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ज्वाला 2 | Jwala 2

कुछ बालक खेतों की पगडंडियों से होते हुए तेजी से दौड़ रहे हैं, सबके हाथ में अनिवार्य अस्त्र डंडा है, बच्चों को अपना डंडा बहुत प्रिय होता है, सिर्फ विद्यालय को छोड़कर हर वक्त यह अस्त्र उनके साथ रहता है,

कुछ बच्चों के पास गुलेल भी है, सर्दी का मौसम, खेतों में लाखडी और मेढ़ पर राहर के पौधे लहरा रहे हैं, जिनकी फलियाँ खाने बच्चे खेतों के चक्कर लगा रहे हैं, वैसे बेर भी खूब फले है, सभी बच्चे धोती और कुरता पहने हुए, अपने डंडे से सामने आने वाली वनस्पति को धराशायी करके आनंदित हो रहे हैं,

पुनिया जो सबसे बड़ा है, वह रुका और उसके रुकते ही सब बच्चे एक खेत के अंतिम छोर पर रुके, पुनिया बोला “सोहन ला तेरी गुलेल दे, उसमे का चाम (चमड़ा) अच्छा है, सोहन ने उसे अपनी गुलेल दे दी, पुनिया ने गुलेल ली और सामने महुए के झाड में बैठे कोंवे पर निशाना लगाया, ज्वाला उसके हाथ पकड़कर मना करने लगा, “पुनिया कोंवे को मत मार पाप लगेगा रे, और उसने उसकी बांह खींची, वह पहले भी कई बार अपने दोस्तों को मना कर चुका था, लेकिन कुछ देर तो उसके दोस्त मान जाते फिर कुछ देर में भूल जाते.

पुनिया ने गोल आकार के कंकड़ एक पोटली में रखी थी, वह पोटली व…
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जानकारी और ज्ञान में फर्क 2 | Jaankari aur gyan mein farq 2

पागलपन के साथ उलटे पुल्टे प्रयोग करता हुआ वह बच्चा एक दिन भारत का महान वैज्ञानिक बन गया, सारा वक्त अपनी प्रयोगशाला में मस्त, नित नए नए प्रयोग में व्यस्त खाना पीना, सोना, जागना, कुछ भी होश नहीं उसे, ऐसे ही अपनी प्रयोगशाला में अकेले रहते -रहते कई बार उसे आधी रात को भूख लगती मगर ऐसे समय में सिर्फ बिस्कुट और नमकीन ही मिलती .
बस फिर क्या था बिना किसी से कुछ पूछे उसने खाना बनाना सीखा, बिना किसी के मदद के वह स्वास्थ्यवर्धक भोजन पकाने लगा, उसका बनाया खाना हमेशा स्वाद में फीका होता जिससे उसे ख़ुशी होती की वह सादा और स्वास्थवर्धक खाना खा रहा है, ऐसे ही कई दिन बीत गए, उसको तो यही महसूस होता था की "मेरा बनाया भोजन एकदम सात्विक है. एक दिन उसकी महिला मित्र उसके यहां खाने पर आमंत्रित थी, और उसके आते ही बड़े सम्मान के साथ उसे अंदर बुलाकर उसकी मेहमान नवाजी शुरू की, फिर उस वैज्ञानिक ने अपनी तारीफ करते हुए कहा कि मेरा बनाया साधारण भोजन तुमको जरूर पसंद आएगा और अब उसने खाना बनाना शुरू किया, मगर ये क्या - वो तो तेल, मसाले, जरुरत से ज्यादा डाल रहा था . उसकी दोस्त मुस्कुराते हुए किचन में ही उसके साथ बात …

