टी. से कहकर तुम दोनों के लिए स्लीपर कोच में सीट जुगाड़ कर लेंगे, मैंने उसे रोकना चाहा मगर वो नहीं माना , फिर वह टी.टी. के पास जाने लगा तो हमने स्लीपर कोच में जाने से मना कर दिया, और कहा आप लोग जिसमे जायेंगे, हम भी उसी में जायेंगे, मेरे बार बार आग्रह करने पर ही वह माना, और उसने मेरे समीप आकर कान में कहा “भाई तुम दोनों के मुंह से बदबू आ रही है, तुम लोग दीदी और उनकी सहेली से दूर ही रहना, नहीं तो ….. मैंने भी हामी भर दी, और अनीता को समझाया “तुम न ओवर एक्टिंग बंद करो,,, जितना पीती नहीं हो उससे ज्यादा तो एक्टिंग कर देती हो, अनीता भड़क गई, उलटा मुझे ही डांटने लग गई “क्यों खुद को बहुत होशियार समझते हो ? पिछली बार कौन उल्टी किया था मेरे छत में ? बताऊँ क्या इन लोगों को ?
मैंने तुरंत उससे माफ़ी मांगते हुए कहा, माफ़ कर दो देवी, गलती हो गई, अब कुछ नहीं कहूंगा, मैंने सोच लिया था, जो बाकी का जुगाड़ है, वो मै और शंकर भाई मिल कर पियेंगे, इसको तो हर बार ज्यादा हो जाती है, और पांच बजे ट्रेन प्लेटफोर्म नम्बर एक पर आई, हम लोगों ने जैसे तैसे जनरल डब्बे में प्रवेश पाया, आज पहली बार अनीता और मै जनरल डब्बे में बैठे, कितनी तकलीफ से आम लोग रोज इसी डब्बे में सफ़र करते हैं, आज मुझे यह पता चला, वैसे मै और अनीता दोनों पास में ही रहते हैं, दोनों का परिवार अच्छा है, तो कभी भी जनरल डब्बे में सफ़र करने का अनुभव ही नहीं हुआ, आज यहाँ घुसते ही अजीब सी बेचैनी हुई, लेकिन शंकर भाई को बुरा न लग जाए ये सोचकर हम दोनों ने कुछ नहीं कहा,

ढेर सारे सामान के साथ हम दस लोगों का सफ़र शुरू हुआ, शंकर भाई इसी तरह अपने गाँव का सफ़र तय करते हैं, उन्होंने लड़ झगड़कर कैसे भी सीट की व्यवस्था की, और सारे सामान को ठीक से रखा और सब बैठे, मुझे और अनीता को ऊपर की बर्थ पर बिठा दिया, जो की लोहे की बनी थी, इसमें कोई गद्दा भी नहीं लगा था, जैसे की नीचे की सीट में होता है, मन में एक बारगी ये ख्याल आया, इससे अच्छा तो उस भिखारी दोस्त की कार से चलते और उसी से आना जाना करते, लेकिन जो लिखा होता है वही होता है, वहां तो पैर रखने की जगह नहीं थी, और हमारे पास पूरी सीट थी,

ऐसे ही सफ़र का आनंद लेते हुए हम आगे बढ़ रहे थे, और आज पहली बार आम इंसान की परेशानियों और मजबूरियों को भी महसूस किया, शाम ढलने के बाद मैंने शंकर को ऊपर बुलाया, और जब वो पास बैठा, तो मैंने अपना रोल मारने वाला चश्मा निकालकर अपने बैग के अन्दर रखे हुए बोतल को दिखाया, वो चौंकते हुए बोला “अबे मरवाएगा क्या ? साले मेरी दीदी की नाक तेज है, वो जान गई तो खूब पीटेगी, मैंने भी बोल दिया “अगर दीदी जान गई तो मेरा नाम ले देना और क्या , ले पी अब, तेरे लिए ख़ास पैक करवाया था, और उसको मैंने पूरी बोतल पकड़ा दी, वह ऐसे पीने लगा जैसे कोल्ड ड्रिंक पी रहा हो, मैंने चिप्स का पैकेट भी फाड़ा मगर इसने मना कर दिया, और बोला “इससे किसी को भी शक हो जाएगा,

और मै भी पीने लगा, तभी अनीता ने मेरी बांह खींचते हुए आँखों से इशारा किया की मुझे भी दे, मैंने सर हिला कर मना किया तो बड़ी-बड़ी आँख दिखाकर बोली, “चुपचाप दे दे वरना सबको बता दूंगी !! की क्या पी रहा है,,,, अच्छे फंसे, अब तो उसे भी देना ही पड़ा, साथ में वो किसी भूखी शेरनी की तरह चिप्स को ठूंसने लगी, मै, मन ही मन बोला -”हे भगवान् …. ये लडकी आज पिटवा कर रहेगी, मैंने उसे समझाना चाहा , मगर उसने मेरे सर पर टपली मारते हुए कहा की “मुन्ना तेरी पोल खोलूं क्या ? मैंने एक बार फिर उसे सादर प्रणाम किया, और मेरा दिमाग भी खराब हो रहा था, उसी वक्त सिगरेट पीने का मन हुआ और शंकर के साथ मै टॉयलेट की तरफ गए, वहां अन्दर घुसकर हम सिगरेट पीने लगे. कुछ देर ही बीता था, की अनीता देवी हमें सूंघती हुई वहां पहुँच गई, और दरवाजा खटखटाने लगी, मैंने जब सिगरेट छिपाते हुए गुस्से से दरवाजा खोला तो देखा, वो देवी दिव्य मुस्कान लिए , मेरी ही तरफ एक याचक की तरह देख रही थी,

मजबूरी में उसे भी अन्दर लेना पडा, अब हम तीन लोग टॉयलेट के अन्दर सिगरेट पीने लगे, मुझे तो ऐसा लगने लगा है की हर मेडिकल स्टूडेंट कालेज आकर, बिगड़ ही जाता है, उदाहरण मै और आरती, वो बिलकुल पागलों की तरह मस्ती कर रही थी, और मेरे बालों को बिगाड़ रही थी, जितना नशा नहीं उससे ज्यादा उसकी एक्टिंग…. उफ़ … ये पागल लडकी,....

रात को हम दोनों ऊपर की सीट में चादर बिछाकर सोये, जिससे लोहे की सीट की चुभन कुछ कम हुई, और शंकर भाई लोग नहीं सोये, उसका भांजा गणेश हमारे सामने की सीट में लेट गया, शंकर भाई ने बताया था, की ढेर सारा सामान है, और कुछ गहने भी हैं, इसलिए पहरेदारी जरुरी है, वैसे अनीता को भी ऐसे बिस्तर में नींद नहीं आई न मुझे, इसलिए हम दोनों रात भर बतियाते रहे, और ये सोच रहे थे की गाँव कैसा होगा ? वहां क्या क्या देखने मिलेगा, अगली सुबह छः बजे हम लोग ब्रह्मपुर,उड़ीसा पहुँच गए, और स्टेशन के बाहर अनुराग भाई अपनी “ओमिनी वैन लिए तैयार खड़े थे, साथ ही एक ऑटो भी लाये थे, सारा सामान और चार लोग ऑटोरिक्शा में गाँव के लिए निकले और हम लोग वैन से निकले, सुबह सुबह , बहुत ही ज्यादा उत्सुकता थी, उडीसा घुमने के लिए,

वहां से आठ किलोमीटर दूर हम लोग बोरीगाम पहुंचे, मेरे दोस्त का गाँव, रास्ते में उसने अपना स्कूल दिखाया, जहां वो पढ़ा था, रास्ता कच्चा था, और हमारी कार से धुल उड़ रहा था, उसी रास्ते से होते हुए हम लोग गाँव के अन्दर दाखिल हुए, यहाँ कच्चे पक्के मकान नजर आ रहे हैं, अधिकाँश कच्चे घरों की छत घास या तो धान के बचे हुए घास से ढंकी थी, यहाँ पर बैलगाड़ी के चक्के हमारे राज्य छत्तीसगढ़ से आकर में दुगुने बड़े थे, और गाँव के अन्दर की सड़के सीमेंट से बनी थी, और उसमे कई जगह मूंग की फसल को बिछा दिया गया था, जिससे आने जाने वाले वाहन के द्वारा फसल में से बीज निकल जाए और उसके तने और छिलके अलग रह जाए,