क्या अन्धविश्वास हूँ मै | kya main andhwishvasi hoon

सदियों से धोती पहना, तिलक लगाकरबगल में झोला दबाये, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाला बटुक, वट सावित्रीहलषष्ठी माता का वंदन गाता दास हूँ मैं,
राधेकृष्ण की प्यारी लीला, श्री राम का धीरज और संस्कार हूँ मै, दुनिया को ज्ञान सत्यमार्ग बताने वाला व्यास , हाँ अन्धविश्वास हूँ मै ।
गणपति जी की प्रथम वंदना, रावण का श्राद्ध कराने वाला क्षत्रिय,अपने राष्ट्रकुल का गौरव बढ़ाने वालादेश का परम दुर्लभ इतिहास, अन्धविश्वास हूँ मै ।
देशऔर समाज बदला, बदल गए इतिहासकार,हर तकलीफ के साथ, कभी न बदल कर उपनिषदों को स्मरण करता हुआ, वेदों का ह्रदय में सहेजने वाला, पुराणोंमें रमने वाला विज्ञानहूँ मै, क्या सिर्फ अन्धविश्वास हूँ मै ।
क्या जरूरत थी धोती बचाने की, क्या जरुरत है तिलक लगाकर विचित्र दिखूं ?या अपनी शिखा की लम्बाई रोक ना पाऊं,क्यों मै दूसरों की शादी करवाता हूँ ?शुभ-अशुभ घड़ियों में निमंत्रित होकरक्यों ? मै अपमानित होकर जीता हूँ ?महान परशुराम का वंशज, क्या सिर्फ अंधविश्वास हूँ मै ।
लांछन लगाया जाता है,कभी मुझको शास्त्र सिखाया जाता है,कभी समाज मेरी गलतियों को खोजते हुए पाया जाता है,क्यों युवा वर्ग को मोह नहीं? क्यों…

एक सवाल | Ek sawal

एक वर्ष पूर्व , मै श्री जगन्नाथ ,पुरीधाम , के यात्रा पर गया था , वहां से कोणार्क मदिर जाने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ, वहां की भव्य और महानतम मंदिर देखकर आत्मा तृप्त हुई , ऐसी अद्भुत और गौरवशाली भारतीय स्थापत्य कला का महान रूप देखकर अत्यंत गर्व होता है,

इस मंदिर में कई नग्न मूर्तियां एवं कामक्रीड़ा रत कई कलाकृतियां बनी हुई है , जिसे देखकर मन में सवाल जरूर उठता है की ऐसा क्यों बनाया जाता है, ऐसा क्योँ होता है कई मंदिरों में ? 
यह जिज्ञासा मेरे मन में कई दिनों से थी परन्तु कोई समाधान नहीं मिला था, कई बार तो यह व्यर्थ और अश्लील प्रतीत होता था ,

वहां के एक स्थानीय गाइड ने हमें इस मंदिर की विशेषता और ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन बड़ी ही बारीकी के साथ, एक एक बात को समझाते हुए किया, आज हमारे साथ एक ज्ञानी और जानकार गाइड साथ में था, उसने बड़ी सूक्ष्मता से इस बात का वर्णन किया -

"जिस समय इस मंदिर का निर्माण हुआ उस वक्त इस राज्य में बहुत बड़ा संकट छाया हुआ था , धन की कमी नहीं थी राजकोष भरा हुआ था परन्तु सैनिको की संख्या अत्यंत कम थी, आये दिन युद्ध होता रहता था, सीमा पर सदैव विदेशी आक्रमण का खतरा बना र…

प्रेम के दुष्प्रभाव 2 | Prem ke dush prabhav-2

एक छोटी सी गलती की वजह से ललिता की जिन्दगी बदल गई, अब वह अपने घर से दूर, "जबलपुर" के “रानी दुर्गावती विश्विद्यालय” से अपने कालेज की पढ़ाई करने लगी, यहाँ उसके ताउजी का घर है, और बड़ा ही सख्त माहौल . यहाँ उसे सिर्फ पढने की आजादी मिली, उसके ताउजी तो पिताजी से भी सख्त निकले, वैसे भी वह दूध की जली अबोध बालिका, सिर्फ पढ़ाई से मतलब रखने लगी, उसने समझ लिया था, की बचपन का प्रेम हमेशा घातक होता है, इतनी कम उम्र में, वह अब बहुत समझदार हो चुकी है, और इसी लिए किसी भी लड़के से वह बात भी नहीं करती, सीधे रस्ते कालेज जाना और वैसे ही वापिस आ जाना, उसने तो उम्मीद ही छोड़ दी, थी, की उसे आगे पढने दिया जाएगा, मगर किस्मत ने उसे एक और मौका दे दिया, इसलिए वह सिर्फ पढने में ही ध्यान दे रही है .
यहाँ उसकी दोस्ती एक लडकी से हुई, नाम है निशा रावत, जो दिन भर चहकती रहती है, इसके बहुत सारे दोस्त है, और कई लड़के इसके परम मित्र हैं, निशा खूब चहकती रहती और कई लड़कों को अपने उंगली के इशारे पर घुमाती भी रहती, ललिता उसे टोकती नहीं थी, न ही उसे ऐसा करते देख कभी आपत्ती हुई, वो जानती थी, इसको समझाने से कोई फायदा नहीं होग…

इस देश की शिक्षा पद्धति :| Is desh ki siksha padhati | Education system of this Country

इस देश की शिक्षा पद्धति :
जहां हमे दीवार में लिखना पड़ता है , यहां मत थूको , यहां पर लघुशंका ना करें , उसके बाद भी आपेक्षित परिणाम नही मिलते , यहां आज भी पैसा निकालने बैंक में दूसरे से फार्म भरवाया जाता है , लाइसेंस बनवाने पासपोर्ट बनवाने या अन्य आवेदन दूसरों से भरवाया जाता है , यहां का एम ए पास लड़का भी कई बार लोकल टिकिट के साथ सुपरफास्ट ट्रैन में टी.टी. द्वारा पकड़ा जाता है , गलती करने पर हमसे पूछना तो चाहिए था ना ऐसा कहकर डांटा जाता है , डिग्री यहांपर सिर्फ नौकरी पाने का जरिया है , असल जिंदगी में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई काम नही आती , पड़ोसी द्वारा उपयोग किया जाने वाला साबुन , हमारे घर मे भी लाया जाता है , चार लोगों से पूछकर ही गाड़ी खरीदी जाती है , हम उस देश के वासी हैं जहां टी.वी. यह निर्णय करता है कि हम क्या खाएं कौन सा मंजन घिसें , पूर्णतः गुलाम मानसिकता से युक्त , ऐसा देश है मेरा , विदेशी चीजों के दीवानों देश , सड़े हुए चेहरों को घटिया कहानी के साथ तीन सौ करोड़ कमा के देने वाले लोग , अगर चेहरा विशेष ना हो तो शानदार कहानी वाली फिल्मों को फ्लॉप बना देने वाले लोगों का अतुल्य देश , आजादी क…

लेखक होने का दुख | Lekhak hone ka dukh

लेखक होने का दुख :
किसी पत्थर से सर टकरा लेना या किसी पागल कुत्ते के सामने नाचना ज्यादा आसान है, लेखक होने की तुलना में .
लेखक अक्सर कई लोगों की आंख में खटकता रहता है, कई लोगों के बारे में अगर कुछ बुरा लिखा हो तो उनकी दुश्मनी झेलना, चौंथी फेल हलवाई भी तुम्हे रोककर कहानी कैसे लिखते हैं तुम कैसे महान लेखक बनोगे इसका पाठ पढ़ायेगा . तुमने ये क्यों नही लिखा तुमने वो क्यों नही समझाया ऐसा सवाल पूछा जाएगा, सम्मानित और पवित्र आशिक अपनी प्रेमिका को प्रेम पत्र लिखवाने आपके पास जरूर पहुंचेंगे . अगर प्रेमपत्र विफल हुआ तब तो लेखक महोदय का चीर-हरण होना तय । पड़ोसी बच्चों को हर साल स्कूल में सुनाने के लिए निबंध और कविताये लिखकर देना स्थानीय लेखक का ही कर्तव्य होता है . छुपकर जीने के बाद भी नासपीटे समीक्षक लेखक को कैसे भी ढूंढकर उसको लम्बा चौड़ा प्रवचन जरूर देंगे, जिसने कभी कहानी का क अक्षर भी न पढ़ा हो वह भी शब्दकोश और व्याकरण की अशुद्धता खोज निकालेगा और लेखक के सर दे मारेगा, लेखक किताब लिखता है अपनी कहानी व्यक्त करने परंतु, कई बार उसकी किताब किसी किसी इंसान का मानसिक संतुलन हिला देता है, अब इसमें लेखक की…