घर पहुँचते ही मेरी पहली अभिलाषा यही थी, की मै बाथरूम जाऊं और हल्का हो जाऊं, मगर यहाँ पता चला के, घर का स्नानघर महिलाओं के लिए आरक्षित है, इसलिए कृपया, खेतों या तालाबों की ओर प्रस्थान करें, ये भी नया अनुभव आज होने वाला था मुझे, ये तो पूरा गाँव ही था, ग्रामीण लोगों की सादगी और अपनापन पाने के लिए लोग क्या नहीं करते , मै तो तालाब जा ही सकता हूँ, और इस बात से अनीता को बड़ी हंसी आने लगी, मुझे एक मोटरसायकल प्रदान करके, गणेश भांजे को साथ रहने कह दिया, और चाय पानी के लिए पूछा गया, उसके उपरान्त सब लोग व्यस्त हो गए, मै भांजे के साथ निकल पडा लोटा लेकर तालाब की तरफ,

यहाँ पर मैंने एक चीज़ पर गौर किया, हमारे यहाँ तो घर लम्बे-चौड़े, होते हैं, मगर इस गाँव में सारे घर लम्बे थे, ज्यादा से ज्यादा दस फीट चौड़ाई मगर लम्बाई पचास फीट तक थी, यहाँ नारियल पेड़ की कोई कमी नहीं,
थोड़ी देर बाद तालाब के किनारे विशाल पंडाल लगा हुआ था, और साथ ही बहुत बड़ा इलाका बड़े से तम्बू द्वारा ढंका था, पता चला यहाँ पर देवी के मंदिर में कोई उत्सव मनाया जा रहा है, जो की पंद्रह दिन चलने वाला है, साथ ही पूरे गाँव वालों का खाना पीना भी सामूहिक रूप से चल रहा था, हम लोग और आगे बढे, और तालाब के अंतिम छोर के उस पार हम लोग नित्य क्रिया से निवृत्त होकर वापस लौटे, अब तो बस नाश्ता करके सोने का मन था, लेकिन आज शायद नींद नसीब नहीं होने वाला था, नाश्ता करके मै थोडा उंह ही रहा था की मेरा दोस्त शंकर मेरे पास आया और बोला “भाई चल गाड़ी निकाल मंडी से सब्जी लाना है,

“आंये…… ये एक और नै मुसीबत,,, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, और हम दोनों शहर जाने लगे सब्जी लाने, मैंने रस्ते में उसे बताया की मेरा लायसेंस यहाँ चलेगा की नहीं ? वह इस सवाल में सिर्फ मुस्कुरा दिया,,, यहाँ हमने कुछ कटहल, और ढेर साड़ी सब्जियां ली, जो लगभग दो बोरियों में समाई, मुझे ये समझ नहीं आ रहा था, की इन दो बोरी में रखा सामान घर कौन ले जाने वाला है, तभी शंकर ने दोनों बोरियां बाइक की सीट पर रखी, और मुझे गाड़ी स्टार्ट करने कहा, फिरसे झटका लगा ,,,, फिर मै भी बिना कुछ कहे, गाडी स्टार्ट कर दिया वह पीछे बैठा और हम दोनों के बीच में सब्जी की बोरियां , यहाँ अधिकाँश लोग उड़िया भाषा में बात कर रहे हैं, जो की मेरे पल्ले न पड़ रहा, संबोधन में “भाईना “” शब्द का उपयोग ज्यादा है, अर्थात भाई की तरह उपयोग होने वाला शब्द,

यहाँ पर एक और चीज़ चौंकाने वाली मिली, सडक से लेकर दीवार तक , कुछ भी पोस्टर या लिखित विज्ञापन मैंने देखा, वह लाजवाब था, चाहे वह फोटोग्राफी ही क्यों न हो, यहाँ तक की घर के बाहर हो रही “शुभ विवाह” के साथ दुल्हे संग दुल्हन का नाम ऐसे सजा कर लिखा गया है, की मैंने इस राज्य की कला को प्रणाम कर लिया, यहाँ की कलाकारी हर जगह नजर आ रहे है, हाँ सड़कों की स्थिति ठीक है, लेकिन यातायात के नियमों को पालन करने में लोग थोड़ी कंजूसी बरत रहे थे,मै भी धूम मचाले गाते हुए वापस गाँव की तरफ जाने लगा, वापस आकर हमने सब्जियां पहुंचाई, अनीता की मुस्कान दिखी, अपने कपड़े झाडे, फिर बगल वाले होटल में शंकर हमें चाय पिलाने ले गया, यहाँ पर सफाई लाजवाब है, हमने सिगरेट जलाना चाहा तो शंकर ने मना किया,

“भाई यहाँ पिताजी की बहुत इज्जत है, जो करना है वो खोपचे में , समझे … हमने हाँ कहा और बिना सिगरेट के चाय पीने लगे, अनीता भी साथ खड़ी है, शंकर ने होटल वाले को समझा दिया “ये हमारे मेहमान है, ये जब तक रहेंगे जो खायेंगे, देना , और खबरदार जो पैसे लिए, . उसने हामी भर दी,

बस उसे हिंदी नहीं आती, एक बार मै इडली खा रहा था, और जब एक और चम्मच माँगी तो उसने चम्मच की जगह चीनी डाल दी. गणेश भांजा यह देखकर खूब हंसा, मै और अनीता जब उड़िया भाषा नहीं बोल पाते तो बच्चों के साथ घुमते हुए एक वाक्य बार बार दोहराते - “येन्ना रास्कला माइंड इट ….और सारे बच्चे हमारे संवादों से खूब हँसते, उन लोगों ने हमें उड़िया भाषा सिखाने की बहुत कोशिश की मगर हमें सिर्फ एक ही बात याद हुई , “दिड कदली दियो . अर्थात दो केले देना भैया … यहाँ हर दूकान में नारियल पानी और पेड़ के पके केले मिलते हैं, तो हमें दूकान से केले खरीदने में आसानी होती थी,
यहाँ सभ्यता और संस्कार संपन्न लोग रहते हैं, कई दिनों तक मै इस गाँव में रहा, मगर एक भी लड़की मुझे ऐसी नहीं दिखी तो किसी लड़के को ताड़े, या कोई लड़का जो सड़क में लडकियां छेड़ रहा हो. सभी अपने काम से काम रखते और सीधे रास्ते जाते, जब मुझे नहाना होता तो मै किसी न किसी के साथ या गणेश भांजे की बच्चा पार्टी संग तालाब जाता, और हम लोग खूब मस्ती करते, जब भी अनीता और मुझे घरवाले खाना खाने के लिए बुलाने आते तो बिलकुल किसी मूक बधिर की तरह हाथ से इशारा किया जाता,
मानो हम लोग, गोलमाल फिल्म के तुषार कपूर की तरह “”आयाओ “इयाया ओ” बन जाते मतलब न हमें उनकी भाषा आती न उन्हें हमारी, मगर दिल की भाषा प्रेम की भाषा कौन नहीं समझता, फिर मै और अनीता भी सर हिलाकर जवाब देते की आ रहे हैं, मै और अनीता जन्म जन्म के भूखे लोग, दोनों खाने पर टूट पड़ते, यहाँ की परम्पराएं और रीति रिवाज कुछ कुछ मुझे बंगाल की याद दिलाने लगे, और यहाँ हर चीज़ दिलचस्प मिलती, जैसे शादी के दिन लडकी बरात लेकर आई, और दुल्हे के यहाँ विवाह संपन्न हुआ, खूब शानदार दावत का आयोजन हुआ,
हमने जमकर बीयर की बोतलें खाली की, और वैसे ही पागलों की तरह नाचा, सब लोग हमारी मस्ती और पागलपन देखकर साथ देते हुए नाचते, और शंकर भाई ये देखकर मुस्कुरा देते, अनुराग भाई भी हरकतों से नाराज नहीं थे, खाने का भी कोई जवाब नहीं था, और उसी तरह, हम लोग बारह बजे तक ही टिक सके, जबकि शादी की रस्में चल रही थी, और घर के लोग व्यस्त थे, लेकिन सिर्फ दो कामचोर तो मौके की तलाश में थे,
मै और अनीता, सही मौक़ा पाकर वहां से भाग लिए, और छत में जाकर खुले आसमान के नीचे, एक चटाई पर चादर बिछाकर लेटे, तकिया नहीं मिला तो मैंने अपने दोनों जूते निकाले, और उसे चटाई के नीचे दबा दिया, जिससे हम दोनों की खोपड़ी थोड़ी ऊपर उठी, यहाँ आसमान के तारे खूब चमक रहे हैं, इसी तरह हम दोनों सिर्फ तीन मिनट ही बात कर सके और कुम्भकर्ण की तरह सो गए,..
अगली सुबह देर तक सोते रहे, रोशनी हुई तो आँखे चुभने लगी, अनीता के दुपट्टे ने यह समस्या हल की हम लोगों ने अपना सर ढँक लिया, जिससे कुछ देर और सो सके, फिर जब धुप तेज होने लगी तभी हम उठे,. आज का दिन थोडा सा राहत वाला था, हलवाई और तम्बू वाले अपना बोरिया बिस्तर समेट रहे थे, आज का दिन व्यस्त रहा, नहा धोकर सब गाँव के मंदिर गए, घर में पूजा हुई, नई भाभी का परिवार में स्वागत हुआ, शंकर भाई भी काम निपटाकर, हम लोगों को अपने दोस्तों के साथ घुमाने ले गए, कुछ दूरी पर एक सुन्दर जगह है, जहां शानदार समुन्दर का किनारा है, गोपालपुर, यहाँ हमने फिर से बीयर की नदिया बहाई, सिगरेट फूंका, फिर तो समुन्दर में नहाया भी, आज ऐसा लग रहा है, जैसे हम “गोवा” पहुँच गए है, बिलकुल वैसा ही बीच.
इसके बाद हम लोगों ने श्री जगन्नाथ पुरीधाम , कोणार्क सूर्य मंदिर, चंद्रभागा समुद्र तट, चिल्का झील एवं एक स्थानीय देवी के मंदिर की यात्रा की, जो की मन को सुकून देने के साथ अलौकिक अनुभव है,
यहाँ के मंदिरों की स्थापत्य कला, भव्य और महानतम मंदिर देखकर आत्मा तृप्त हुई , ऐसी अद्भुत और गौरवशाली भारतीय स्थापत्य कला का महान रूप देखकर अत्यंत गर्व होता है,

कोणार्क सूर्य मंदिर में, कई नग्न मूर्तियां एवं कामक्रीड़ा रत कई कलाकृतियां बनी हुई है , जिसे देखकर मन में सवाल जरूर उठता है की ऐसा क्यों बनाया जाता है, ऐसा क्योँ होता है कई मंदिरों में ?
यह जिज्ञासा मेरे मन में कई दिनों से थी परन्तु कोई समाधान नहीं मिला था, कई बार तो यह व्यर्थ और अश्लील प्रतीत होता था ,

वहां के एक स्थानीय गाइड ने हमें इस मंदिर की विशेषता और ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन बड़ी ही बारीकी के साथ, एक एक बात को समझाते हुए किया, आज हमारे साथ एक ज्ञानी और जानकार गाइड साथ में था, उसने बड़ी सूक्ष्मता से इस बात का वर्णन किया -

"जिस समय इस मंदिर का निर्माण हुआ उस वक्त इस राज्य में बहुत बड़ा संकट छाया हुआ था , धन की कमी नहीं थी राजकोष भरा हुआ था परन्तु सैनिको की संख्या अत्यंत कम थी, आये दिन युद्ध होता रहता था, सीमा पर सदैव विदेशी आक्रमण का खतरा बना रहता,और पड़ोसी आक्रमण की वजह से अधिकाँश सैनिक मारे जा चुके थे, लगातार सैनिकों की संख्या का घटना देश के लिए घोर चिंता का विषय था, उस समय पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या कई गुना थी, अर्थात लिंगानुपात का संतुलन बिगड़ा हुआ था,

वह समय था वैराग्य और ज्ञान अर्जन का । लोग परमात्मा प्राप्ति हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते थे, और, अक्सर सांसारिक जीवन त्यागकर सन्यासी बन जाते थे, अब ऐसा ही चलता रहा तो सैनिकों की संख्या में वृद्धि कैसे हो ? अधिकाँश राज्य ऐसी परेशानियों में घिरे हुए थे, और, कैसे सैनिकों की संख्या में वृद्धि हो - बस यही चिंता सभी को थी,

तो जान बुझकर मंदिर के चारों तरफ ऐसी मूर्तियां बनाई गई जो युवाओं को प्रेरित करें विवाह करने हेतु, इन कलाकृतियों के माध्यम से उनको विवाह हेतु प्रेरणा मिले, काम की लालसा उत्पन्न हो, और, संतानोत्पत्ति करें ताकि पुरुष सैनिकों की संख्या में वृद्धि हो, जिससे राज्य की सीमा सुरक्षा भलीभांति हो सके ,

इसी वजह से हमारे देश में बहु विवाह का भी प्रचलन होने लगा, इसी लिए ही पुरुष कई स्त्रियों से विवाह कर सकता था, और एक साथ कई पत्नियों के द्वारा वह अपने अपने बच्चों की संख्या बढ़ाकर देश में सैनिकों की संख्या बढ़ा सकता था, इसीलिए शायद बहुपत्नी प्रथा का चलन बढ़ा होगा,

हर बात के पीछे कुछ न कुछ कारण अवश्य होता है। खासकर अगर हम भारतीय संस्कृति और परंपरा की बात करें तो, हो सकता है मेरे शब्द सिर्फ एक पहलु ही दर्शा रहे हों, या हो सकता है की कई और भी कारण रहा होगा इन कलाकृतियों को बनाने के लिए, लेकिन स्थानीय गाइड के द्वारा कहे गए हर शब्द में मुझे सिर्फ सच्चाई ही नजर आई, इसी लिए यह लेख लिखने का मन हुआ, जो सिर्फ मेरे मानसिकता का प्रस्तुतीकरण मात्र है,

हमारे देश और संस्कार इतने महान हैं की हर बात को कोई न कोई कारण अवश्य है, चाहे वो कोई काव्य रचना हो या कलाकृति, कृपया अपने देश और सभ्यता का भलीभांति अध्ययन करें, और प्रयास करें की हम हमारी जिज्ञासा का समाधान हो, पूरी बात समझ कर ही अपनी सभ्यता और संस्कृति पर सवाल उठाना चाहिए ,
शंकर भाई और परिवार के लोग भी इस यात्रा में शामिल थे, इसी दौरान नई भाभी से भी हमारी दोस्ती हुई, उन्हें हिंदी आती है, उन्होंने तो सीधे-सीधे बोल दिया - तुम दोनों प्यार करते हो क्या ? मैंने तुरंत जवाब दिया “नहीं भाभीजी अनीता मेरे बड़े भाई के सामान है, मेरी अंगरक्षक और दोस्त मात्र है, वह भी मेरी टांग खींचते हुए बोली, “भाभीजी इस लड़के से शादी करने वाली लड़की का पता नहीं क्या होगा, मै तो उस बेचारी की किस्मत पर रोउंगी , जिससे इसके जैसा नासपीटा शादी करेगा . मेरी भयंकर, घनघोर बेइज्जती हुई, फिर तो सब खिल खिलाकर हंस दिए,,, सात दिनों की उड़ीसा प्रवास और यात्रा के बाद हम लोगों ने आखिर में विदाई ली, शंकर भाई ने जिद की, “रुक जाओ यार मुझे दो तीन दिन के बाद तो निकलना ही है, तो साथ चलते हैं,
हम लोगों ने भी कहा, “भाई और देर की तो घरवाले हमेशा के लिए निकाल देंगे, और हमें न रोको हम फिर आयेंगे, और पूरे घरवालों ने हमें ससम्मान विदा किया, शंकर भाई खुद हमें रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आये, साथ में बीयर पी, और रास्ते के लिए भी शक्तिवर्धक द्रव्य को कोल्ड ड्रिंक की बोतल में डाल कर दिया, और ट्रेन के छूटने से पहले हमें विदा कर दिया,
हम लोगों ने फिर से जनरल डब्बे का ही टिकट कटाया, और चढ़ गए, महिला आरक्षित डब्बे में, जहां पुरुषों की संख्या ज्यादा थी, हमें सीट मिली, और साथ में ढेर सारी महिलायें बैठी थी, जो की नीम्बू और संतरे बेचकर जीवन यापन करती हैं, वे सब भी, “खुर्सीपार भिलाई तक जा रही थी, उनकी संख्या ज्यादा थी तो अधिकाँश महिलायें जमीन पर ही बैठ गई, मेरे पैर के पास भी कुछ महिलायें थी, जो मुझे अच्छा नहीं लगा, तो मै उठकर उन्हें बैठने का आग्रह करने लगा, मगर वे इसी बात से ही मुझ पर प्रसन्न हो गई, और मेरा संबोधन “आंटी” उन्हें पसंद आया, इसलिए वे लोग बोलने लगे “बेटा तुम बैठ जाओ, हम तो यहीं खुश हैं, और देखो जिद मत करो नहीं तो …. हम तुम्हारी दो लड़कियों से शादी करा देंगे, इस बात से मै और अनीता खूब हँसे.

“तो बात ये है की महफ़िल जम गई, साथ में एक कम्पनी में कार्यरत टेक्नीकल सपोर्ट इंजीनियर, एक पेंटर भी मौजूद था, सभी बातें करते हुए, खाते पीते, सफ़र का मजा ले रहे थे, मेरे सामने बैठे पेंटर को चित्रकारी करते देख मुझसे रहा नहीं गया, और मैंने हम दोनों की चित्र बनाने के लिए उससे निवेदन भी किया, मगर उसने साफ़ मना कर दिया, मै भी जलेबी की तरह टेढ़ा पुरुष कैसे मान जाता. मै भी पीछे पड़ गया, रोने धोने लगा, उसे मेरे बैग में रखे “सोमरस का प्रलोभन देने लगा, ऊपर से अनीता भी विशेष नौटंकी करने लगी, अब तो उसे मानना ही पड़ा, लेकिन पहले उसे सोमरस पिलाया गया, चखना के उपरान्त बाथरूम में फिर तीन लोग सिगरेट पीने गए, उसके उपरान्त हम दोनों मस्त पोज़ मारकर बैठ गए, और वह महान चित्रकार अपने जीवन की सर्वोत्तम चित्र बनाने में जुट गया, वह कलाकार चलती ट्रेन में हम दोनों को देख देख कर कागज़ में हाथ चलाने लगा, पता नहीं वह ये कैसे कर रहा था, और हम दोनों कभी भी हंस पड़ते, कभी नीचे बैठी आंटियां मेरी दो बार शादी करायेंगे कहकर हमें हंसा देती, चित्रकार साहब इस बात से भड़क जाते, ऊपर से उन्हें सिर्फ, अंगरेजी और उड़िया ही आती थी, तो कई घंटों की मेहनत के बाद हमारा चित्र पूरा हुआ,

इस चित्र के बनने के दौरान, मै मन में सोच रहा था, इसे तो फेसबुक में जरूर पोस्ट करूंगा, फिर तो चिढने वालों के पिछवाड़े से धुंआ भी निकलेगा, साथ ही मिनिमम “पांच सौ “लाइक्स और “कमेंट्स तो मिलेंगे,

और जब चित्र देखा तो, हम दोनों एक साथ चीख पड़े - “वाह ….. वाह भाई वाह, उस चित्रकार को ढेर सारा धन्यवाद दिया, साथ ही उसका दस्तखत और फोन नम्बर भी उसी चित्र में डलवाया, सफ़र का अंत निकट आ रहा था, और हमें दुःख हो रहा था, ऐसा शानदार और सुखद यात्रा जल्दी बीत जाता है, ट्रेन थोड़ी लेट थी, फिर भी हम दस बजे सुबह रायपुर अपने शहर पहुँच ही गए …………

इति युवराज पुराण उड़ीसा यात्रानाम कथा सम्पूर्णं ……………………...

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